Ranchi। झारखंड हाई कोर्ट ने वैवाहिक अधिकारों और महिलाओं की गरिमा को लेकर एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट कर दिया है कि किसी भी पत्नी को उसकी इच्छा के विरुद्ध पति के साथ रहने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता, खासकर तब जब मामला शारीरिक और मानसिक प्रताड़ना से जुड़ा हो। जस्टिस एस.एन. प्रसाद और जस्टिस ए.के. राय की खंडपीठ ने धनबाद फैमिली कोर्ट के उस आदेश को सिरे से खारिज कर दिया, जिसमें महिला को वापस ससुराल जाने का निर्देश दिया गया था।
यह मामला केवल एक कानूनी लड़ाई नहीं, बल्कि उन हजारों महिलाओं के हक की आवाज बन गया है जो बंद कमरों में ‘क्रूरता’ का शिकार होती हैं। हाई कोर्ट ने सख्त लहजे में कहा कि ‘सम्मान और गरिमा’ के बिना किसी भी महिला को शादी के बंधन में जबरन बांधे रखना असंवैधानिक है।
फैमिली कोर्ट के फैसले पर हाई कोर्ट की ‘सर्जिकल स्ट्राइक’
धनबाद फैमिली कोर्ट ने 10 मई 2024 को एक आदेश पारित किया था, जिसमें पति द्वारा दायर ‘वैवाहिक अधिकारों की बहाली’ (Restitution of Conjugal Rights) की याचिका को स्वीकार करते हुए पत्नी को साथ रहने का आदेश दिया गया था। हाई कोर्ट ने इस आदेश को तथ्यों के विपरीत और त्रुटिपूर्ण पाया।
क्यों पलटा गया फैसला? (मुख्य बिंदु):
- अधूरा मूल्यांकन: हाई कोर्ट ने पाया कि फैमिली कोर्ट ने गवाहों और सबूतों का पूरी तरह से विश्लेषण नहीं किया था।
- चुनिंदा बयान: निचली अदालत ने केवल पति के पक्ष या चुनिंदा बयानों को आधार बनाया, जो न्याय के सिद्धांतों के खिलाफ था।
- सुरक्षा का सवाल: जब पत्नी ने दहेज प्रताड़ना और मारपीट के गंभीर आरोप लगाए हैं, तो उसे उसी माहौल में वापस भेजना उसकी सुरक्षा से समझौता करना है।
क्रूरता और झूठ की बुनियाद पर नहीं टिक सकता रिश्ता
पीड़िता ने अपनी याचिका में जो खुलासे किए, वे चौंकाने वाले हैं। महिला ने बताया कि शादी के समय पति की नौकरी को लेकर झूठ बोला गया था। शादी के बाद से ही उसे दहेज के लिए शारीरिक और मानसिक तौर पर प्रताड़ित किया जाने लगा।
विवाहिता का पक्ष:
- 2018 से अलग: पीड़िता पिछले 8 सालों से (2018 से) अपने मायके में रह रही है।
- आपराधिक मामला: पति और ससुराल वालों के खिलाफ धारा 498A (दहेज प्रताड़ना) के तहत मामला दर्ज है।
- गरिमा का सवाल: महिला का तर्क था कि जिस घर में उसकी जान को खतरा हो और जहां उसे ‘वस्तु’ समझा जाए, वहां वह वापस नहीं जा सकती।
अदालत की बड़ी टिप्पणी: ‘शादी बचाना मकसद है, प्रताड़ना सहना नहीं’
जस्टिस एस.एन. प्रसाद और जस्टिस ए.के. राय की खंडपीठ ने अपने फैसले में एक ऐसी लकीर खींची है जो भविष्य के वैवाहिक विवादों में नजीर बनेगी। अदालत ने कहा:
“वैवाहिक अधिकारों की बहाली के कानून का उद्देश्य उजड़ते घर को बचाना है, न कि किसी पक्ष को क्रूरता सहने के लिए मजबूर करना। अगर पत्नी को लगता है कि वह सम्मान के साथ नहीं रह सकती, तो कानून उसे मजबूर नहीं कर सकता।”
आम आदमी और समाज पर क्या होगा असर?
यह फैसला उन पुरुषों के लिए एक चेतावनी है जो ‘Restitution of Conjugal Rights’ (Section 9) का इस्तेमाल पत्नी को वापस बुलाने के लिए एक हथियार के रूप में करते हैं। वहीं, यह उन महिलाओं के लिए उम्मीद की किरण है जो कानूनी पेचीदगियों की वजह से अपनी मर्जी के खिलाफ ससुराल में रहने को मजबूर थीं। झारखंड हाई कोर्ट ने साफ कर दिया है कि ‘राइट टू डिग्निटी’ (गरिमा का अधिकार) किसी भी सामाजिक अनुबंध से ऊपर है।
आगे क्या? अब इस आदेश के बाद धनबाद फैमिली कोर्ट का पिछला निर्देश शून्य हो गया है। पति को अब नए सिरे से अपनी बेगुनाही साबित करनी होगी या फिर कानूनी रूप से अलग होने की प्रक्रिया की ओर बढ़ना होगा। प्रशासन और विधि विशेषज्ञों का मानना है कि इस फैसले से घरेलू हिंसा के मामलों में महिलाओं का पक्ष मजबूत होगा।








