झारखंड सूचना आयुक्त नियुक्ति: राज्यपाल ने क्यों लौटाई फाइल? इन 3 राजनीतिक नामों पर फंसा पेंच

झारखंड सूचना आयुक्त नियुक्ति: राज्यपाल ने क्यों लौटाई फाइल? इन 3 राजनीतिक नामों पर फंसा पेंच

Ranchi | झारखंड के प्रशासनिक गलियारों में उस वक्त हड़कंप मच गया जब राज्यपाल संतोष कुमार गंगवार ने राज्य सूचना आयुक्तों की नियुक्ति से जुड़ी महत्वपूर्ण संचिका (फाइल) सरकार को वापस कर दी। यह फैसला केवल एक प्रशासनिक देरी नहीं, बल्कि संवैधानिक मर्यादा और RTI अधिनियम 2005 की शुचिता को बनाए रखने की दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है।

Quick Highlights: क्या है पूरा विवाद?

मुख्य बिंदुविवरण
विवाद का कारणराजनीतिक दलों से जुड़े व्यक्तियों की नियुक्ति की सिफारिश।
राज्यपाल का आधारRTI अधिनियम 2005 की धारा 15(6) का उल्लंघन।
प्रस्तावित नामअनुज सिन्हा, तनुज खत्री (JMM), शिवपूजन पाठक (BJP), अमूल्य नीरज खलखो (INC)।
अगली अहम तारीख13 अप्रैल 2026 (झारखंड हाई कोर्ट में सुनवाई)।

राजनीति और पारदर्शिता के बीच टकराव

मुख्यमंत्री की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय चयन समिति ने 25 मार्च को जिन नामों की अनुशंसा की थी, उनमें वरिष्ठ पत्रकार अनुज कुमार सिन्हा के अलावा तीन ऐसे नाम थे जो सीधे तौर पर सक्रिय राजनीति का हिस्सा हैं।

हमारे विश्लेषण में यह स्पष्ट है कि:

राजभवन ने स्पष्ट किया है कि सूचना आयुक्त का पद एक अर्द्ध-न्यायिक (Quasi-judicial) पद है। यदि यहाँ किसी राजनीतिक दल के सक्रिय पदाधिकारी को बैठाया जाता है, तो सूचना के अधिकार की निष्पक्षता समाप्त हो सकती है।

“जब हमने RTI एक्ट के प्रावधानों का बारीकी से अध्ययन किया, तो पाया कि कानून का ‘पारा 6’ स्पष्ट रूप से किसी भी राजनीतिक जुड़ाव वाले व्यक्ति को इस पद के लिए अयोग्य घोषित करता है।”

RTI एक्ट 2005: वो नियम जिसे नजरअंदाज किया गया

राज्यपाल ने अपनी आपत्ति में RTI अधिनियम की धारा 15(6) का उल्लेख किया है। इस नियम के अनुसार:

  • सूचना आयुक्त को संसद या विधानमंडल का सदस्य नहीं होना चाहिए।
  • वह किसी भी राजनीतिक दल से संबद्ध नहीं हो सकता।
  • वह किसी लाभ के पद (Office of Profit) पर नहीं होना चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट का ‘अंजलि भारद्वाज’ केस और राजभवन की सख्ती

इस मामले में RTI कार्यकर्ता सुनील कुमार महतो की शिकायत ने आग में घी का काम किया। शिकायत में सुप्रीम कोर्ट के प्रसिद्ध ‘अंजलि भारद्वाज बनाम भारत सरकार’ मामले का संदर्भ दिया गया है। इस फैसले में कोर्ट ने साफ कहा था कि सूचना आयुक्तों की चयन प्रक्रिया पारदर्शी होनी चाहिए और उम्मीदवारों के सार्वजनिक जीवन की शुचिता निर्विवाद होनी चाहिए।

झारखंड हाई कोर्ट में बढ़ेगी सरकार की मुश्किल?

यह मामला केवल राजभवन तक सीमित नहीं है। झारखंड हाई कोर्ट पहले से ही सूचना आयुक्तों के रिक्त पदों पर सुनवाई कर रहा है। 1 अप्रैल को महाधिवक्ता ने कोर्ट को आश्वासन दिया था कि प्रक्रिया अंतिम चरण में है, लेकिन अब फाइल लौटने से सरकार को 13 अप्रैल की सुनवाई में कोर्ट के कड़े सवालों का सामना करना पड़ सकता है।

Expert Opinion: आगे क्या होगा?

अब गेंद राज्य सरकार के पाले में है। सरकार के पास दो रास्ते हैं:

  1. नामों में बदलाव: विवादित राजनीतिक चेहरों को हटाकर निष्पक्ष विशेषज्ञों के नाम भेजना।
  2. स्पष्टीकरण देना: राजभवन को यह समझाना कि चयनित व्यक्ति नियुक्ति से पूर्व अपने राजनीतिक पदों से इस्तीफा दे चुके हैं (हालांकि यह कानूनी रूप से कमजोर तर्क हो सकता है)।

Subhash Shekhar

सुभाष शेखर पिछले दो दशकों से अधिक समय से पत्रकारिता जगत में सक्रिय हैं। साल 2003 में बुंडू (झारखंड) की जमीनी समस्याओं को आवाज देने से शुरू हुआ उनका सफर आज 'Local Khabar' के माध्यम से डिजिटल पत्रकारिता के नए आयाम स्थापित कर रहा है। प्रभात खबर, ताजा टीवी, नक्षत्र न्यूज और राष्ट्रीय खबर जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों में संपादकीय और ग्राउंड रिपोर्टिंग का अनुभव रखने वाले सुभाष, आज के दौर के उन गिने-चुने पत्रकारों में से हैं जो खबर की बारीकियों के साथ-साथ वेब डिजाइनिंग और SEO जैसी तकनीकी विधाओं में भी महारत रखते हैं। वे वर्तमान में Local Khabar के संस्थापक और संपादक के रूप में झारखंड की जनपक्षीय खबरों का नेतृत्व कर रहे हैं।

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