Ranchi : झारखंड हाईकोर्ट ने राजधानी रांची के सुखदेव नगर (रातू रोड) स्थित करोड़ों की आदिवासी जमीन विवाद में शुक्रवार को जो रुख अपनाया, उसने भू-माफियाओं और सिस्टम को हिलाकर रख दिया है। जस्टिस राजेश शंकर की अदालत ने प्रार्थी महादेव उरांव को फटकार लगाते हुए स्पष्ट कहा कि अदालत से सच छिपाना और गुमराह करना न्यायिक प्रक्रिया का अपमान है। कोर्ट ने न केवल प्रार्थी को ‘कारण बताओ नोटिस’ जारी किया है, बल्कि उन 12 परिवारों को भी जीवनदान दिया है जिनके आशियानों पर बुलडोजर का साया मंडरा रहा था।
अदालत में शपथ पत्र में दबा ली सच्चाई
शुक्रवार को सुनवाई के दौरान माहौल तब गरमा गया जब अदालत ने पाया कि प्रार्थी महादेव उरांव ने कोर्ट में दाखिल अपने शपथ पत्र में पैसों के लेन-देन की बात को पूरी तरह गोल कर दिया था।
हस्तक्षेपकर्ताओं (पीड़ित परिवारों) के अधिवक्ता गौरव राज ने अदालत के सामने पुख्ता सबूत रखे कि पीड़ितों ने 5.25 लाख रुपये प्रति कट्ठा की दर से महादेव उरांव को कुल 1 करोड़ 8 लाख 93 हजार 750 रुपये का भुगतान किया है। प्रार्थी द्वारा इस भारी-भरकम राशि को स्वीकार न करना कोर्ट की नजर में ‘सफेद झूठ’ साबित हुआ। अदालत ने सख्त लहजे में पूछा— “क्यों न आपके खिलाफ आपराधिक कानूनों के तहत कार्रवाई की जाए?”
बुलडोजर पर ब्रेक: 12 परिवारों की सांसों में लौटी सांस
रातू रोड के खादगड़ा शिव दुर्गा मंदिर रोड स्थित उन घरों के लिए आज की सुबह उम्मीद की किरण लेकर आई। 13 फरवरी 2026 को जिला प्रशासन की जिस कार्रवाई पर रोक लगी थी, हाईकोर्ट ने उसे 19 जून तक के लिए बढ़ा दिया है।
- राहत का दायरा: 12 घर जो पिछले 5-6 दशकों से वहां बसे हैं।
- कोर्ट का तर्क: जब मामला दशकों पुराने कब्जे का है, तो अचानक उसे ध्वस्त करने की इतनी हड़बड़ी क्यों?
- अगला कदम: 19 जून को होने वाली सुनवाई में अब प्रार्थी को अपनी सफाई पेश करनी होगी।
प्रशासनिक कार्यशैली पर कोर्ट का हंटर: CO के जवाब से असंतुष्ट न्यायपीठ
हाईकोर्ट की रडार पर केवल प्रार्थी ही नहीं, बल्कि हेहल अंचलाधिकारी (CO) भी रहे। इससे पहले की सुनवाई में जब CO ने तर्क दिया था कि “दस्तावेज न मिलने पर मकान तोड़ने की कार्रवाई की गई,” तो कोर्ट ने इस दलील को सिरे से खारिज कर दिया था।
कोर्ट का चुभता सवाल: “अगर मामला सिर्फ अतिक्रमण हटाने का था, तो क्या प्रशासन का पहला काम सीधे बने-बनाए घरों को जमींदोज करना होता है? क्या यह प्रक्रिया न्यायसंगत है?”
38 डिसमिल जमीन और 50 साल का संघर्ष
विवाद की जड़ में 38.25 डिसमिल मुंडारी जमीन है। स्थानीय निवासियों का कहना है कि उन्होंने पाई-पाई जोड़कर यह जमीन खरीदी थी। वर्षों से टैक्स दे रहे और बिजली कनेक्शन रखने वाले इन लोगों को अचानक ‘अतिक्रमणकारी’ घोषित कर दिया गया। हाईकोर्ट की हालिया सख्ती ने अब इस पूरे विवाद में धोखाधड़ी और प्रशासनिक मिलीभगत के एंगल को हवा दे दी है।
क्या अब बदलेगा झारखंड में जमीन विवाद का रुख?
यह मामला केवल एक महादेव उरांव या 12 परिवारों का नहीं है। यह उन हजारों लोगों की उम्मीद है जो जमीन सौदों में पारदर्शिता न होने के कारण अदालतों के चक्कर काट रहे हैं। हाईकोर्ट का ‘कारण बताओ नोटिस’ एक नजीर है कि कानून के सामने तथ्यों को तोड़ना-मरोड़ना भारी पड़ सकता है। अब सबकी निगाहें 19 जून पर टिकी हैं, जब यह साफ होगा कि ‘सफेद झूठ’ बोलने वाले पर कानून का डंडा कितना जोर से चलता है।
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