ताज़ा खबरें
लोड हो रहा है... ताज़ा खबरों के लिए बने रहें...
विज्ञापन
Jharkhand News
यह खबर कहाँ की हैझारखंड

चर्च में करम देवता की स्थापना पर झारखंड में क्यों मचा भारी बवाल?

Ranchi | झारखंड की राजधानी रांची में आदिवासी समाज की पारंपरिक आस्था और धार्मिक रीति-रिवाजों को लेकर एक नया विवाद गरमा गया है। चर्च और गिरजाघरों में करम देवता की डाली को बालू के टीन में गाड़े जाने और त्योहारों के कथित “ईसाईकरण” के विरोध में आदिवासी समाज खुलकर सड़कों पर उतर आया है।

केंद्रीय सरना समिति समेत कई प्रमुख जनजातीय संगठनों ने प्रेस क्लब रांची में संयुक्त प्रेस वार्ता कर सीधे तौर पर आरोप लगाया है कि सरना समाज के आराध्य करम देवता का अपमान किया जा रहा है। संगठनों का कहना है कि धर्म परिवर्तन के बाद पारंपरिक आदिवासी संस्कृति और पूजा-पद्धति से कोई वास्ता न रहने के बावजूद केवल लाभ और पहचान बनाए रखने के लिए यह “दिखावा” किया जा रहा है।

Advertisement

इस पूरे घटनाक्रम ने राज्य के सामाजिक ताने-बाने में हलचल तेज कर दी है। आदिवासियों के पारंपरिक संगठनों ने स्पष्ट चेतावनी दी है कि वे अपनी आस्था और रूढ़िवादी परंपराओं पर किसी भी तरह का अतिक्रमण बर्दाश्त नहीं करेंगे।

‘बालू के टीन में आराध्य देव’: सरना संगठनों ने खोला मोर्चा

रांची प्रेस क्लब में आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेंस में केंद्रीय सरना समिति के अध्यक्ष बबलू मुंडा और मुख्य पहान जगलाल पहान ने कई गंभीर आरोप लगाए।

“ईसाइयों द्वारा लिखित पुस्तकों ‘खड़िया धर्म और संस्कृति का विश्लेषण’ एवं ‘आदिवासी मिस्सा संग्रह’ में वैटिकन विश्व सभा के निर्देशों का हवाला देकर हमारे सरहुल और करम जैसे पवित्र पर्वों के ‘संशोधन’ की बात कही गई है। हमारे आराध्य करम देवता को गिरजाघरों में बालू से भरे टीन में खड़ा करना सीधे-सीधे हमारी आस्था का उपहास उड़ाना है।”

— बबलू मुंडा, अध्यक्ष, केंद्रीय सरना समिति

संगठनों ने दो टूक सवाल उठाया कि जब ईसाई धर्म अपनाने वाले लोग पारंपरिक आदिवासी संस्कार, रूढ़ि प्रथा और पूजा पद्धति का त्याग कर चुके हैं, तो वे सरना समाज के पर्वों को “संशोधित” कर मनाने वाले कौन होते हैं?

ये भी पढ़ें:  मुर्शिदाबाद हिंसा के बाद 170 हिंदू परिवारों का पलायन, राजमहल में शरण

‘पारंपरिक नृत्य पर लांछन बर्दाश्त नहीं’: आदिवासी समाज में गहरा आक्रोश

जनजाति सुरक्षा मंच के प्रतिनिधियों और आदिवासी अगुवाओं ने ईसाई साहित्य में करम पूजा की रात होने वाले पारंपरिक सामूहिक नृत्य-संगीत को लेकर की गई टिप्पणियों पर कड़ा एतराज जताया।

संगठनों ने आरोप लगाया कि एक तरफ आदिवासियों के भादो एकादशी वाले पवित्र अनुष्ठान, भाई-बहन के प्रेम और रात भर चलने वाले पारंपरिक अखड़ा नृत्य को अनैतिक आचरण बताकर “बुरा करम” करार दिया जाता है और इसे हटाने की बात की जाती है, वहीं दूसरी तरफ उसी त्योहार को चर्च में ख्रीस्तीय ढंग से मनाने का ढोंग रचा जा रहा है।

