Ranchi | करीब तीन दशक लंबे इंतज़ार और कानूनी दांव-पेंच के बाद आखिरकार झारखंड-बिहार के बहुचर्चित अलकतरा घोटाले में न्याय की मुहर लग गई है। शुक्रवार को सीबीआई के विशेष न्यायाधीश योगेश कुमार की अदालत ने इस हाई-प्रोफाइल मामले में चार दोषियों को तीन-तीन साल के साधारण कारावास की सजा सुनाई। कागजों पर दौड़ने वाले ट्रकों और करोड़ों के वारे-न्यारे की इस कहानी ने एक बार फिर 90 के दशक के उस दौर की याद दिला दी है, जब सिस्टम की नाक के नीचे से सरकारी खजाना लूटा गया था।
इस फैसले ने न केवल चार रसूखदारों को सलाखों के पीछे भेजा है, बल्कि यह उन भ्रष्ट अधिकारियों और ठेकेदारों के लिए भी एक बड़ी चेतावनी है जो यह सोचते हैं कि वक्त बीतने के साथ गुनाह धुल जाते हैं। आइए जानते हैं कि आखिर उस समय कैसे हल्दिया से बरही तक के रास्ते में अलकतरा हवा हो गया था।
‘कागजों पर ही पहुंच गया अलकतरा’: समझिए फर्जीवाड़े का शातिर तरीका
सीबीआई की जांच और लोक अभियोजक खुशबू जायसवाल द्वारा पेश किए गए 35 गवाहों के बयानों ने भ्रष्टाचार की जो तस्वीर खींची, वह हैरान करने वाली है।
- कैसे हुआ खेल: नियम के अनुसार, अलकतरा को पश्चिम बंगाल के हल्दिया से बरौनी होते हुए एनएच बरही तक पहुंचना था।
- गायब हुए ट्रक: जांच में सामने आया कि ट्रांसपोर्टरों ने बरौनी में कोई रिपोर्ट ही नहीं की।
- फर्जी बिलिंग: बिना माल की सप्लाई किए ही फर्जी भाड़ा बिल (Fake Invoices) तैयार किए गए और सरकारी खजाने से करोड़ों रुपये की राशि निकाल ली गई।
- सप्लाई में सेंध: तीन अलग-अलग सप्लाई ऑर्डर में भारी मात्रा में कम माल भेजा गया, लेकिन कागजों पर रिकॉर्ड 100% फुल दिखाया गया।
किसे मिली सजा और कौन हुआ बरी?
अदालत ने इस मामले में कड़ी सुनवाई के बाद निम्नलिखित अभियुक्तों को दोषी ठहराया:
- विनय कुमार सिन्हा (ट्रांसपोर्टर)
- आशीष मैटे
- राजकुमार राय
- रंजन प्रधान
इन सभी पर कारावास के साथ-साथ आर्थिक दंड (जुर्माना) भी लगाया गया है। हालांकि, केस इतना पुराना था कि ट्रायल के दौरान ही दो आरोपियों की मृत्यु हो गई। वहीं, साक्ष्य के अभाव में अदालत ने एके दास, एसएम औरंगजेब और एनसी प्रसाद को बरी कर दिया है।
हाईकोर्ट के डंडे के बाद हिली थी फाइलें
यह मामला साधारण पुलिस जांच से नहीं, बल्कि झारखंड हाईकोर्ट के कड़े हस्तक्षेप के बाद सीबीआई को सौंपा गया था। घोटाले की जड़ें इतनी गहरी थीं कि इसकी जांच के तार बिहार के कद्दावर नेताओं से भी जुड़े। गौरतलब है कि इसी घोटाले के एक अन्य हिस्से में मार्च 2025 में बिहार के पूर्व मंत्री इलियास हुसैन को भी तीन साल की सजा सुनाई जा चुकी है।
क्या होगा इस फैसले का असर?
विशेषज्ञों का मानना है कि 29 साल बाद आया यह फैसला ‘देर आए दुरुस्त आए’ की मिसाल है। यह संदेश देता है कि भ्रष्टाचार के मामलों में Zero Tolerance की नीति आज भी प्रभावी है। इससे वर्तमान में चल रहे अन्य भ्रष्टाचार के मामलों (जैसे जमीन घोटाला या खनन घोटाला) में शामिल लोगों के मन में भी कानूनी खौफ पैदा होगा।
दोषियों को सजा मिलने के बाद अब सबकी नजरें इस बात पर हैं कि क्या सीबीआई इस नेटवर्क के पीछे के कुछ और ‘बड़े सफेदपोशों’ पर शिकंजा कसेगी? फिलहाल, चार दोषियों के जेल जाने से झारखंड और बिहार के राजनीतिक और प्रशासनिक गलियारों में हड़कंप मचा हुआ है।
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