Ranchi| झारखंड हाई कोर्ट के आदेश के बाद राजधानी रांची स्थित रिम्स (RIMS) परिसर की अतिक्रमित जमीन पर प्रशासन की बुलडोजर कार्रवाई लगातार जारी है। इस अभियान के तहत कई ऐसे मकान भी ढहा दिए गए, जिनमें लोग 22 से 25 वर्षों से रह रहे थे। वर्षों की बसावट कुछ ही घंटों में मलबे में तब्दील हो गई, जिससे कई परिवार अचानक बेघर हो गए।
बुलडोजर की इस कार्रवाई के दौरान मलबे के बीच खड़े लोग अपनी उजड़ी ज़िंदगी को देखते रहे। प्रशासन के सामने लोगों ने गुहार लगाई, लेकिन हाई कोर्ट के स्पष्ट आदेश के कारण किसी भी प्रकार की राहत संभव नहीं हो सकी।
पूरी खबर विस्तार से
रांची के रिम्स परिसर और उससे सटे इलाकों में अतिक्रमण हटाने का अभियान पिछले कई दिनों से चल रहा है। प्रशासन ने अदालत के निर्देशों के अनुसार चिन्हित अतिक्रमित मकानों को ध्वस्त करना शुरू किया।
इस कार्रवाई में सबसे अधिक असर उन परिवारों पर पड़ा, जो दशकों से यहां रह रहे थे। कई लोगों का कहना है कि उन्होंने यहां घर बसाने में अपनी पूरी जीवनभर की कमाई लगा दी थी। अचानक हुई इस कार्रवाई ने उनकी जिंदगी को पूरी तरह बदल दिया।
स्थानीय लोगों के अनुसार, कुछ मकान ऐसे भी थे जिनमें तीन पीढ़ियां रह चुकी थीं। प्रशासन ने सुबह से ही भारी पुलिस बल और बुलडोजर की मौजूदगी में अभियान शुरू किया, जिससे इलाके में तनावपूर्ण माहौल बन गया।
बुज़ुर्ग डॉक्टर का टूटा आशियाना, आंखों में छलके आंसू
इस कार्रवाई में 75 वर्षीय एक बुज़ुर्ग डॉक्टर का मकान भी शामिल था। पेशे से डॉक्टर यह बुज़ुर्ग अपनी पत्नी के साथ इसी घर में वर्षों से रह रहे थे। उनके बच्चे पढ़ाई के सिलसिले में राज्य से बाहर रहते हैं।
भावुक होते हुए उन्होंने बताया कि यह घर उनकी पूरी जिंदगी की गाढ़ी कमाई से बना था। इसी मकान में उन्होंने अपने जीवन के सबसे अहम साल बिताए। बुलडोजर चलते समय वे खुद मौके पर मौजूद थे और अपनी आंखों के सामने घर को गिरते देखते रहे।
उन्होंने प्रशासन से यह भी अनुरोध किया था कि वे स्वयं घर की चाबी सौंप देंगे, लेकिन उनके अनुरोध को स्वीकार नहीं किया गया। कुछ ही मिनटों में उनका आशियाना पूरी तरह मलबे में बदल गया।
कार्रवाई की पृष्ठभूमि और कानूनी आधार
प्रशासन के अनुसार, यह पूरी कार्रवाई झारखंड हाई कोर्ट के आदेश के तहत की जा रही है। कोर्ट ने रिम्स परिसर की अतिक्रमित जमीन को खाली कराने के स्पष्ट निर्देश दिए थे।
अदालत का मानना है कि रिम्स एक महत्वपूर्ण स्वास्थ्य संस्थान है और इसके विस्तार एवं सुव्यवस्थित संचालन के लिए अतिक्रमण हटाना आवश्यक है। इसी आदेश के अनुपालन में जिला प्रशासन ने कार्रवाई शुरू की।
अधिकारियों का कहना है कि जिन मकानों को तोड़ा गया, वे सभी चिन्हित अतिक्रमण की श्रेणी में आते थे और प्रशासन के पास आदेश का पालन करने के अलावा कोई विकल्प नहीं था।
प्रशासन की प्रतिक्रिया
प्रशासनिक अधिकारियों ने स्पष्ट किया कि यह कोई चयनात्मक कार्रवाई नहीं है। सभी अतिक्रमित संरचनाओं को चिन्हित कर चरणबद्ध तरीके से हटाया जा रहा है।
अधिकारियों के अनुसार, प्रभावित लोगों को पहले से नोटिस दिया गया था। हालांकि, कई स्थानीय निवासियों का कहना है कि नोटिस की प्रक्रिया पर्याप्त नहीं थी और उन्हें तैयारी का पूरा मौका नहीं मिला।
प्रशासन ने यह भी कहा कि कोर्ट के आदेश के खिलाफ जाकर किसी को राहत देना उनके अधिकार क्षेत्र में नहीं आता।
बेघर परिवारों पर असर
इस कार्रवाई के बाद कई परिवारों के सामने रहने की गंभीर समस्या खड़ी हो गई है। बुज़ुर्ग, महिलाएं और बच्चे खुले आसमान के नीचे रहने को मजबूर हो गए हैं।
बुज़ुर्ग डॉक्टर के मामले में, घर टूटने की खबर मिलते ही बाहर पढ़ाई कर रहे उनके बच्चे भी अपनी परीक्षाएं छोड़कर रांची लौटने को मजबूर हो गए। परिवार के लिए यह केवल मकान का टूटना नहीं, बल्कि पूरी जीवन व्यवस्था का बिखर जाना है।
स्थानीय लोगों का कहना है कि ठंड के मौसम में बिना वैकल्पिक व्यवस्था के बेघर होना उनके लिए बड़ी चुनौती बन गया है।
आगे क्या?
प्रभावित परिवार अब प्रशासन और सरकार से पुनर्वास या वैकल्पिक व्यवस्था की मांग कर रहे हैं। कई लोग सामाजिक संगठनों और जनप्रतिनिधियों से भी मदद की गुहार लगा रहे हैं।
हालांकि, फिलहाल प्रशासन का रुख साफ है कि जब तक हाई कोर्ट से कोई नया निर्देश नहीं आता, तब तक कार्रवाई जारी रहेगी। आने वाले दिनों में इस मुद्दे पर राजनीतिक और सामाजिक प्रतिक्रिया तेज होने की संभावना है।
निष्कर्ष
रिम्स अतिक्रमण हटाओ अभियान ने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि कानूनी आदेश और मानवीय संवेदनाओं के बीच संतुलन कैसे बने। जहां एक ओर अदालत का आदेश सर्वोपरि है, वहीं दूसरी ओर वर्षों से बसे परिवारों का एक झटके में बेघर होना गंभीर सामाजिक चिंता का विषय बन गया है।
अब सभी की निगाहें इस पर टिकी हैं कि सरकार और प्रशासन प्रभावित परिवारों के लिए आगे क्या कदम उठाते हैं।