प्रमुख संगठनों के सवाल और आपत्तियां:

  • दोहरा रवैया क्यों? एक तरफ आदिवासी संस्कृति पर सवाल उठाना और दूसरी तरफ उसी संस्कृति का वेटिकन के नाम पर उपयोग करना।
  • पहचान का संकट: धर्मांतरण के बाद आदिवासी अधिकारों और संस्कृति के दोहरे लाभ लेने की कोशिश का विरोध।
  • संस्कृति की मौलिकता: रूढ़िवादी सरना पूजा-पद्धति में किसी बाहरी संशोधन को अवैध मानना।

प्रशासन से रोक लगाने की मांग, डीसी को सौंपा गया ज्ञापन

विवाद केवल बयानों तक सीमित नहीं है। सामाजिक संगठनों ने इस मामले में प्रशासनिक दखल की मांग तेज कर दी है। प्रेस वार्ता में जानकारी दी गई कि 16 सितंबर 2026 को ही केंद्रीय सरना समिति और विभिन्न आदिवासी संगठनों के एक संयुक्त प्रतिनिधिमंडल ने रांची के उपायुक्त (DC) को लिखित ज्ञापन सौंपकर चर्चों में इस प्रकार की गतिविधियों पर तुरंत रोक लगाने की मांग की है।

इस संयुक्त मोर्चे में जनजाति सुरक्षा मंच के संदीप उरांव, डॉ. बिरसा उरांव, सोमा उरांव, अंजलि लकड़ा, झारखंड आदिवासी सरना विकास समिति के अध्यक्ष मेघा उरांव, रवि प्रकाश उरांव समेत दर्जनों पहान और सामाजिक कार्यकर्ता शामिल रहे। सभी ने एक स्वर में कहा कि यदि प्रशासन ने ठोस कदम नहीं उठाए, तो समाज व्यापक आंदोलन के लिए बाध्य होगा।

What Next: अब आगे क्या?

इस पूरे विवाद के बाद अब निगाहें रांची जिला प्रशासन और राज्य सरकार पर टिकी हैं:

  1. प्रशासनिक रुख: क्या उपायुक्त कार्यालय धार्मिक सद्भाव और रूढ़िगत अधिकारों की रक्षा के लिए दोनों पक्षों से संवाद करेगा?
  2. धार्मिक संगठनों की प्रतिक्रिया: आदिवासी संगठनों के इस सीधे आरोप पर चर्च प्रबंधन और ईसाई मिशनरियों की क्या आधिकारिक सफाई आती है?
  3. आंदोलन की रूपरेखा: यदि चर्चों में करम देवता की स्थापना और पर्वों के स्वरूप बदलने पर रोक नहीं लगी, तो सरना संगठन गांव-गांव जाकर जनजागरण और बड़े आंदोलन का बिगुल फूंक सकते हैं।
ये भी पढ़ें:  नगर निगम चुनाव 2025: झारखंड के सभी जिलों में ट्रिपल टेस्ट प्रक्रिया पूरी
Related Stories & Ads

Subhash Shekhar

सुभाष शेखर पिछले दो दशकों से अधिक समय से पत्रकारिता जगत में सक्रिय हैं। साल 2003 में बुंडू (झारखंड) की जमीनी समस्याओं को आवाज देने से शुरू हुआ उनका सफर आज 'Local Khabar' के माध्यम से डिजिटल पत्रकारिता के नए आयाम स्थापित कर रहा है। प्रभात खबर, ताजा टीवी, नक्षत्र न्यूज और राष्ट्रीय खबर जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों में संपादकीय और ग्राउंड रिपोर्टिंग का अनुभव रखने वाले सुभाष, आज के दौर के उन गिने-चुने पत्रकारों में से हैं जो खबर की बारीकियों के साथ-साथ वेब डिजाइनिंग और SEO जैसी तकनीकी विधाओं में भी महारत रखते हैं। वे वर्तमान में Local Khabar के संस्थापक और संपादक के रूप में झारखंड की जनपक्षीय खबरों का नेतृत्व कर रहे हैं।

Join WhatsApp

Join Now