झारखंड विधानसभा के मानसून सत्र के आखिरी दिन विस्थापन का मुद्दा प्रमुख रूप से उठा। डुमरी विधायक जयराम महतो और सरकार के मंत्री दीपक बिरवा के बीच सदन में इस विषय को लेकर तीखी बहस देखने को मिली। महतो ने सरकार से सवाल किए कि बजट सत्र में 90 दिनों के भीतर विस्थापन आयोग बनाने का वादा क्यों पूरा नहीं हुआ।
महतो ने सदन में जोर देकर कहा कि भेरवी, गैसल सूद, माथेन, पंचेत, डिमना और तेलैया डैम जैसी परियोजनाओं से विस्थापित लोग न्याय की प्रतीक्षा कर रहे हैं। उन्होंने बताया कि कई कंपनियों जैसे ईसीएल, बीसीसीएल, सीसीएल, टाटा, टिस्को, टेल्को, जिंदल, एनटीपीसी, डालमिया और सेल से विस्थापित परिवार लंबे समय से संघर्ष कर रहे हैं।
विस्थापितों का दर्द और संघर्ष
जयराम महतो ने विधानसभा में कहा कि विस्थापन झारखंड की सबसे गंभीर समस्या है। उन्होंने उदाहरण देते हुए बताया कि सिंधरी, बागमारा और बड़का गांव में लोग लगातार धरना-प्रदर्शन कर रहे हैं। आंदोलनकारियों पर लाठीचार्ज और एफआईआर दर्ज होना आम बात बन चुकी है।
महतो ने इसे वैश्विक संदर्भ से जोड़ते हुए कहा कि दुनिया के कई युद्ध – चाहे भारत-पाकिस्तान का पीओके विवाद हो, भारत-चीन का अरुणाचल मुद्दा हो या रूस-यूक्रेन का क्राइमिया विवाद – जमीन के सवाल से जुड़े हैं। इसी तरह झारखंड में भी विस्थापितों का दर्द हर कोने में महसूस किया जा रहा है।
सरकार का जवाब
जयराम महतो के सवालों पर मंत्री दीपक बिरवा ने जवाब दिया कि विस्थापन आयोग का गठन “प्रक्रियाधीन” है और सरकार इस पर गंभीरता से काम कर रही है। उन्होंने दावा किया कि सभी औपचारिकताएं लगभग पूरी हो चुकी हैं और “अति शीघ्र” आयोग का गठन कर दिया जाएगा।
हालांकि, महतो ने कहा कि 90 दिनों का समय बीत जाने के बावजूद आयोग नहीं बना। उन्होंने सरकार से स्पष्ट समयसीमा तय करने और विस्थापितों की समस्याओं का त्वरित समाधान निकालने की मांग की।
धरनों और आंदोलनों की गूंज
महतो ने बताया कि मंगलपुरा में लोग हजार दिनों से धरने पर बैठे हैं, वहीं नगरी और 13 माइल क्षेत्र में भी लगातार आंदोलन हो रहे हैं। उन्होंने सुझाव दिया कि विस्थापितों को भूमि के बदले भूमि, उचित मुआवजा और हर प्रभावित परिवार को रोजगार की गारंटी मिलनी चाहिए।
विस्थापन झारखंड की सबसे गंभीर चुनौतियों में से एक है। लाखों विस्थापित परिवार आज भी अपने अधिकार और न्याय की प्रतीक्षा कर रहे हैं। विधानसभा में हुई यह बहस एक बार फिर इस मुद्दे को केंद्र में ले आई है। अब देखना यह होगा कि सरकार अपने वादों पर कितनी जल्दी अमल करती है और विस्थापन आयोग कब तक गठित हो पाता है।








