मुंबई/दिल्ली: भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने देश के मुद्रा बाजार (Currency Market) को लेकर एक ऐसा फैसला सुनाया है, जिसका इंतजार बड़े निवेशक और विदेशी मुद्रा डीलर बेसब्री से कर रहे थे। पिछले कुछ महीनों से रुपये की गिरती सेहत को संभालने के लिए आरबीआई ने जो “इमर्जेंसी ब्रेक” लगाए थे, उन्हें अब हटा लिया गया है। गवर्नर संजय मल्होत्रा के इस कदम ने साफ कर दिया है कि भारतीय रुपया अब वैश्विक तूफानों से लड़ने के लिए पूरी तरह तैयार है।
क्या हुआ है बड़ा बदलाव? आसान भाषा में समझें
आरबीआई ने विदेशी मुद्रा डीलरों (Authorized Dealers) को फिर से ऑफशोर नॉन-डेलिवरेबल फॉरवर्ड मार्केट (NDF) में अपनी पोजीशन लेने की पूरी आजादी दे दी है। सरल शब्दों में कहें तो, अब बैंक और बड़े ट्रेडर्स रुपये की कीमत के उतार-चढ़ाव पर फिर से दांव लगा सकेंगे और अपने रिस्क को मैनेज कर सकेंगे। इसके साथ ही, अब कॉन्ट्रैक्ट्स को ‘रीबुक’ करने की अनुमति भी दे दी गई है, जो मार्च से बंद थी।
क्यों लगी थी पाबंदी? जब $100 के पार गया था कच्चा तेल
याद करिए मार्च का वह महीना, जब ईरान और अमेरिका के बीच युद्ध की आहट ने पूरी दुनिया को डरा दिया था। ब्रेंट क्रूड ऑयल की कीमतें $100 प्रति बैरल के पार निकल गई थीं। उस वक्त सट्टेबाजों ने रुपये के खिलाफ भारी पोजीशन बना ली थी, जिससे रुपया रिकॉर्ड निचले स्तर 95.21 तक गोता लगा गया था।
उस समय बाजार में हड़कंप था। सट्टेबाजी रोकने के लिए आरबीआई ने सख्ती की और करीब $40 बिलियन के सट्टा ट्रेड को बाजार से बाहर का रास्ता दिखाया। आज जब हालात सुधरे हैं, तो आरबीआई ने फिर से दरवाजे खोल दिए हैं।
नए नियमों के 3 सबसे बड़े पिलर
आरबीआई ने केवल पाबंदी नहीं हटाई है, बल्कि एक ‘सेफ्टी नेट’ भी तैयार किया है:
- NDF कॉन्ट्रैक्ट्स की वापसी: अब बैंक रेजिडेंट और नॉन-रेजिडेंट दोनों तरह के ग्राहकों को रुपये से जुड़े डेरिवेटिव कॉन्ट्रैक्ट ऑफर कर सकेंगे।
- रीबुकिंग की छूट: बिजनेस करने वालों के लिए राहत की खबर है; वे अब अपने फॉरेन एक्सचेंज कॉन्ट्रैक्ट्स को जरूरत पड़ने पर दोबारा बुक (Rebook) कर सकते हैं।
- $100 Million की लक्ष्मण रेखा: सट्टेबाजी दोबारा बेकाबू न हो, इसलिए बैंकों को दिन के अंत में अपनी ‘नेट ओपन पोजीशन’ को 10 करोड़ डॉलर तक ही सीमित रखना होगा।
आम आदमी और निवेशकों पर क्या होगा असर?
भले ही यह खबर तकनीकी लगे, लेकिन इसका सीधा असर आपकी इकोनॉमी पर पड़ता है। बाजार में लिक्विडिटी (नकदी का प्रवाह) बढ़ने से रुपये में स्थिरता आएगी। जब रुपया स्थिर होता है, तो आयात (Import) सस्ता होता है, जिसका सीधा असर पेट्रोल-डीजल की कीमतों और महंगाई पर पड़ता है। निवेशकों के लिए यह एक संकेत है कि भारतीय बाजार अब मैच्योर हो चुका है और वैश्विक दबाव झेलने में सक्षम है।
आगे क्या? अंतरराष्ट्रीयकरण की ओर बढ़ते कदम
गवर्नर संजय मल्होत्रा का यह फैसला केवल एक नीतिगत बदलाव नहीं, बल्कि रुपये को ‘ग्लोबल करेंसी’ बनाने की दिशा में एक बड़ी छलांग है। जानकारों का मानना है कि इन पाबंदियों के हटने से विदेशी निवेशकों (FPIs) का भरोसा भारतीय बाजार में और बढ़ेगा। अब नजरें इस बात पर हैं कि आने वाले हफ्तों में डॉलर के मुकाबले रुपया कितनी मजबूती से टिक पाता है।










