रांची: झारखंड में सूचना आयुक्तों की नियुक्ति को लेकर एक ऐसा विवाद खड़ा हो गया है जिसने राज्य की राजनीति में भूचाल ला दिया है। सूचना के अधिकार (RTI) की शुचिता को ताक पर रखते हुए, चयन समिति ने जिन पांच नामों पर मुहर लगाई है, उनमें से तीन नाम सीधे तौर पर सक्रिय राजनीति से जुड़े हैं। आरोप है कि जनता को जवाबदेही देने वाले इस संस्थान पर अब ‘राजनीति का पहरा’ बैठाने की तैयारी है, जिसे लेकर RTI कार्यकर्ताओं ने मोर्चा खोल दिया है।
सूचना की ‘कुर्सी’ पर राजनीति का कब्जा? इन तीन नामों ने बढ़ाई बेचैनी
राज्य सरकार की हाई पावर कमेटी द्वारा तय किए गए नामों में भाजपा के मीडिया प्रभारी शिवपूजन पाठक, कांग्रेस महासचिव अमूल्य नीरज खलखो और झामुमो नेता तनुज खत्री के नाम शामिल हैं। जैसे ही ये नाम सार्वजनिक हुए, सोशल मीडिया से लेकर गलियारों तक एक ही सवाल गूंज रहा है—क्या सूचना आयोग अब राजनीतिक दलों का ‘रिटायरमेंट होम’ बन गया है?
RTI कार्यकर्ता सुनील महतो ने इस पर कड़ी आपत्ति जताते हुए सीधे राज्यपाल से शिकायत की है। उन्होंने तीखा प्रहार करते हुए कहा, “मुद्दा जनता का नहीं, कुर्सी का है। जब सूचना के अधिकार अधिनियम की आत्मा पर ही समझौता हो रहा हो, तो ‘चोर-चोर मौसेरे भाई’ वाली कहावत आज सच साबित होती दिख रही है।”
RTI कानून की सरेआम अनदेखी? क्या कहता है नियम
सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 के अध्याय चार में स्पष्ट दिशा-निर्देश दिए गए हैं। अधिनियम के पारा छह के अनुसार:
- राज्य मुख्य सूचना आयुक्त या सूचना आयुक्त संसद या किसी विधानमंडल का सदस्य नहीं होगा।
- वह किसी भी लाभ के पद पर नहीं होना चाहिए।
- सबसे महत्वपूर्ण बात, वह किसी राजनीतिक दल से संबद्ध नहीं होना चाहिए और न ही कोई व्यवसाय कर रहा हो।
ऐसे में सक्रिय राजनीतिक पदों पर बैठे नेताओं का चयन सीधे तौर पर कानून के प्रावधानों को चुनौती देता नजर आ रहा है।
हाईकोर्ट में 13 अप्रैल को ‘अग्निपरीक्षा’, 22 हजार से ज्यादा अपीलें लंबित
झारखंड सूचना आयोग पिछले कई वर्षों से लगभग निष्क्रिय पड़ा है। आंकड़ों की स्थिति डरावनी है:
- 8 मई 2020 से आयोग में अपीलों की सुनवाई ठप है।
- वर्तमान में 22,657 अपीलें और 430 शिकायतें धूल फांक रही हैं।
- मुख्य सूचना आयुक्त और आयुक्तों के सभी स्वीकृत पद खाली हैं।
विशाल कुमार की ओर से हाईकोर्ट में एक हस्तक्षेप याचिका दायर की गई है, जिस पर 13 अप्रैल को सुनवाई होनी है। सुप्रीम कोर्ट ने पहले ही सरकार को 45 दिनों के भीतर नियुक्तियां करने का समय दिया था, लेकिन अब चयन प्रक्रिया की पारदर्शिता पर ही सवालिया निशान लग गया है।
“जनता को अंधेरे में रखने की साजिश”
ग्राउंड जीरो पर स्थिति यह है कि आम आदमी जब भ्रष्टाचार के खिलाफ सूचना मांगता है, तो उसे महीनों इंतजार करना पड़ता है। अगर इन पदों पर राजनीतिक नियुक्तियां होती हैं, तो निष्पक्षता की उम्मीद खत्म हो जाएगी। विशेषज्ञ मानते हैं कि यदि सूचना आयुक्त किसी दल के प्रति वफादार होंगे, तो वे सरकार के खिलाफ सूचनाएं सार्वजनिक करने में संकोच करेंगे।
आगे क्या? अब सबकी निगाहें राजभवन पर टिकी हैं। क्या राज्यपाल इन विवादित नामों को मंजूरी देंगे या इसे पुनर्विचार के लिए वापस भेजेंगे? 13 अप्रैल को हाईकोर्ट की टिप्पणी इस मामले में निर्णायक मोड़ साबित हो सकती है।











