रांची: राजधानी रांची के बीआईटी मेसरा (BIT Mesra) परिसर के पास पड़ने वाले रुदिया जंगल क्षेत्र में एक बड़ा प्रशासनिक और सामाजिक टकराव खड़ा हो गया है। पेयजल विभाग की बहु-ग्रामीण जलापूर्ति योजना के तहत पाइपलाइन बिछाने का काम जैसे ही जंगल के बीचों-बीच पहुंचा, स्थानीय ग्रामीणों ने काम को पूरी तरह रोक दिया।

यह विवाद उस समय और गंभीर हो गया जब सरकारी दस्तावेजों और ग्रामीणों के बयानों में सीधा विरोधाभास सामने आया। प्रशासन जहां वन प्रमंडल पदाधिकारी (DFO) कार्यालय से मिली एनओसी (NOC) के आधार पर काम को पूरी तरह वैध बता रहा है, वहीं स्थानीय जनप्रतिनिधियों ने इस एनओसी को ही ‘फर्जी’ करार दे दिया है।
शुरुआती जांच में सामने आया है कि इस योजना के लिए कुल 102 हेक्टेयर वन भूमि में पाइपलाइन बिछाई जानी है। सरकारी आदेश के मुताबिक इसके लिए स्थानीय ग्राम सभा की सहमति मिल चुकी है, लेकिन धरातल पर स्थिति इसके बिल्कुल उलट है।
क्या वाकई हुई ग्राम सभा? प्रधान और मुखिया के तीखे सवाल
इस पूरे बवाल के केंद्र में ‘ग्राम सभा’ की मंजूरी का वह सरकारी कागज है, जिसे ग्रामीण मानने से साफ इनकार कर रहे हैं। ग्राउंड जीरो पर मौजूद ग्रामीणों का नेतृत्व कर रहे बाबूलाल जी ने सीधे तौर पर कहा, “पेजल की योजना अच्छी है, किसी की प्यास बुझाने से हमें दिक्कत नहीं है। लेकिन जंगल के अंदर से पाइपलाइन ले जाना और पेड़ों को नुकसान पहुंचाना हमें मंजूर नहीं। अगर काम करना ही है, तो ग्राम सभा बुलाकर विकल्प निकाला जाए।”
जब हमारी टीम ने सरकारी रिपोर्ट में ग्राम सभा की मंजूरी होने का जिक्र किया, तो ग्राम प्रधान करमू मुंडा (ग्राम प्रधान, रुदिया) भड़क गए। उन्होंने दो टूक कहा:
“कागजों में लिखा है कि ग्राम सभा की अनुमति है, यह सरासर गलत है। हमने न तो कोई ग्राम सभा कराई है और न ही ग्रामीणों की कोई सहमति ली गई है। यह 100% फर्जी रिपोर्ट है, तभी हम इसका विरोध कर रहे हैं।”
“हम DFO को कोर्ट घसीटेंगे” — मुखिया कुशल मुंडा की चेतावनी
इस मामले ने तब और तूल पकड़ लिया जब पंचायत के मुखिया कुशल मुंडा भी ग्रामीणों के समर्थन में मैदान में उतर आए। उन्होंने पेयजल विभाग और वन विभाग (DFO) की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल उठाए हैं।
मुखिया कुशल मुंडा ने कहा, “ग्राम सभा का मालिक प्रधान होता है। यह सभा पंचायत भवन, अखाड़ा या किसी सामूहिक जगह पर होती है, जिसमें एक-तिहाई महिलाओं की उपस्थिति अनिवार्य है। ऐसा कुछ हुआ ही नहीं। डीएफओ साहब ने किस आधार पर अथॉरिटी दे दी, यह जांच का विषय है। अगर विभाग कागज नहीं दिखा पाया, तो हम वन विभाग और पेयजल विभाग दोनों को पार्टी बनाकर कोर्ट जाएंगे।”
प्रशासन का पक्ष: “हमें काम रोकने का आदेश नहीं”
विवाद और हंगामे की सूचना मिलने के बाद मौके पर भारी संख्या में पुलिस बल और प्रशासनिक अधिकारी पहुंचे। विधि-व्यवस्था संभालने के लिए नियुक्त मजिस्ट्रेट संजय कुमार सिंह ने इस गतिरोध पर प्रशासनिक पक्ष रखा।

मजिस्ट्रेट संजय कुमार सिंह ने कहा, “यह एनओसी डीएफओ कार्यालय से निर्गत है और हम अनुमंडल पदाधिकारी (SDM) साहब के आदेश पर यहां काम कराने आए हैं। अगर ग्रामीणों को कागजातों या ग्राम सभा को लेकर कोई आपत्ति है, तो वे सही प्लेटफॉर्म पर जाकर एसडीएम साहब के समक्ष अपनी बात रख सकते हैं। हमारे पास काम रोकने का कोई लिखित आदेश नहीं है।”
क्या है ‘पैसा कानून’? अब आगे क्या?
ग्रामीणों का दावा है कि यह क्षेत्र पांचवीं अनुसूची (Fifth Schedule) के अंतर्गत आता है और राज्य में हाल ही में लागू हुए पैसा (PESA) कानून के तहत बिना ग्राम सभा की वास्तविक सहमति के एक इंच भी काम नहीं किया जा सकता। ग्रामीणों ने साफ कर दिया है कि वे सोमवार को प्रशासनिक अधिकारियों से मुलाकात करेंगे, लेकिन तब तक जंगल में किसी भी तरह की खुदाई नहीं होने दी जाएगी।
अब गेंद रांची जिला प्रशासन और वन विभाग के पाले में है। यदि प्रशासन समय रहते इस ‘फर्जी ग्राम सभा’ के आरोपों पर स्थिति स्पष्ट नहीं करता है, तो यह स्थानीय विवाद एक बड़े कानूनी और राजनीतिक आंदोलन का रूप ले सकता है।

