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पद्मभूषण के बाद बड़ा सवाल: क्या दिशोम गुरु शिबू सोरेन को मिलेगा भारत रत्न?

Ranchi। झारखंड की धरती से उठी आदिवासी चेतना को राष्ट्रीय पहचान दिलाने वाले शिबू सोरेन को पद्मभूषण सम्मान से नवाजा गया है। यह सम्मान केवल एक व्यक्ति का नहीं, बल्कि दशकों से चले आ रहे आदिवासी संघर्ष, आत्मसम्मान और अधिकारों की लड़ाई की राष्ट्रीय स्वीकृति माना जा रहा है।
पद्मभूषण की घोषणा के साथ ही एक बार फिर उन्हें भारत रत्न देने की मांग तेज हो गई है—वह मांग, जिसे झारखंड विधानसभा पहले ही सर्वसम्मति से पारित कर चुकी है।

पहले ही संकेतों में साफ है कि यह सम्मान क्यों अहम है, किस संघर्ष की जीत है और आगे राजनीतिक-सामाजिक स्तर पर इसका क्या असर पड़ सकता है।

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पद्मभूषण: संघर्षों को मिला राष्ट्रीय सम्मान

पद्मभूषण मिलने के बाद झारखंड भर में खुशी और गर्व का माहौल है। राजनीतिक दलों से लेकर सामाजिक संगठनों तक ने इसे हाशिये पर खड़े समाज की आवाज को मिला सम्मान बताया है।
दशकों तक जल, जंगल और जमीन की रक्षा के लिए चले आंदोलनों को अब राष्ट्रीय स्तर पर मान्यता मिली है—यही इस सम्मान की असली ताकत है।

संथाल परगना से शुरू हुई आवाज, पूरे झारखंड की पहचान बनी

दिशोम गुरु का संघर्ष संथाल परगना से शुरू हुआ, लेकिन देखते ही देखते यह पूरे झारखंड में आदिवासी अधिकारों की मजबूत आवाज बन गया।
अलग झारखंड राज्य के गठन में उनकी भूमिका को ऐतिहासिक माना जाता है। यही कारण है कि आदिवासी समाज उन्हें सिर्फ नेता नहीं, बल्कि संघर्ष का प्रतीक मानता है।

क्यों कहा जाता है ‘दिशोम गुरु’?

  • आदिवासी अस्मिता की रक्षा
  • संवैधानिक अधिकारों के लिए आंदोलन
  • जमीन अधिग्रहण और विस्थापन के खिलाफ मुखर आवाज
  • सामाजिक न्याय को राजनीति के केंद्र में लाना

भारत रत्न की मांग क्यों फिर तेज हुई?

शिबू सोरेन को भारत रत्न देने की मांग कोई नई नहीं है।
झारखंड विधानसभा ने पहले ही सर्वसम्मति से प्रस्ताव पारित कर केंद्र सरकार को इसकी अनुशंसा भेजी है। सदस्यों का साफ कहना रहा है कि—

  • योगदान सिर्फ झारखंड तक सीमित नहीं
  • देशभर के आदिवासी समाज को नई दिशा
  • लोकतंत्र में वंचित वर्ग की निर्णायक भागीदारी

पद्मभूषण मिलने के बाद यह तर्क और मजबूत हो गया है कि अब अगला स्वाभाविक कदम भारत रत्न होना चाहिए।

राजनीतिक और सामाजिक योगदान: एक लंबी यात्रा

शिबू सोरेन कई बार सांसद और केंद्रीय मंत्री रह चुके हैं।
उन्होंने संसद से सड़क तक आदिवासी मुद्दों को मजबूती से उठाया। उनके नेतृत्व में झारखंड मुक्ति मोर्चा ने आदिवासी राजनीति को राष्ट्रीय पहचान दिलाई।

प्रमुख योगदान

  • आदिवासी राजनीति को राष्ट्रीय मंच
  • सामाजिक न्याय और क्षेत्रीय अस्मिता
  • लोकतांत्रिक संस्थाओं में वंचितों की भागीदारी

अब आगे क्या? केंद्र के पाले में फैसला

पद्मभूषण सम्मान के साथ संघर्षों को आधिकारिक मान्यता मिल चुकी है।
अब सवाल सीधा केंद्र सरकार से है—
क्या झारखंड विधानसभा के प्रस्ताव और जनभावना को भारत रत्न के रूप में सम्मान मिलेगा?

यदि ऐसा होता है, तो यह सिर्फ एक व्यक्ति का नहीं, बल्कि पूरे आदिवासी समाज की ऐतिहासिक जीत मानी जाएगी।

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Subhash Shekhar

सुभाष शेखर पिछले दो दशकों से अधिक समय से पत्रकारिता जगत में सक्रिय हैं। साल 2003 में बुंडू (झारखंड) की जमीनी समस्याओं को आवाज देने से शुरू हुआ उनका सफर आज 'Local Khabar' के माध्यम से डिजिटल पत्रकारिता के नए आयाम स्थापित कर रहा है। प्रभात खबर, ताजा टीवी, नक्षत्र न्यूज और राष्ट्रीय खबर जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों में संपादकीय और ग्राउंड रिपोर्टिंग का अनुभव रखने वाले सुभाष, आज के दौर के उन गिने-चुने पत्रकारों में से हैं जो खबर की बारीकियों के साथ-साथ वेब डिजाइनिंग और SEO जैसी तकनीकी विधाओं में भी महारत रखते हैं। वे वर्तमान में Local Khabar के संस्थापक और संपादक के रूप में झारखंड की जनपक्षीय खबरों का नेतृत्व कर रहे हैं।

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