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झारखंड बोर्ड 8वीं रिजल्ट: रांची ने गाड़ा सफलता का झंडा, आखिर कैसे एक ‘प्रोजेक्ट’ ने बदल दी हजारों बच्चों की किस्मत?

Ranchi | झारखंड एकेडमिक काउंसिल (JAC) की 8वीं बोर्ड परीक्षा के नतीजों ने इस बार पूरे राज्य को चौंका दिया है। राजधानी रांची ने 96.8% की ऐतिहासिक उत्तीर्णता दर (Passing Rate) के साथ झारखंड के सभी 24 जिलों को पीछे छोड़ते हुए ‘नंबर 1’ का ताज अपने नाम कर लिया है। पिछले साल दूसरे पायदान पर रहने वाली रांची ने इस बार जो छलांग लगाई है, वह महज एक इत्तेफाक नहीं बल्कि जिला प्रशासन की उस ‘सीक्रेट रणनीति’ का नतीजा है, जिसने सरकारी स्कूलों के बच्चों को प्राइवेट स्कूल के छात्रों के बराबर लाकर खड़ा कर दिया।

पिछली हार से लिया सबक: दूसरे से पहले पायदान तक का सफर

पिछले साल रांची जिला मामूली अंतर से टॉप पर आने से चूक गया था, जिसे प्रशासन ने एक चुनौती के रूप में लिया। इस साल 96.8% रिजल्ट के साथ न केवल रांची टॉपर बना, बल्कि उसने यह भी साबित कर दिया कि अगर सरकारी सिस्टम में इच्छाशक्ति हो, तो शिक्षा के स्तर को जमीन से आसमान तक ले जाया जा सकता है। इस जीत के पीछे ‘प्रोजेक्ट टीम’ का वह मॉडल है, जिसकी चर्चा अब पूरे झारखंड के शिक्षा जगत में हो रही है।

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पिछली हार से लिया सबक: दूसरे से पहले पायदान तक का सफर

ग्राउंड रिपोर्ट: ‘प्रोजेक्ट टीम’ की वो 4 रणनीतियां, जिन्होंने रचा इतिहास

रांची जिला प्रशासन और शिक्षा विभाग ने इस साल केवल सिलेबस पूरा करने पर ध्यान नहीं दिया, बल्कि ग्राउंड लेवल पर एक ‘एक्शन प्लान’ तैयार किया। जानिए वो कौन से कदम थे जिन्होंने रांची को टॉपर बनाया:

  • 1. जीरो एब्सेंटिज़्म (Zero Absenteeism): जिले के सभी प्राथमिक और मध्य विद्यालयों में छात्रों की उपस्थिति को अनिवार्य बनाया गया। शिक्षकों को निर्देश थे कि जो बच्चा स्कूल नहीं आ रहा, उसके घर जाकर अभिभावकों से बात की जाए।
  • 2. प्री-बोर्ड का ‘कवच’: जनवरी महीने में ही सभी छात्रों के लिए प्री-बोर्ड परीक्षाएं आयोजित की गईं। इसका मकसद छात्रों के मन से बोर्ड परीक्षा का डर निकालना था।
  • 3. कमजोर छात्रों के लिए ‘स्पेशल डोज’: प्री-बोर्ड के नतीजों का बारीकी से विश्लेषण किया गया। जिन बच्चों के नंबर कम थे, उनकी अलग से पहचान कर उनके लिए ‘रेमेडियल क्लासेस’ यानी विशेष कक्षाएं लगाई गईं।
  • 4. प्रैक्टिस का ‘महाकुंभ’: मुख्य परीक्षा से पहले छात्रों को 3 पूर्व अभ्यास परीक्षाएं और 1 फुल लेंथ मॉक टेस्ट देना पड़ा। इससे छात्रों को समय प्रबंधन (Time Management) सीखने में मदद मिली।

प्रशासनिक खुशी: अधिकारियों ने कहा- ‘यह टीम वर्क की जीत है’

रांची की इस बड़ी कामयाबी पर जिला शिक्षा अधीक्षक (DSE) और जिला शिक्षा परियोजना कार्यालय के अधिकारियों में भारी उत्साह है। ब्लॉक शिक्षा अधिकारियों (BEEO) का मानना है कि इस साल मॉनिटरिंग इतनी सख्त थी कि स्कूलों में पढ़ाई का माहौल पूरी तरह बदल गया। अधिकारियों ने इसका श्रेय शिक्षकों की कड़ी मेहनत और छात्रों के अटूट विश्वास को दिया है।

आगे क्या? क्या अन्य जिले अपनाएंगे ‘रांची मॉडल’?

रांची की इस सफलता के बाद अब चर्चा इस बात की है कि क्या झारखंड के अन्य जिले जैसे जमशेदपुर, धनबाद और हजारीबाग भी अगले साल इसी ‘प्रोजेक्ट मॉडल’ को अपनाएंगे? मुख्यमंत्री कार्यालय और शिक्षा विभाग इस सफलता की केस स्टडी तैयार कर सकते हैं ताकि पूरे राज्य का औसत परिणाम सुधारा जा सके।

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Subhash Shekhar

सुभाष शेखर पिछले दो दशकों से अधिक समय से पत्रकारिता जगत में सक्रिय हैं। साल 2003 में बुंडू (झारखंड) की जमीनी समस्याओं को आवाज देने से शुरू हुआ उनका सफर आज 'Local Khabar' के माध्यम से डिजिटल पत्रकारिता के नए आयाम स्थापित कर रहा है। प्रभात खबर, ताजा टीवी, नक्षत्र न्यूज और राष्ट्रीय खबर जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों में संपादकीय और ग्राउंड रिपोर्टिंग का अनुभव रखने वाले सुभाष, आज के दौर के उन गिने-चुने पत्रकारों में से हैं जो खबर की बारीकियों के साथ-साथ वेब डिजाइनिंग और SEO जैसी तकनीकी विधाओं में भी महारत रखते हैं। वे वर्तमान में Local Khabar के संस्थापक और संपादक के रूप में झारखंड की जनपक्षीय खबरों का नेतृत्व कर रहे हैं।

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