रांची। मुख्य निर्वाचन पदाधिकारी (सीईओ) श्री के. रवि कुमार की अध्यक्षता में हुई महत्वपूर्ण बैठक में उन पांच गैर मान्यता प्राप्त राजनीतिक दलों पर चर्चा हुई, जिनका अस्तित्व संदेह के घेरे में है। इन दलों के बारे में निर्वाचन आयोग को लंबे समय से कोई अद्यतन जानकारी नहीं मिल रही थी, जिसके बाद इन्हें सूची से हटाने की प्रक्रिया शुरू की गई है।
निर्वाचन आयोग ने जारी किए सख्त निर्देश
भारत निर्वाचन आयोग ने इन राजनीतिक दलों के अध्यक्षों और महासचिवों को निर्देशित किया था कि वे शपथ पत्र सहित अपना लिखित पक्ष मुख्य निर्वाचन पदाधिकारी के समक्ष प्रस्तुत करें। इसके लिए 22 अगस्त 2025 तक समय सीमा तय की गई थी और सुनवाई की अंतिम तिथि 29 अगस्त 2025 पूर्वाह्न 11 बजे निर्धारित की गई थी। आयोग की ओर से पंजीकृत पते पर पत्र भेजने के साथ-साथ समाचार पत्रों और सोशल मीडिया के जरिए भी जानकारी सार्वजनिक की गई थी।
केवल झारखंड जनाधिकार पार्टी ने रखा पक्ष
निर्धारित बैठक में रांची स्थित झारखंड जनाधिकार पार्टी के पदाधिकारी उपस्थित हुए और अपने दल के अस्तित्व को बचाने के लिए लिखित और मौखिक पक्ष रखा। वहीं, शेष चार दल – हजारीबाग का आपका हमारा पार्टी, गिरिडीह का बहुजन सदान मोर्चा, पूर्वी सिंहभूम का झारखंड दिशाेम पार्टी और रांची का हम किसान पार्टी— अपने प्रतिनिधि भेजने में विफल रहे। उनकी अनुपस्थिति से यह साफ हो गया कि ये दल सक्रिय राजनीतिक गतिविधियों से लगभग कट चुके हैं।
सूची से हटाने की प्रक्रिया तेज
चूंकि चार राजनीतिक दल समय सीमा और निर्धारित सुनवाई में उपस्थित नहीं हो सके, इसलिए इनके विरुद्ध सूची से हटाने की प्रक्रिया और तेज हो गई है। आयोग अब इनके पंजीकरण को रद्द करने की ओर बढ़ रहा है। यह कदम पारदर्शी राजनीतिक वातावरण बनाए रखने और निष्क्रिय दलों को सूची से हटाने की दिशा में एक बड़ा निर्णय माना जा रहा है।
निष्क्रिय दलों पर गिरेगी गाज
मुख्य निर्वाचन पदाधिकारी कार्यालय ने स्पष्ट किया कि केवल वही राजनीतिक दल सूची में बने रहेंगे जो समय-समय पर आयोग को आवश्यक दस्तावेज और गतिविधियों की जानकारी देंगे। निष्क्रिय या बिना पते वाले दलों के लिए अब कोई गुंजाइश नहीं बचेगी। इससे चुनावी प्रक्रिया अधिक सुदृढ़ और व्यवस्थित बनेगी।
पारदर्शिता की दिशा में महत्वपूर्ण कदम
चुनाव आयोग का यह कदम न केवल निष्क्रिय दलों को समाप्त करेगा बल्कि सक्रिय राजनीतिक दलों की पारदर्शिता और जवाबदेही को भी मजबूत करेगा। विशेषज्ञों का मानना है कि इससे राज्य की राजनीति में गंभीरता आएगी और केवल वही दल सक्रिय रहेंगे जो जनता से जुड़े कार्य कर रहे हैं।
झारखंड में अब यह देखना दिलचस्प होगा कि आयोग की इस कार्रवाई के बाद कितने और दलों पर असर पड़ता है और कौन-कौन से संगठन सक्रिय रहकर अपनी राजनीतिक पहचान बचा पाते हैं।









