JLKM-JMM पर गिरी गाज, जब चुनाव ‘गैर-दलीय’ तो लेटर पैड पर समर्थन क्यों? | झारखंड निकाय चुनाव

JLKM-JMM पर गिरी गाज, जब चुनाव 'गैर-दलीय' तो लेटर पैड पर समर्थन क्यों? | झारखंड निकाय चुनाव

Ranchi | झारखंड के निकाय चुनावों में इस बार एक अजीबोगरीब खेल शुरू हो गया है। नियम कहते हैं कि चुनाव ‘गैर-दलीय’ (Non-Party Based) होंगे, यानी कोई भी पार्टी अपने सिंबल पर प्रत्याशी नहीं उतार सकती। लेकिन हकीकत की जमीन पर नजारा कुछ और ही है। बड़े-बड़े राजनीतिक दल अब आधिकारिक लेटर पैड पर प्रत्याशियों को समर्थन की घोषणा कर रहे हैं। लोहर्दगा से लेकर रामगढ़ तक, इस ‘पर्दे के पीछे वाले खेल’ ने अब चुनाव आयोग की नींद उड़ा दी है और आचार संहिता उल्लंघन के मामले दर्ज होने शुरू हो गए हैं।

क्या है पूरा विवाद? क्यों मचा है हड़कंप?

झारखंड में नगर निकाय चुनाव की सुगबुगाहट के बीच राज्य निर्वाचन आयोग ने स्पष्ट किया था कि कोई भी पार्टी किसी प्रत्याशी के पक्ष में सार्वजनिक या लिखित समर्थन नहीं देगी। ऐसा करना आदर्श चुनाव आचार संहिता (Model Code of Conduct) का सीधा उल्लंघन माना जाएगा।

बावजूद इसके, राजनीतिक दल न केवल प्रत्याशियों के नाम फाइनल कर रहे हैं, बल्कि अपने जिला अध्यक्षों के माध्यम से लेटर पैड पर ‘ऑफिशियल सपोर्ट’ का ऐलान भी कर रहे हैं। सवाल यह है कि जब चुनाव पार्टियों के नाम पर है ही नहीं, तो ये दल ‘घुसपैठ’ क्यों कर रहे हैं?

लोहरदगा और रामगढ़ में एक्शन: झामुमो और JLKM पर गिरी गाज

ग्राउंड जीरो से आ रही खबरें बता रही हैं कि पार्टियों का अति-उत्साह अब उनके लिए मुसीबत बन गया है:

  • रामगढ़ में FIR: झारखंड लोकतांत्रिक क्रांतिकारी मोर्चा (JLKM) के जिला अध्यक्ष देवानंद कुमार महतो पर आचार संहिता उल्लंघन का केस दर्ज किया गया है। आरोप है कि उन्होंने लेटर पैड के जरिए प्रत्याशी के नाम की घोषणा की और ’10 सूत्री विजन’ जारी किया।
  • लोहरदगा में नोटिस की तैयारी: झामुमो (JMM) जिला अध्यक्ष मोजम्मिल अहमद ने भी लेटर पैड पर बालमुकुंद लोहरा को समर्थन देने की घोषणा कर दी। हालांकि उन्होंने इसे जन-इच्छा बताया है, लेकिन प्रशासन अब इसे नोटिस भेजने और राज्य निर्वाचन आयोग से दिशा-निर्देश मांगने की तैयारी में है।

पार्टियों पर ये हैं ‘सख्त पाबंदियां’

अगर आप सोच रहे हैं कि आखिर मनाही किस बात की है, तो इन 5 बिंदुओं को समझें:

  1. किसी भी प्रत्याशी के पक्ष में लिखित या सार्वजनिक घोषणा वर्जित है।
  2. रैलियों या जुलूस में राजनीतिक दल के झंडे और बैनर का उपयोग नहीं होगा।
  3. कोई भी पार्टी प्रत्याशी के समर्थन में प्रेस कॉन्फ्रेंस नहीं कर सकती।
  4. पार्टी के नाम से पंपलेट या पोस्टर नहीं छपवाए जा सकते।
  5. चुनाव चिन्ह (Symbol) का प्रदर्शन किसी भी हाल में नहीं किया जाएगा।

आम आदमी पर क्या होगा इसका असर?

इस राजनीतिक खींचतान का सीधा असर मतदाता पर पड़ता है। गैर-दलीय चुनाव का मकसद स्थानीय मुद्दों को प्रधानता देना होता है, न कि हाई-प्रोफाइल पार्टी राजनीति को। जब पार्टियां इसमें कूदती हैं, तो गली-मोहल्ले के मुद्दे कहीं न कहीं राजनीतिक विचारधारा की भेंट चढ़ जाते हैं।

एक्सपर्ट कमेंट: “यह एक कानूनी ग्रे-एरिया है। पार्टियां अपनी जमीन बचाने के लिए लेटर पैड का सहारा ले रही हैं, लेकिन प्रशासन की सख्ती ने यह साफ कर दिया है कि नियमों को ठेंगा दिखाना अब आसान नहीं होगा।”

आगे क्या? प्रशासन का अगला कदम

राज्य निर्वाचन आयोग इस मामले में बेहद सख्त रुख अपना सकता है। अगर यह ट्रेंड जारी रहा, तो कई अन्य जिला अध्यक्षों पर भी गाज गिर सकती है। क्या आयोग इन प्रत्याशियों की उम्मीदवारी रद्द करेगा? या पार्टियों को नए सिरे से चेतावनी दी जाएगी? आने वाले 24 घंटे झारखंड की स्थानीय राजनीति के लिए निर्णायक होने वाले हैं।

Subhash Shekhar

एक अनुभवी डिजिटल पत्रकार, कंटेंट स्ट्रैटेजिस्ट और SEO-फोकस्ड न्यूज़ राइटर हैं। वे झारखंड और बिहार से जुड़े राजनीति, प्रशासन, सामाजिक मुद्दों, शिक्षा, स्वास्थ्य और करंट अफेयर्स पर तथ्यपरक और भरोसेमंद रिपोर्टिंग के लिए जाने जाते हैं।

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