Ranchi | रांची में रिम्स परिसर से अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई उस समय विवाद का केंद्र बन गई, जब आदिवासी नेत्री निशा भगत ने बुलडोजर कार्रवाई का विरोध किया। प्रशासन और पुलिस के साथ आमने-सामने की स्थिति बनी, जिसके बाद पुलिस ने निशा भगत को हिरासत में ले लिया। इस घटना का वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है।
रांची के रिम्स (राजेंद्र आयुर्विज्ञान संस्थान) परिसर में प्रशासन द्वारा अतिक्रमण हटाने का अभियान चलाया जा रहा था। इसी दौरान आदिवासी नेत्री निशा भगत मौके पर पहुंचीं और कार्रवाई का खुला विरोध शुरू कर दिया।
प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, निशा भगत बुलडोजर के सामने खड़ी हो गईं और काम रुकवाने की कोशिश करने लगीं। उन्होंने प्रशासन से रिम्स की जमीन से जुड़े दस्तावेज दिखाने की मांग की और कहा कि बिना कागजात देखे वे वहां से नहीं हटेंगी।
विरोध के दौरान निशा भगत जमीन पर लेट गईं और प्रभावित परिवारों के पक्ष में नारेबाजी करने लगीं। स्थिति तनावपूर्ण होते देख पुलिस ने उन्हें हटाने का प्रयास किया, जिसके बाद विवाद और बढ़ गया।
अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई
प्रशासन का कहना है कि रिम्स की अधिसूचित जमीन पर वर्षों से अवैध निर्माण किया गया था। अस्पताल के विस्तार और स्वास्थ्य सेवाओं को बेहतर करने के लिए जमीन को खाली कराना आवश्यक है।
अभियान के तहत कई झोपड़ियों और पक्के मकानों को चिन्हित किया गया है। प्रशासन का दावा है कि यह कार्रवाई कानून के तहत की जा रही है और रिम्स प्रबंधन के अनुरोध पर जिला प्रशासन ने कदम उठाया है।
निशा भगत के आरोप
निशा भगत ने आरोप लगाया कि बिना पूर्व सूचना और बिना वैकल्पिक व्यवस्था लोगों के घर तोड़े जा रहे हैं। उन्होंने कहा कि प्रभावित परिवारों के पास न रहने का ठिकाना है, न खाने-पीने के संसाधन।
उन्होंने यह भी दावा किया कि कई घरों पर बैंक लोन चल रहा है, जिसकी किस्तें अब भी चुकानी हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि यदि घर तोड़े जा रहे हैं, तो उन कर्जों की जिम्मेदारी कौन लेगा।
निशा भगत का कहना है कि कई परिवारों ने अपनी पूरी जमा पूंजी घर बनाने में लगा दी थी और अब वे पूरी तरह असहाय हो गए हैं।
पुलिस कार्रवाई और हिरासत का मामला
स्थिति बिगड़ने पर पुलिस ने हस्तक्षेप किया और निशा भगत को मौके से हटाने की कोशिश की। इसी दौरान आरोप है कि एक महिला पुलिसकर्मी ने उन्हें थप्पड़ मारा।
इसके बाद पुलिस ने निशा भगत को जबरन उठाकर वाहन में बैठाया और हिरासत में ले लिया। पुलिस प्रशासन ने फिलहाल इस आरोप पर कोई आधिकारिक बयान जारी नहीं किया है।
वायरल वीडियो
घटना का वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहा है। वीडियो में बुलडोजर के सामने खड़ी निशा भगत, पुलिस के साथ बहस और हिरासत की तस्वीरें दिखाई दे रही हैं।
घटना के बाद कई आदिवासी संगठनों ने नाराजगी जताई है। उनका कहना है कि शांतिपूर्ण विरोध दर्ज कराना नागरिकों का अधिकार है और इस तरह की कार्रवाई लोकतांत्रिक मूल्यों के खिलाफ है।
राजनीतिक हलकों में भी इस मामले को लेकर चर्चा तेज हो गई है और आने वाले दिनों में इस पर बयानबाजी बढ़ने की संभावना है।
प्रशासन की जिम्मेदारी और कानूनी सवाल
इस पूरे मामले में सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या अतिक्रमण हटाने से पहले तय प्रक्रिया का पूरी तरह पालन किया गया। क्या प्रभावित परिवारों को नोटिस दिया गया था और क्या पुनर्वास की कोई ठोस योजना मौजूद थी।
विशेषज्ञों का मानना है कि विकास परियोजनाओं के साथ-साथ मानवीय पहलुओं को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। किसी भी कार्रवाई से पहले सामाजिक प्रभाव का आकलन जरूरी होता है।
आगे क्या?
निशा भगत की हिरासत और पुलिस पर लगे आरोपों के बाद मामला और गंभीर हो सकता है। आदिवासी संगठनों ने आंदोलन तेज करने के संकेत दिए हैं।
प्रशासन की ओर से जल्द ही आधिकारिक बयान आने की संभावना है। वहीं, इस मामले पर कानूनी प्रक्रिया और राजनीतिक प्रतिक्रिया आने वाले दिनों में स्थिति को और स्पष्ट करेगी।
रिम्स अतिक्रमण हटाओ अभियान अब केवल प्रशासनिक कार्रवाई नहीं रह गया है, बल्कि यह सामाजिक और राजनीतिक बहस का मुद्दा बन चुका है। निशा भगत की हिरासत ने इस पूरे मामले को और संवेदनशील बना दिया है। आने वाले समय में प्रशासन, पुलिस और आदिवासी संगठनों के बीच संवाद ही इस विवाद का समाधान निकाल सकता है।









