Ranchi | झारखंड में तपती गर्मी और गहराते जल संकट के बीच एक बड़ी खबर सामने आ रही है। दुनिया भर में ‘वॉटरमैन ऑफ इंडिया’ के नाम से मशहूर और जल का नोबेल (स्टॉकहोम वॉटर प्राइज) जीतने वाले डॉ. राजेंद्र सिंह 15 मई को रांची के होटल बीएनआर चाणक्या में दस्तक दे रहे हैं। अबूआ अधिकार द्वारा आयोजित इस महा-सेमिनार में डॉ. सिंह न केवल झारखंड के बिगड़ते पर्यावरण पर अपनी चिंता साझा करेंगे, बल्कि उन समाधानों पर भी बात करेंगे जिनसे राजस्थान की सूखी नदियों की तरह झारखंड के दम तोड़ते जलस्रोतों को नया जीवन मिल सके।
झारखंड, जो अपनी नदियों और जलप्रपातों के लिए जाना जाता है, आज गंभीर पर्यावरणीय चुनौतियों से जूझ रहा है। इस सेमिनार का विषय “एनवायर्नमेंटल चैलेंजस एंड इनसाइट्स इन झारखंड” रखा गया है। कार्यक्रम सुबह 10:00 बजे से दोपहर 02:00 बजे तक चलेगा, जिसमें देश के जाने-माने युवा पर्यावरणविद् निरंजन भारद्वाज और कई अन्य विशेषज्ञ भी शिरकत करेंगे। विशेषज्ञों का मानना है कि डॉ. सिंह का यह दौरा राज्य की जल नीति और सामुदायिक भागीदारी के लिए एक टर्निंग पॉइंट साबित हो सकता है।
क्यों खास है ‘जलपुरुष’ का रांची आना?
राजेंद्र सिंह कोई साधारण नाम नहीं हैं; उन्होंने राजस्थान के धोरों में वो कर दिखाया जिसे आधुनिक इंजीनियरिंग नहीं कर पाई। उन्होंने पारंपरिक ‘जोहड़’ तकनीक से 5 विलुप्त हो चुकी नदियों को पुनर्जीवित किया और 10,000 से अधिक जल संरचनाएं खड़ी कीं। अब जब झारखंड का भूजल स्तर रसातल में जा रहा है, तब उनका अनुभव यहां के पठारी इलाकों के लिए संजीवनी बन सकता है।
सेमिनार के मुख्य बिंदु: झारखंड के लिए क्यों है यह ‘अलार्म बेल’?
डॉ. राजेंद्र सिंह का व्याख्यान मुख्य रूप से इन तीन स्तंभों पर केंद्रित रहने की उम्मीद है:
- लुप्त होती नदियां और सूखते जलस्रोत: झारखंड की कई छोटी नदियां अतिक्रमण और प्रदूषण के कारण नाले में तब्दील हो रही हैं।
- सामुदायिक भागीदारी: सरकार के भरोसे बैठने के बजाय ग्रामीण और शहरी आबादी खुद जल संचयन कैसे करे।
- जलवायु परिवर्तन का असर: झारखंड के जंगलों और पहाड़ों पर बढ़ते तापमान का सीधा प्रभाव।
इस सेमिनार में केवल भाषण नहीं होंगे, बल्कि राज्य के ज्वलंत पर्यावरणीय मुद्दों पर एक श्वेत-पत्र जैसा रोडमैप तैयार किया जाएगा। आयोजन समिति ‘अबूआ अधिकार’ ने स्पष्ट किया है कि इसमें भाग लेने के लिए निःशुल्क निबंधन की सुविधा दी गई है, ताकि छात्र, शोधकर्ता और आम नागरिक सीधे विशेषज्ञों से जुड़ सकें।
उपलब्धियों का सफर: जब दुनिया ने माना लोहा
डॉ. राजेंद्र सिंह की शख्सियत का अंदाजा उनके पुरस्कारों से लगाया जा सकता है। उन्हें 2001 में रेमन मैग्सेसे और 2015 में स्टॉकहोम जल पुरस्कार मिला। ‘द गार्जियन’ ने उन्हें “ग्रह को बचाने वाले 50 लोगों” की सूची में शामिल किया था। उनकी उपस्थिति यह संकेत देती है कि झारखंड के पर्यावरण को लेकर राष्ट्रीय स्तर पर चिंता बढ़ रही है।
आप कैसे हो सकते हैं शामिल?
यदि आप भी पर्यावरण के प्रति संवेदनशील हैं और झारखंड को जल संकट से बचाना चाहते हैं, तो इस सेमिनार का हिस्सा बन सकते हैं। आयोजकों ने 7777916773 और 9304410141 पर संपर्क कर मुफ्त रजिस्ट्रेशन कराने की अपील की है। सीटों की संख्या सीमित होने के कारण पहले आओ-पहले पाओ के आधार पर प्रवेश मिल सकता है।
झारखंड में केवल कोयल-कारो या स्वर्णरेखा जैसी बड़ी नदियों की बात होती है, लेकिन ग्रामीण इलाकों के पारंपरिक जलस्रोत मर रहे हैं। राजेंद्र सिंह का रांची आगमन एक ‘वेक-अप कॉल’ है। क्या प्रशासन और यहां के लोग उनके बताए ‘राजस्थान मॉडल’ को झारखंड की भौगोलिक स्थिति के अनुसार अपना पाएंगे? यह सेमिनार सिर्फ चर्चा तक सीमित रहता है या धरातल पर बदलाव लाता है, इस पर पूरे राज्य की नजर रहेगी।
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