Ranchi: झारखंड पथ निर्माण विभाग एक बार फिर सुर्खियों में है। राज्य राजमार्ग प्राधिकरण (SHAJ) के तहत जारी दो बड़े सड़क निर्माण टेंडरों ने पारदर्शिता पर गहरे प्रश्नचिह्न खड़े कर दिए हैं। जिन परियोजनाओं को विकास की रफ्तार देने के लिए शुरू किया गया था, वे अब टेंडर प्रक्रिया की निष्पक्षता पर संदेह खड़ा कर रही हैं।
तकनीकी मूल्यांकन में सिर्फ ‘चुनिंदा 3’ का फॉर्मूला?
दस्तावेज़ बताते हैं कि गोलाबारी-मुरी फोर-लेन (25.163 किमी) परियोजना में 13 कंपनियों ने बोली लगाई थी, लेकिन इनमें से 10 को तकनीकी आधार पर अयोग्य करार दे दिया गया। इसी तरह, दुमका-रामपुर हाईवे (10.360 किमी) परियोजना में 8 बोलीदाताओं में से 5 बाहर कर दिए गए।
आखिरकार, सिर्फ तीन कंपनियों—भारत वाणिज्य ईस्टर्न प्राइवेट लिमिटेड (BVEPL), भर्तीय इन्फ्रा प्रोजेक्ट्स और दिनेशचंद्र आर. अग्रवाल इन्फ्राकॉन—को तकनीकी रूप से योग्य ठहराया गया। जानकारों का कहना है कि यह संयोग नहीं, बल्कि प्रतिस्पर्धा को सीमित करने की रणनीति है।
अनुमानित लागत से अधिक दरों पर सौदा
परियोजनाओं के आवंटन के बाद सामने आया कि L1 बोलीदाता BVEPL को दोनों ही काम मिले, लेकिन उनकी दरें अनुमानित लागत से कहीं अधिक थीं।
गोलाबारी-मुरी परियोजना की अनुमानित लागत ₹246.64 करोड़ थी, जबकि BVEPL को यह काम ₹267 करोड़ में दिया गया। यानी जनता की जेब से करीब ₹21 करोड़ अधिक खर्च होंगे। इसी तरह, दुमका-रामपुर हाईवे परियोजना भी अनुमानित दर से 7.46% अधिक पर ₹239.25 करोड़ में आवंटित हुई।
इन दोनों टेंडरों को जोड़कर राज्य पर ₹50 करोड़ से अधिक का अतिरिक्त बोझ पड़ा है। आलोचकों का आरोप है कि टेंडर समिति ने जानबूझकर ऊंची दर लगाने वाली कंपनियों को ही लाभान्वित किया।
किन कारणों से बाहर हुए अन्य ठेकेदार?
तकनीकी मूल्यांकन के रिकॉर्ड से पता चलता है कि बाहर किए गए बोलीदाताओं को कई छोटे कारणों से अयोग्य करार दिया गया। इनमें अधूरे दस्तावेज़, गलत फॉर्मेट में ऑडिटर का प्रमाणपत्र, RFP की शर्तों से मेल न खाता अनुभव प्रमाणपत्र और UDIN का उल्लेख न होना जैसी बातें शामिल थीं।
विशेषज्ञों का मानना है कि इन खामियों को सुधारने का अवसर दिया जा सकता था, लेकिन समिति ने कठोर रुख अपनाया। इससे साफ है कि प्रतिस्पर्धा कम कर केवल कुछ चुनिंदा कंपनियों को मौका दिया गया।
उच्च स्तरीय जांच की मांग
इस पूरे घटनाक्रम ने झारखंड की टेंडर प्रक्रिया को कटघरे में खड़ा कर दिया है। यह पहली बार नहीं है जब किसी बड़े प्रोजेक्ट के आवंटन में पारदर्शिता पर सवाल उठे हों।
अब राजनीतिक गलियारों से लेकर प्रशासनिक स्तर तक इस मामले की जांच की मांग उठ रही है।









