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झारखंड में ‘मुर्दा कानून’ से दर्ज हो रही FIR? पूर्व विधायक अंबा प्रसाद के खुलासे से हड़कंप, CM सोरेन से बड़ी मांग

Ranchi | क्या झारखंड में पुलिस आज भी उन कानूनों के तहत काम कर रही है जो देश में खत्म हो चुके हैं? यह सवाल राज्य की सियासत और कानून व्यवस्था के गलियारों में बिजली की तरह दौड़ रहा है। पूर्व विधायक अंबा प्रसाद ने एक ऐसा चौंकाने वाला दावा किया है, जिसने राज्य की पूरी पुलिसिंग और डिजिटल सिस्टम पर सवालिया निशान लगा दिए हैं। उनका आरोप है कि देश में नए कानून लागू हुए डेढ़ साल बीत जाने के बाद भी झारखंड के थानों में पुराने CrPC के तहत ही मुकदमे दर्ज किए जा रहे हैं।

क्या है पूरा मामला? क्यों उठ रहे हैं सवाल?

दरअसल, भारत सरकार ने 1 जुलाई 2024 से दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) को खत्म कर भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) को प्रभावी बना दिया था। कानूनी रूप से अब किसी भी अपराध की FIR नई धाराओं के तहत होनी चाहिए। लेकिन अंबा प्रसाद का दावा है कि झारखंड में NCRB (नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो) के ऑनलाइन फॉर्म पर अभी भी पुरानी धारा 154 (CrPC) ही अंकित की जा रही है, जबकि इसकी जगह धारा 173 (BNSS) होनी चाहिए।

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‘डेढ़ साल बाद भी सो रहा है सिस्टम’ – अंबा प्रसाद का सीधा हमला

अंबा प्रसाद ने मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन को पत्र लिखकर इस मामले में तुरंत संज्ञान लेने की मांग की है। उन्होंने कहा:

“यह बेहद हैरान करने वाला है कि एक ‘मृत कानून’ को सरकारी दस्तावेजों में अब तक ढोया जा रहा है। कल और परसों दर्ज हुई प्राथमिकियों में भी पुराने कानून का जिक्र है। क्या हमारे सिस्टम को पता ही नहीं कि कानून बदल चुका है?”

हजारों FIR पर मंडराया कानूनी खतरा!

अगर अंबा प्रसाद के दावे सही हैं, तो यह केवल एक तकनीकी गलती नहीं बल्कि एक बड़ा कानूनी संकट बन सकता है। जानकारों का मानना है कि:

  • कोर्ट में चुनौती: गलत धाराओं के तहत दर्ज FIR को अपराधी के वकील तकनीकी आधार पर कोर्ट में चुनौती दे सकते हैं।
  • जांच पर असर: अगर केस की बुनियाद ही पुराने कानून पर टिकी है, तो पूरी चार्जशीट पर सवाल उठ सकते हैं।
  • डिजिटल लापरवाही: यह सीधे तौर पर पुलिस के IT सेल और NCRB के तालमेल की कमी को दर्शाता है।
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आम आदमी पर इसका क्या होगा असर?

झारखंड के दूर-दराज के थानों में जब कोई आम आदमी न्याय के लिए पहुंचता है, तो उसे नहीं पता होता कि धारा 154 (CrPC) और 173 (BNSS) में क्या फर्क है। लेकिन कानूनी प्रक्रिया में यह अंतर ‘जमीन-आसमान’ का है। अगर सिस्टम अपडेट नहीं हुआ, तो आने वाले समय में हजारों पीड़ितों को इंसाफ मिलने में देरी हो सकती है या उनके केस कमजोर पड़ सकते हैं।

प्रशासन का अगला कदम क्या होगा?

इस खुलासे के बाद अब गेंद मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन और झारखंड डीजीपी के पाले में है।

  1. क्या यह सॉफ्टवेयर ग्लिच (Glitch) है जिसे अपडेट नहीं किया गया?
  2. क्या पुलिस कर्मियों को नए कानूनों की ट्रेनिंग सही से नहीं मिली?
  3. क्या अब तक दर्ज हुई हजारों FIR में सुधार (Rectification) किया जाएगा?

विपक्ष भी इस मुद्दे को भुनाने की तैयारी में है, जिससे सरकार पर दबाव बढ़ना तय है।

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Subhash Shekhar

सुभाष शेखर पिछले दो दशकों से अधिक समय से पत्रकारिता जगत में सक्रिय हैं। साल 2003 में बुंडू (झारखंड) की जमीनी समस्याओं को आवाज देने से शुरू हुआ उनका सफर आज 'Local Khabar' के माध्यम से डिजिटल पत्रकारिता के नए आयाम स्थापित कर रहा है। प्रभात खबर, ताजा टीवी, नक्षत्र न्यूज और राष्ट्रीय खबर जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों में संपादकीय और ग्राउंड रिपोर्टिंग का अनुभव रखने वाले सुभाष, आज के दौर के उन गिने-चुने पत्रकारों में से हैं जो खबर की बारीकियों के साथ-साथ वेब डिजाइनिंग और SEO जैसी तकनीकी विधाओं में भी महारत रखते हैं। वे वर्तमान में Local Khabar के संस्थापक और संपादक के रूप में झारखंड की जनपक्षीय खबरों का नेतृत्व कर रहे हैं।

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