झारखंड में RTI की ‘मौत’! 4 साल से सूचना आयोग में लटका ताला, क्या भ्रष्टाचार छिपाने के लिए सरकार ने जनता को किया अंधा?

झारखंड में RTI की 'मौत'! 4 साल से सूचना आयोग में लटका ताला, क्या भ्रष्टाचार छिपाने के लिए सरकार ने जनता को किया अंधा?

Ranchi | क्या झारखंड में सूचना का अधिकार (RTI) दम तोड़ चुका है? राज्य में एक ऐसा संकट खड़ा हो गया है जिसने लोकतंत्र की पारदर्शिता पर सवालिया निशान लगा दिए हैं। पिछले चार वर्षों से झारखंड राज्य सूचना आयोग बिना किसी मुख्य आयुक्त और आयुक्त के सफेद हाथी बनकर रह गया है। हज़ारों अपीलें धूल फांक रही हैं, और आम आदमी दफ्तरों के चक्कर काटकर थक चुका है, लेकिन उसे सूचना नहीं मिल रही।

क्यों मचा है हड़कंप? आयोग में ताला और जनता बेहाल

झारखंड की प्रशासनिक गलियारों में इस वक्त सबसे बड़ी चर्चा यही है कि आखिर सरकार सूचना आयोग को पुनर्जीवित क्यों नहीं करना चाहती? वरिष्ठ अधिवक्ताओं का दावा है कि आयोग में नियुक्तियां न करना महज एक प्रशासनिक देरी नहीं, बल्कि एक गहरी ‘साजिश’ की ओर इशारा करती है। जब तक आयोग में आयुक्त नहीं बैठेंगे, तब तक भ्रष्टाचार के खिलाफ किसी भी अपील पर सुनवाई नहीं होगी। यानी, अगर किसी विभाग ने आपको गलत जानकारी दी या जानकारी देने से मना कर दिया, तो आप कहीं भी शिकायत नहीं कर सकते।

भ्रष्टाचार की फाइलों पर ‘सुरक्षा कवच’?

जानकारी के अनुसार, वर्तमान में सूचना आयोग में करीब 15,000 से अधिक अपीलें लंबित हैं। इनमें जमीन घोटाले, सरकारी योजनाओं में धांधली और ट्रांसफर-पोस्टिंग जैसे संवेदनशील मामलों से जुड़ी सूचनाएं शामिल हैं। जानकारों का कहना है कि अगर आयोग सक्रिय हुआ, तो कई ऐसे ‘जिन्न’ बाहर निकलेंगे जो वर्तमान व्यवस्था की मुश्किलें बढ़ा सकते हैं। क्या यही कारण है कि पिछले 48 महीनों से नियुक्तियों की फाइल ठंडे बस्ते में है?

आम आदमी पर क्या होगा असर?

झारखंड के दूर-दराज इलाकों से आने वाले लोग, जो सूचना अधिकार को अपना आखिरी हथियार समझते थे, अब खुद को ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं।

  • जमीन लूट पर खामोशी: आदिवासियों और गरीबों की जमीन से जुड़े विवादों में RTI सबसे बड़ा सहारा था, जो अब छीन लिया गया है।
  • दोषियों को खुली छूट: जब सूचना ही नहीं मिलेगी, तो दोषियों के खिलाफ सबूत कैसे जुटेंगे?
  • लोकतंत्र का चौथा स्तंभ भी लाचार: पत्रकार और एक्टिविस्ट जो सिस्टम की कमियां उजागर करते थे, उनके हाथ भी बांध दिए गए हैं।

हाईकोर्ट की फटकार का भी असर नहीं?

गौरतलब है कि झारखंड हाईकोर्ट ने भी इस मामले में कई बार कड़ी टिप्पणी की है। अदालत ने स्पष्ट रूप से रिक्त पदों को भरने का निर्देश दिया था, लेकिन ज़मीनी हकीकत आज भी ‘शून्य’ है। अधिवक्ता सुनील महतो के अनुसार, “यह कानून का गला घोंटने जैसा है। जब रक्षक ही जवाबदेही से भागने लगे, तो जनता किसके पास जाए?”

क्या अब सड़कों पर उतरेगी जनता?

प्रशासनिक सूत्रों की मानें तो नियुक्तियों की प्रक्रिया ‘पाइपलाइन’ में होने का दावा बार-बार किया जाता है, लेकिन नतीजा सिफर है। आने वाले दिनों में यह मुद्दा एक बड़े राजनीतिक आंदोलन का रूप ले सकता है। अगर सरकार ने जल्द ही मुख्य सूचना आयुक्त और अन्य पदों पर नियुक्तियां नहीं की, तो विपक्षी दल और नागरिक संगठन इसे चुनावी मुद्दा बनाने की तैयारी में हैं।

Subhash Shekhar

सुभाष शेखर पिछले दो दशकों से अधिक समय से पत्रकारिता जगत में सक्रिय हैं। साल 2003 में बुंडू (झारखंड) की जमीनी समस्याओं को आवाज देने से शुरू हुआ उनका सफर आज 'Local Khabar' के माध्यम से डिजिटल पत्रकारिता के नए आयाम स्थापित कर रहा है। प्रभात खबर, ताजा टीवी, नक्षत्र न्यूज और राष्ट्रीय खबर जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों में संपादकीय और ग्राउंड रिपोर्टिंग का अनुभव रखने वाले सुभाष, आज के दौर के उन गिने-चुने पत्रकारों में से हैं जो खबर की बारीकियों के साथ-साथ वेब डिजाइनिंग और SEO जैसी तकनीकी विधाओं में भी महारत रखते हैं। वे वर्तमान में Local Khabar के संस्थापक और संपादक के रूप में झारखंड की जनपक्षीय खबरों का नेतृत्व कर रहे हैं।

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