भारत की राजनीति में जीएसटी सुधार हमेशा चर्चा का विषय रहे हैं। कांग्रेस पार्टी ने एक बार फिर केंद्र सरकार पर निशाना साधते हुए कहा है कि राहुल गांधी द्वारा वर्षों पहले दिए गए सुझावों को नजरअंदाज किया गया, जिसकी वजह से उपभोक्ताओं और छोटे व्यापारियों को भारी नुकसान झेलना पड़ा।
इस लेख में हम विस्तार से समझेंगे कि जीएसटी सुधारों की देरी क्यों हुई, राहुल गांधी के तर्क क्या थे, कांग्रेस और भाजपा की इस मुद्दे पर राजनीति कैसी रही, और अब लागू सुधारों का देश की अर्थव्यवस्था पर क्या असर होगा।
जीएसटी की पृष्ठभूमि: कांग्रेस की पहल और भाजपा की आपत्तियां
वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) का विचार सबसे पहले यूपीए सरकार के कार्यकाल में सामने आया। 2011 में तत्कालीन वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी ने संसद में जीएसटी विधेयक पेश किया। लेकिन उस समय भाजपा समेत कई विपक्षी दलों ने इस पर आपत्तियां दर्ज कर दीं।
2014 में जब नरेंद्र मोदी सरकार सत्ता में आई, तो उसने इस बिल को आगे बढ़ाया और 2017 में इसे लागू किया। 30 जून–1 जुलाई 2017 की आधी रात को संसद भवन के सेंट्रल हॉल में तत्कालीन राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी और प्रधानमंत्री मोदी ने इसका उद्घाटन किया।
राहुल गांधी और ‘गब्बर सिंह टैक्स’ का नारा
2016 से ही राहुल गांधी ने जीएसटी के प्रस्तावित ढांचे पर आपत्ति जताते हुए इसे ‘गब्बर सिंह टैक्स’ कहा।
उनका कहना था कि:
- गरीब और मध्यम वर्गीय उपभोक्ताओं पर बोझ बढ़ेगा।
- छोटे व्यवसायों के लिए कई टैक्स स्लैब संभालना मुश्किल होगा।
- 18 प्रतिशत की सीमा तय की जानी चाहिए ताकि अप्रत्यक्ष कर आम आदमी के लिए बोझ न बने।
2017 में गुजरात विधानसभा चुनावों के दौरान राहुल गांधी ने जीएसटी और नोटबंदी को सबसे बड़ा चुनावी मुद्दा बनाया।
कांग्रेस की मांग: एक समान कर दर
कांग्रेस पार्टी लगातार यह मांग करती रही है कि भारत को ‘सच्चा जीएसटी’ चाहिए, न कि जटिल और बहु-स्तरीय टैक्स ढांचा।
राहुल गांधी का तर्क था कि:
- टैक्स स्लैब को कम कर एक समान दर लागू की जाए।
- उपभोक्ताओं और छोटे व्यापारियों को राहत मिले।
- जीएसटी को सरल और पारदर्शी बनाया जाए।
उनका कहना था कि अगर भाजपा सरकार ऐसा नहीं करेगी, तो कांग्रेस इसे अपने चुनावी घोषणा पत्र में शामिल करेगी और लागू करेगी।
2017 से 2024: सुधारों की देरी और उपभोक्ताओं की मुश्किलें
कांग्रेस का आरोप है कि मोदी सरकार ने जीएसटी सुधार लागू करने में जानबूझकर देरी की।
इसके कारण:
- करोड़ों छोटे व्यवसाय प्रभावित हुए।
- लाखों नौकरियां गईं।
- उपभोक्ताओं को ऊंचे टैक्स स्लैब का सामना करना पड़ा।
- देश की जीडीपी और विकास दर पर नकारात्मक असर पड़ा।
बी.के. हरिप्रसाद जैसे वरिष्ठ कांग्रेस नेता का कहना है कि सरकार ने सिर्फ इसलिए सुधारों को टाला क्योंकि सुझाव विपक्ष की ओर से आए थे।
2024 में बदलाव: क्या राहुल गांधी की बात मान गई सरकार?
1 जुलाई 2024 को संसद में हुई बहस में राहुल गांधी ने एक बार फिर जीएसटी को सरल बनाने की मांग रखी।
कुछ ही हफ्तों बाद 3 सितंबर को वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने जीएसटी सुधारों की घोषणा की।
कांग्रेस नेताओं का दावा है कि यह फैसला मोदी सरकार की मजबूरी थी, क्योंकि:
- राहुल गांधी ने बिहार यात्रा के दौरान वोट चोरी के आरोप लगाए थे।
- जनता में नाराजगी बढ़ रही थी।
- आगामी बिहार विधानसभा चुनाव से पहले सरकार को सकारात्मक संदेश देना था।
कांग्रेस का आरोप: राजनीतिक मजबूरी में लिया फैसला
अभिषेक दत्त, बी.एम. संदीप और अन्य कांग्रेस पदाधिकारियों का कहना है कि सरकार ने यह सुधार अपनी छवि बचाने और चुनावी नुकसान से बचने के लिए किए।
संदीप ने तंज कसते हुए कहा कि:
- 2019 में भाजपा की सीटें 303 थीं, जो 2024 में घटकर 240 हो गईं।
- जैसे-जैसे भाजपा की सीटें कम हुईं, वैसे-वैसे टैक्स स्लैब भी कम होने लगे।
- अगर भाजपा और सीटें हारेगी, तो जनता को और राहत मिलेगी।
जीएसटी सुधारों पर राज्यों की प्रतिक्रिया
जीएसटी परिषद की हालिया बैठक में कर्नाटक, तेलंगाना और अन्य राज्यों के वित्त मंत्रियों ने सुधारों का स्वागत किया।
लेकिन उन्होंने यह भी शिकायत की कि उन्हें राजस्व संग्रह में उचित हिस्सा नहीं मिल रहा।
क्या भारत को देर से सीखने वाली सरकार चाहिए?
कांग्रेस नेताओं का कहना है कि भारत को ऐसी सरकार की जरूरत है जो:
- विपक्ष की बात भी सुने।
- समय पर फैसले ले।
- आम आदमी और छोटे व्यापारियों की रक्षा करे।
उनका तर्क है कि देरी से किए गए सुधार अवसरों से वंचित करने के बराबर हैं।
राजनीति बनाम अर्थव्यवस्था
जीएसटी सुधारों का मुद्दा अब सिर्फ आर्थिक नहीं, बल्कि राजनीतिक भी हो गया है।
कांग्रेस लगातार यह साबित करने की कोशिश कर रही है कि अगर सरकार ने राहुल गांधी की बात पहले मान ली होती, तो उपभोक्ताओं और छोटे व्यापारियों को राहत मिलती।
भाजपा का पक्ष है कि सुधारों में समय लगा क्योंकि इतने बड़े कर ढांचे को लागू करने के लिए सहमति और तैयारी जरूरी थी।
सवाल यह है कि क्या भारत को ऐसी नीतियां चाहिए जो राजनीति के दबाव में बने, या फिर ऐसी नीतियां जो समय रहते जनता के हित में लागू हों?










