AI क्रांति में भारत का डंका: क्या अब मशीनों के भरोसे चलेगी देश की संसद? जानें आम आदमी पर इसका सीधा असर

AI क्रांति में भारत का डंका: क्या अब मशीनों के भरोसे चलेगी देश की संसद? जानें आम आदमी पर इसका सीधा असर

New Delhi | दुनियाभर में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) को लेकर मची होड़ के बीच भारत ने एक ऐसा रास्ता चुना है, जिसने विकसित देशों को भी सोचने पर मजबूर कर दिया है। 28वें CSPOC सम्मेलन में जो तस्वीर निकलकर सामने आई है, वह साफ इशारा कर रही है कि भारत अब एआई का सिर्फ इस्तेमाल नहीं करेगा, बल्कि दुनिया को ‘इंक्लूसिव एआई’ का नया मंत्र देगा। लेकिन सवाल यह है कि क्या एआई के आने से आपकी नौकरी और संसद की गोपनीयता सुरक्षित है?

भारत का लक्ष्य साल 2047 तक ‘विकसित भारत’ बनना है और इस सफर में एआई को सबसे बड़ा हथियार बनाया जा रहा है। यूपीआई (UPI) की सफलता के बाद, अब सरकार का फोकस एआई को आम नागरिक के किचन से लेकर देश की संसद की मेज तक पहुँचाने पर है। यह बदलाव केवल तकनीक का नहीं, बल्कि शासन करने के तरीके का है, जिसका सीधा असर देश के 140 करोड़ लोगों की डिजिटल लाइफ पर पड़ेगा।

संसद में एआई की एंट्री: अब नेताओं के भाषण का ‘रियल-टाइम’ हिसाब होगा?

भारत की संसद अब हाई-टेक होने की राह पर है। राज्यसभा और लोकसभा में एआई के इस्तेमाल को लेकर जो ब्लू-प्रिंट तैयार हुआ है, वह किसी फिल्म की स्क्रिप्ट जैसा लगता है।

  • 22 भाषाओं का बैरियर खत्म: अब तमिलनाडु का व्यक्ति हिंदी में हो रही बहस को अपनी भाषा में सुन पाएगा। एआई के जरिए 22 संवैधानिक भाषाओं का तुरंत अनुवाद मुमकिन हो रहा है।
  • 48,000 शब्दों का डिजिटल खजाना: राज्यसभा ने एआई-इंटीग्रेटेड शब्दकोश तैयार किया है, जो संसदीय भाषा की मर्यादा और सटीकता को बनाए रखेगा।
  • डाटा एनालिटिक्स से बनेगी नीति: दशकों पुराने रिकॉर्ड्स को एआई सेकंडों में स्कैन कर बताएगा कि पिछली गलतियों से क्या सीखा जा सकता है।

क्या रोबोट लेंगे फैसले? एथिकल एआई की बड़ी चुनौती

अक्सर चर्चा होती है कि क्या एआई इंसान की जगह ले लेगा? इस पर ग्राउंड रिपोर्ट यह है कि भारत ‘ह्यूमन-इन-लूप’ मॉडल पर काम कर रहा है। यानी एआई ड्राफ्ट तो तैयार करेगा, लेकिन आखिरी मुहर एक इंसान (सांसद या अधिकारी) की ही होगी। ‘मशीनी भ्रम’ (AI Hallucination) से बचने के लिए भारत ने सख्त एथिकल गाइडलाइंस का प्रस्ताव रखा है।

आम आदमी की जेब और नौकरी पर क्या होगा असर?

एआई को लेकर सबसे बड़ा डर नौकरियों के जाने का है। लेकिन एक्सपर्ट्स का मानना है कि भारत में एआई ‘जॉब किलर’ नहीं बल्कि ‘जॉब इनेबलर’ बनेगा।

  1. री-स्किलिंग का नया दौर: क्लर्क और डेटा एंट्री जैसे काम अब मशीनें करेंगी, जिससे युवाओं को क्रिएटिव और स्ट्रैटेजिक रोल में आने का मौका मिलेगा।
  2. सरकारी सेवाओं में तेजी: राशन कार्ड से लेकर पासपोर्ट बनवाने तक, एआई फाइल प्रोसेसिंग की रफ्तार को 10 गुना बढ़ा देगा।
  3. स्वास्थ्य और शिक्षा: ग्रामीण इलाकों में एआई आधारित डॉक्टर और ट्यूटर पहुँचेंगे, जहाँ विशेषज्ञों की कमी है।

ग्लोबल लीडरशिप: ‘डिजिटल वैक्सीन’ के बाद अब ‘एआई फॉर ऑल’

जिस तरह भारत ने कोविड के समय स्वदेशी वैक्सीन देकर दुनिया की मदद की, उसी तर्ज पर अब भारत एआई का ‘ओपन सोर्स’ मॉडल ग्लोबल साउथ (विकासशील देशों) को देने की तैयारी में है। यह भारत की Soft Power को एक नई ऊंचाई पर ले जाएगा। भारत का संदेश साफ है—एआई केवल अमीरों का खिलौना नहीं, बल्कि गरीबों का सहारा बनना चाहिए।

“एआई हमारे लिए केवल कोड नहीं, बल्कि करोड़ों लोगों की उम्मीदों को जोड़ने वाली कड़ी है।”

भारत में एआई का भविष्य केवल सिलिकॉन वैली की तर्ज पर नहीं, बल्कि ‘भारतीय जरूरतों’ के हिसाब से तय हो रहा है। अगले 6 महीनों में हम सरकारी कामकाज में एआई के और भी कड़े हस्तक्षेप देखेंगे। प्रशासन अब ‘रिस्पॉन्सिव’ से ‘प्रिडिक्टिव’ होने जा रहा है। चुनौती केवल डेटा सिक्योरिटी की है, जिस पर संसद में नया कानून आने की संभावना है।

Subhash Shekhar

एक अनुभवी डिजिटल पत्रकार, कंटेंट स्ट्रैटेजिस्ट और SEO-फोकस्ड न्यूज़ राइटर हैं। वे झारखंड और बिहार से जुड़े राजनीति, प्रशासन, सामाजिक मुद्दों, शिक्षा, स्वास्थ्य और करंट अफेयर्स पर तथ्यपरक और भरोसेमंद रिपोर्टिंग के लिए जाने जाते हैं।

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