Ranchi | समय से पहले जन्मे बच्चों की आंखें अगर बाहर से बिल्कुल सामान्य दिख रही हैं, तब भी वे हमेशा के लिए छिन सकती हैं। डॉक्टरों की भाषा में इसे ROP स्क्रीनिंग (Retinopathy of Prematurity) का ‘गोल्डन पीरियड’ कहा जाता है, जहां शुरुआती 30 दिनों की लापरवाही जिंदगीभर का अंधेरा दे सकती है।
होटल चाणक्य बीएनआर में संपन्न हुए 5वें अखिल भारतीय नेत्र सम्मेलन (AIOS Mid-Term Conference 2026) के अंतिम दिन देश के शीर्ष नेत्र विशेषज्ञों ने बाल नेत्र स्वास्थ्य, बच्चों के कैंसर और चुपके से रोशनी चुराने वाले ग्लूकोमा को लेकर बेहद चौंकाने वाले तथ्य रखे हैं।
30 दिन की डेडलाइन: बाहर से सामान्य आंख, अंदर से खतरा
सम्मेलन के विशेष सत्र में कश्यप मेमोरियल आई हॉस्पिटल के डिप्टी डायरेक्टर और एम्स प्रशिक्षित रेटिना विशेषज्ञ डॉ. बिभूति कश्यप ने ग्राउंड रिपोर्ट साझा करते हुए बताया कि प्रीमैच्योर बच्चों में रेटिना की रक्त वाहिकाएं पूरी तरह विकसित नहीं होतीं। जन्म के बाद इन नसों का विकास असामान्य होने पर रेटिना अपनी जगह से उखड़ सकती है।
“माता-पिता अक्सर बच्चे की आंख में कोई खराबी दिखने का इंतजार करते हैं, जो सबसे घातक भूल है। ROP की शुरुआत में आंख बाहर से बिल्कुल साफ दिखती है। कम वजन, समय से पहले प्रसव या NICU में ऑक्सीजन सपोर्ट पर रहे बच्चों की ROP स्क्रीनिंग पहले 30 दिनों के भीतर कराना अनिवार्य है। समय पर पहचान हो तो आधुनिक लेजर, एंटी-VEGF इंजेक्शन और सर्जरी से रोशनी बचाई जा सकती है।”
— डॉ. बिभूति कश्यप, ROP विशेषज्ञ
कैमरे के फ्लैश में सफेद चमक? यह आंख का कैंसर हो सकता है
ऑल इंडिया ऑप्थल्मोलॉजिकल सोसाइटी (AIOS) के मानद महासचिव डॉ. संतोष जी. होनावर ने बच्चों में होने वाले आई कैंसर (रेटिनोब्लास्टोमा) पर माता-पिता को सीधे अलर्ट किया। उन्होंने स्पष्ट किया कि 5 वर्ष से कम उम्र के बच्चों की तस्वीर लेते समय पुतली में दिखने वाली सफेद चमक (White Reflex) केवल कैमरे का फ्लैश नहीं, बल्कि ट्यूमर की दस्तक हो सकती है।
डॉ. होनावर के अनुसार, आधुनिक ऑक्युलर ऑन्कोलॉजी प्रोटोकॉल के जरिए अब 98% बच्चों की जान और 90% मामलों में प्रभावित आंख को बचाया जा रहा है।
माता-पिता तुरंत पहचानें ये 5 रेड-फ्लैग संकेत:
- सफेद चमक (Leukocoria): सामान्य रोशनी या फोटो में पुतली का सफेद दिखना
- अचानक भेंगापन (Squint): बच्चे की आंखों की पुतलियों का एक सीध में न होना
- लगातार लाली व सूजन: बिना किसी बाहरी इंफेक्शन के आंख का लाल रहना
- रंग में बदलाव: पुतली या आइरिस के मूल रंग में असामान्यता
- दृष्टि दोष: बच्चे द्वारा देखने में परेशानी या लगातार आंख में दर्द बताना
ग्लूकोमा: ‘दृष्टि का मूक चोर’, 40 की उम्र पार करते ही जांच अनिवार्य
हैदराबाद के वरिष्ठ ग्लूकोमा विशेषज्ञ डॉ. मनोज माथुर ने ‘OOPS in Surgery’ और आधुनिक ग्लूकोमा सत्र के दौरान रेखांकित किया कि ग्लूकोमा मरीज को बिना कोई दर्द या लक्षण दिए ऑप्टिक नर्व को स्थायी रूप से नष्ट कर देता है।
“मरीज यह सोचकर बैठते हैं कि जब नजर कमजोर होगी, तब डॉक्टर के पास जाएंगे। ग्लूकोमा में एक बार खोई हुई रोशनी कभी वापस नहीं लाई जा सकती। सिर्फ आई प्रेशर (IOP) सामान्य होना ग्लूकोमा के खतरे को खारिज नहीं करता। इसके लिए विजुअल फील्ड और OCT टेस्ट जरूरी हैं। यदि डॉक्टर ने ड्रॉप्स शुरू किए हैं, तो लक्षण ठीक लगने पर भी दवा कभी बंद न करें।”
— डॉ. मनोज माथुर, ग्लूकोमा विशेषज्ञ
1500 विशेषज्ञ और 100 वैज्ञानिक सत्र: झारखंड के लिए नया रोडमैप
तीन दिवसीय इस राष्ट्रीय सम्मेलन में देश भर से जुटे 1500 से अधिक नेत्र चिकित्सकों ने 100 से ज्यादा वैज्ञानिक सत्रों में भाग लिया। कॉर्नियल रिकंस्ट्रक्शन, न्यूरो-ऑप्थल्मोलॉजी और जटिल सर्जिकल जटिलताओं से निपटने की तकनीकों पर विस्तृत चर्चा हुई। दोपहर के सत्र में उत्कृष्ट शोध पत्रों (Free Papers), वीडियो प्रस्तुतियों और फिजिकल पोस्टर्स के विजेताओं को सम्मानित किया गया।
विशेषज्ञों का साझा संदेश साफ है: नवजात शिशुओं की समयबद्ध ROP स्क्रीनिंग, बाल कैंसर की समय रहते पहचान और 40 की उम्र के बाद नियमित ग्लूकोमा जांच ही अंधत्व निवारण की सबसे मजबूत कड़ी है।










