Ranchi | झारखंड की राजधानी रांची और आसपास के इलाकों में इन दिनों आदिवासी जमीनों की खरीद-बिक्री और उसके बाद हो रही प्रशासनिक बुलडोजर कार्रवाई को लेकर माहौल बेहद गर्म है। एक तरफ जहां गैर-आदिवासियों के बने-बनाए आशियाने ढहाए जा रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ इस पूरे मामले को लेकर एक नया विवाद खड़ा हो गया है। ग्राउंड रिपोर्ट और आदिवासी संगठनों के दावों की मानें तो यह पूरी कार्रवाई महज एक छलावा है और जो जमीनें गलत तरीके से हस्तांतरित हुई हैं, उनमें से 0.1% पर भी असल एक्शन नहीं हुआ है।
इस संवेदनशील मुद्दे पर आदिवासी संगठनों के अगवा लक्ष्मी नारायण मुंडा ने ‘लोकल खबर’ से विशेष बातचीत में कई चौंकाने वाले खुलासे किए हैं। उन्होंने साफ तौर पर कहा कि शहर में आदिवासी जमीनों की दलाली का एक ऐसा कॉरपोरेट नेक्सस खड़ा हो चुका है, जिसमें रसूखदार सफेदपोशों को खुली छूट है, जबकि गाज सिर्फ गरीब और मध्यम वर्ग के आशियानों पर गिर रही है।
4000 अदालती फैसले पेंडिंग: रसूखदारों को संरक्षण और गरीबों पर बुलडोजर?
लक्ष्मी नारायण मुंडा का आरोप है कि रांची के एसएआर (SAR) कोर्ट में आदिवासियों के पक्ष में लगभग 4000 से 5000 फैसले आ चुके हैं, लेकिन प्रशासन उन्हें उनकी जमीन पर दखलदहानी (कब्जा) नहीं दिला पा रहा है।
“अगर कोई फैसला किसी फॉरवर्ड, सवर्ण या रसूखदार गैर-आदिवासी के पक्ष में आ जाए, तो प्रशासन दखलदहानी कराने में एक मिनट का समय नहीं गंवाता। लेकिन जब बात आदिवासी के हक की आती है, तो डीसी, एसडीओ और एसएसपी के पास बहानों की लंबी लिस्ट होती है। अदालती आदेशों के बाद भी हजारों आदिवासी अपनी ही जमीन के लिए भटक रहे हैं।” — लक्ष्मी नारायण मुंडा, आदिवासी नेता
उन्होंने आगे कहा कि कोकर के साधु मैदान या बुकरू के वास्तु विहार जैसे बड़े प्रोजेक्ट्स और पूर्व डीजीपी से लेकर ईडी की रडार पर आए कथित पत्रकारों की जमीनों पर प्रशासन की उंगली तक नहीं उठती। शहर के पॉश इलाकों में सीएनटी एक्ट का खुला उल्लंघन कर बड़ी-बड़ी अट्टालिकाएं खड़ी हो गईं, लेकिन वहां सिस्टम खामोश रहता है। सरकार चाहे ‘अबुआ’ (अपनी) हो या किसी की भी, जमीन माफियाओं का यह खेल राजनीतिक संरक्षण में फल-फूल रहा है।
दलाली का नया ‘प्रोफेशनल पेशा’: हर गली-कूचे में जमीन का खेल
ग्राउंड रिपोर्ट बताती है कि झारखंड राज्य बनने के बाद रांची और इसके आस-पास जमीन दलाली एक संगठित उद्योग बन चुका है। लक्ष्मी नारायण मुंडा के अनुसार, इस धंधे में अब केवल आम दलाल नहीं, बल्कि समाज के पढ़े-लिखे और रसूखदार तबके जैसे शिक्षक, कर्मचारी, प्रोफेसर, वकील, नेता और अपराधी तक शामिल हो चुके हैं। रांची के आस-पास किसी भी चाय की दुकान या गली में चले जाइए, हर एक घंटे में आपको जमीन की खरीद-बिक्री की सेटिंग होती मिल जाएगी।
क्या सीएनटी एक्ट (CNT Act) में मामूली बदलाव ही है एकमात्र समाधान?
