डॉक्टर बाबू बनने का सपना है? कहीं काउंसलिंग के ‘रायते’ में डूब न जाए आपकी MBBS सीट; ये 3 गलतियां और सब खत्म!

डॉक्टर बाबू बनने का सपना है? कहीं काउंसलिंग के 'रायते' में डूब न जाए आपकी MBBS सीट; ये 3 गलतियां और सब खत्म!

NEET tips: देखिए भाई, NEET की परीक्षा निकालना तो बस ‘पिक्चर का ट्रेलर’ था, असली क्लाइमैक्स तो अब काउंसलिंग के मैदान में शुरू हुआ है। कई सूरमा 700 नंबर लाकर भी घर बैठे रह जाते हैं और कम नंबर वाले दिमाग लगाकर सरकारी मेडिकल कॉलेज की कैंटीन में समोसे खा रहे होते हैं।

क्यों? क्योंकि भाईसाहब, काउंसलिंग कोई फॉर्म भरना नहीं, बल्कि ‘चेस (Chess) की चाल’ है। अगर आपने एक भी गलत प्यादा चला, तो समझो करियर का ‘चेकमेट’ पक्का!

1. AIQ vs State Quota: दिल्ली जाएंगे या घर के पास रहेंगे?

काउंसलिंग के दो मोहल्ले हैं। पहला है ऑल इंडिया कोटा (15%)—जहाँ पूरे देश के चीते आपस में भिड़ते हैं। दूसरा है आपका अपना स्टेट कोटा (85%)—जहाँ आपकी ‘लोकल पावर’ (डोमिसाइल) काम आती है। लोग जोश-जोश में सिर्फ बड़े शहरों के पीछे भागते हैं और अपने राज्य की बेहतरीन सीट हाथ से गँवा देते हैं।

2. चॉइस फिलिंग: ये ‘शादी का बायोडाटा’ नहीं है, ज़रा संभल के!

छात्रों की सबसे बड़ी बीमारी— “मैं तो सिर्फ टॉप-3 कॉलेज ही भरूंगा।” भाई, ये कोई ज़िद पूरी करने की जगह नहीं है।

  • फ्रीज (Freeze): मतलब ‘शादी पक्की’, अब मुझे यही कॉलेज चाहिए।
  • फ्लोट (Float): मतलब ‘रिश्ता तो ठीक है, पर क्या इससे सुंदर (बेहतर) मिल सकता है?’
  • स्लाइड (Slide): मतलब ‘घर (कॉलेज) तो यही चाहिए, बस कमरा (कोर्स) बदल दो।’

पिछले साल एक छात्र ने चॉइस लॉक करने में ऐसी जल्दबाजी की कि उसे लेना था दिल्ली का कॉलेज और मिल गया कहीं दूर का कोना, सिर्फ इसलिए क्योंकि उसने लिस्ट री-चेक नहीं की थी।

3. डॉक्यूमेंट्स का ‘लोचा’ और एंड-टाइम की भगदड़

अगर आपका ‘कास्ट सर्टिफिकेट’ पुराना है या मार्कशीट की फोटोकॉपी धुंधली है, तो सिस्टम को आप पर तरस नहीं आएगा। वो सीधे कहेगा— ‘थैंक यू, नेक्स्ट!’

प्रो टिप: इंटरनेट कैफे वाले के भरोसे न रहें। आखिरी तारीख का इंतज़ार वो लोग करते हैं जिन्हें रिस्क पसंद है। आप डॉक्टर बनने जा रहे हैं, खिलाड़ी नहीं!

आगे क्या होगा?

सरकार ने इस बार ‘स्मार्ट सॉफ्टवेयर’ तैनात किया है। सीट मैट्रिक्स आने वाली है। अगर आप चाहते हैं कि आपके गले में स्टेथोस्कोप सजे, तो इस काउंसलिंग के खेल को हल्के में न लें। याद रखिए, कॉलेज रैंक से नहीं, ‘सही चॉइस’ से मिलता है।

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Subhash Shekhar

सुभाष शेखर पिछले दो दशकों से अधिक समय से पत्रकारिता जगत में सक्रिय हैं। साल 2003 में बुंडू (झारखंड) की जमीनी समस्याओं को आवाज देने से शुरू हुआ उनका सफर आज 'Local Khabar' के माध्यम से डिजिटल पत्रकारिता के नए आयाम स्थापित कर रहा है। प्रभात खबर, ताजा टीवी, नक्षत्र न्यूज और राष्ट्रीय खबर जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों में संपादकीय और ग्राउंड रिपोर्टिंग का अनुभव रखने वाले सुभाष, आज के दौर के उन गिने-चुने पत्रकारों में से हैं जो खबर की बारीकियों के साथ-साथ वेब डिजाइनिंग और SEO जैसी तकनीकी विधाओं में भी महारत रखते हैं। वे वर्तमान में Local Khabar के संस्थापक और संपादक के रूप में झारखंड की जनपक्षीय खबरों का नेतृत्व कर रहे हैं।

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