इस विवाद के बीच आम जनता और कुछ संगठनों की ओर से यह सुझाव आ रहा है कि जो गैर-आदिवासी छोटा मकान बनाना चाहते हैं, उन्हें कम से कम 10 डिसमिल तक की आदिवासी जमीन खरीदने की कानूनी मंजूरी मिलनी चाहिए। इस पर मुंडा ने एक बेहद व्यावहारिक और तकनीकी समाधान पेश किया। उन्होंने कहा कि छोटा नागपुर कास्तकारी अधिनियम (CNT Act) 1908 में जब बना था, तब इसका मुख्य उद्देश्य ‘कास्तकारी’ यानी कृषि योग्य भूमि का संरक्षण करना था।
आज समय बदल चुका है। रांची शहर के बीचों-बीच या हाईवे के किनारे ऐसी सैकड़ों एकड़ आदिवासी जमीनें हैं, जहां पिछले 20-30 साल से कोई खेती नहीं हुई है।
कृषि बनाम आवासीय लगान: तीन श्रेणियों में बांटी जाए जमीन
लक्ष्मी नारायण मुंडा ने सुझाव दिया कि सरकार को जमीनों को तीन स्पष्ट श्रेणियों में वर्गीकृत करना चाहिए:
- कृषि भूमि (Agricultural Land)
- आवासीय भूमि (Residential Land)
- व्यावसायिक भूमि (Commercial Land)
“जो जमीन अब ‘टेनेंट’ (कास्तकारी या खेती) के प्रयोग में नहीं आ रही है, उसे सीएनटी एक्ट के इस दायरे से बाहर कर उस पर आवासीय या व्यावसायिक टैक्स (लगान) निर्धारित किया जाना चाहिए। इसके लिए बकायदा डीसी के माध्यम से निष्पक्ष जांच हो और आदिवासी भू-स्वामी को यह अधिकार मिले कि वह अपनी गैर-कृषि भूमि का सही मूल्य पा सके।” — लक्ष्मी नारायण मुंडा
समाज के अंदर का ‘एलीट क्लास’ नहीं चाहता समग्र विकास
जब उनसे पूछा गया कि आदिवासी अगवा होने के नाते क्या यह सुझाव सरकार तक भेजा गया है, तो उन्होंने आत्मचिंतन करते हुए कड़वा सच स्वीकार किया। उन्होंने कहा कि आदिवासी समुदाय के भीतर ही एक ऐसा ‘नवधनाढ्य’ और एलीट क्लास (नौकरशाह, राजनेता) पैदा हो गया है, जो खुद नहीं चाहता कि आम आदिवासी का समग्र विकास हो। यह वर्ग आदिवासियों की मजबूरी का फायदा उठाकर, उन्हें शराब पिलाकर या कौड़ियों के भाव जमीनें लिखाकर खुद फायदा कमाना चाहता है। अगर नियमों में पारदर्शिता आ गई, तो इन अंदरूनी दलालों की दुकानें बंद हो जाएंगी।
प्रशासन का अगला कदम और नीतिगत सुधार की जरूरत
रांची में चल रहा यह जमीन विवाद महज एक कानूनी लड़ाई नहीं, बल्कि सामाजिक ताने-बाने और प्रशासनिक विफलता का जीता-जागता उदाहरण है।
- प्रशासनिक पारदर्शिता: सरकार को सबसे पहले एसएआर कोर्ट में लंबित पड़े हजारों मामलों में बिना किसी भेदभाव के दखलदहानी करानी होगी, ताकि कानून पर भरोसा बहाल हो सके।
- सदा पट्टा पर रोक और जागरूकता: आम जनता को भी यह समझना होगा कि बिना कानूनी वैधता (सदा पट्टा या दलालों के चक्कर में) के आदिवासी जमीन खरीदना खुद के आशियाने को खतरे में डालना है।
- वैकल्पिक नीति: सरकार को सीएनटी एक्ट की मूल भावना को ठेस पहुंचाए बिना, शहरीकरण के दौर में गैर-कृषि योग्य जमीनों के लिए एक व्यावहारिक और पारदर्शी लैंड-यूज़ पॉलिसी (Policy) बनानी होगी, ताकि न तो आदिवासियों का शोषण हो और न ही किसी गरीब गैर-आदिवासी का आशियाना उजाड़ा जाए।
इस पूरे विषय पर आपकी क्या राय है? क्या सीएनटी एक्ट के तहत गैर-कृषि भूमि को लेकर नियमों में बदलाव होना चाहिए? हमें कमेंट करके जरूर बताएं।











