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झारखंड में ट्रांसफर-पोस्टिंग घोटाला: पुलिस अधिकारियों के तबादले के नाम पर करोड़ों की वसूली का पर्दाफाश

सरकारी तंत्र में भ्रष्टाचार कोई नई बात नहीं है, लेकिन जब कानून और व्यवस्था बनाए रखने वाली पुलिस व्यवस्था ही घोटालों में लिप्त पाई जाती है, तो यह एक गंभीर चिंता का विषय बन जाता है। हाल ही में झारखंड पुलिस के आई.पी.एस., डी.एस.पी. और दारोगा स्तर के अधिकारियों के मनचाहे तबादले और पोस्टिंग करवाने के नाम पर 1.5 करोड़ रुपये की वसूली करने वाले गिरोह का पर्दाफाश हुआ। इस मामले में पांच लोगों को हिरासत में लिया गया, जिनसे पूछताछ जारी है।

झारखंड पुलिस ट्रांसफर-पोस्टिंग घोटाला: क्या है पूरा मामला?

कैसे हुआ घोटाले का खुलासा?

रांची पुलिस ने कुछ दिनों पहले एक बड़े रैकेट का भंडाफोड़ किया, जो झारखंड में वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों के ट्रांसफर और पोस्टिंग को अपने अनुसार तय करवा रहा था। इस गिरोह के सदस्य पुलिस विभाग के अधिकारियों से मनचाही पोस्टिंग दिलाने के बदले भारी रकम वसूल रहे थे।

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इस रैकेट के खुलासे के बाद पांच लोगों को गिरफ्तार किया गया है, जिनमें प्रमुख रूप से शामिल हैं:

  • मजहर उर्फ मुन्ना
  • देवेंद्र सिंह मुरारका
  • सूर्य प्रभात (रांची)
  • आमना सरकार
  • चंदन लाल (जमशेदपुर)

गिरफ्तार लोगों के पास से मिले सबूत

पुलिस ने जब इन आरोपियों के मोबाइल फोन की जांच की, तो उनमें कई वरिष्ठ अधिकारियों के ट्रांसफर और पोस्टिंग से संबंधित वॉट्सऐप चैट मिले। इन चैट्स में कई पुलिस अधिकारियों के नाम, उनकी मनचाही पोस्टिंग, और इसके बदले दी जाने वाली रकम का विवरण दर्ज था।

कौन-कौन शामिल हो सकता है?

अभी तक किसी भी वरिष्ठ पुलिस अधिकारी का नाम सामने नहीं आया है, लेकिन ऐसा माना जा रहा है कि कई पदस्थ अधिकारी भी इस रैकेट का हिस्सा हो सकते हैं। झारखंड पुलिस इस मामले की गहराई से जांच कर रही है और जल्द ही सी.आई.डी. (CID) से भी जांच करवाई जा सकती है।

ट्रांसफर-पोस्टिंग घोटाले के पीछे का खेल

कैसे काम करता है यह रैकेट?

  • यह गिरोह राज्य के आई.पी.एस., डी.एस.पी., और दारोगा स्तर के अधिकारियों से संपर्क करता था।
  • यदि किसी अधिकारी को किसी विशेष जिले या थाने में पोस्टिंग चाहिए होती थी, तो उनसे एक निश्चित राशि की मांग की जाती थी।
  • इस काम में बिचौलियों (मध्यस्थों) की महत्वपूर्ण भूमिका होती थी, जो पुलिस मुख्यालय और अधिकारियों के बीच समझौता करवाते थे।
  • जब अधिकारी भुगतान करने के लिए तैयार हो जाते थे, तो उनकी पोस्टिंग आदेश जारी करवा दी जाती थी

कितने का खेल था यह घोटाला?

प्रारंभिक जांच में खुलासा हुआ है कि अब तक 1.5 करोड़ रुपये वसूले जा चुके हैं। हालांकि, यह सिर्फ एक अनुमान है और असली रकम इससे कई गुना अधिक हो सकती है।

क्या कह रही है झारखंड पुलिस?

अभी तक कोई शिकायतकर्ता सामने क्यों नहीं आया?

इस घोटाले की सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि कोई भी अधिकारी खुलकर शिकायत दर्ज कराने के लिए आगे नहीं आ रहा। इसका कारण यह है कि जो भी शिकायत करेगा, वह खुद भी इस गोरखधंधे का हिस्सा साबित हो सकता है

पुलिस की भूमिका पर भी उठ रहे हैं सवाल

झारखंड पुलिस की भूमिका को लेकर भी सवाल खड़े हो रहे हैं, क्योंकि ट्रांसफर और पोस्टिंग को लेकर पुलिस मुख्यालय और गृह विभाग में चल रही गतिविधियों पर नजर रखना उनका काम था।

सी.आई.डी. जांच की संभावना

इस पूरे मामले की गंभीरता को देखते हुए यह संभावना जताई जा रही है कि इसकी जांच जल्द ही झारखंड सी.आई.डी. को सौंप दी जाएगी।

भारत में पुलिस ट्रांसफर-पोस्टिंग घोटाले: एक आम समस्या

क्या यह केवल झारखंड तक सीमित है?

नहीं, भारत के कई राज्यों में पुलिस ट्रांसफर-पोस्टिंग से जुड़ी अनियमितताओं के मामले सामने आते रहते हैं

  • महाराष्ट्र में 2021 में एक बड़ा ट्रांसफर-पोस्टिंग घोटाला उजागर हुआ था।
  • उत्तर प्रदेश में भी पुलिस अधिकारियों की मनचाही पोस्टिंग के लिए बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार होता है।
  • बिहार, राजस्थान और मध्य प्रदेश जैसे राज्यों में भी ऐसे कई मामलों की खबरें आती रहती हैं।

भ्रष्टाचार रोकने के लिए क्या उपाय किए जा सकते हैं?

1. डिजिटल ट्रांसफर-पोस्टिंग सिस्टम

यदि पुलिस अधिकारियों के ट्रांसफर और पोस्टिंग को पूरी तरह से डिजिटल कर दिया जाए और किसी भी तरह के मानवीय हस्तक्षेप को खत्म कर दिया जाए, तो इस प्रकार के घोटालों पर रोक लग सकती है।

2. स्वतंत्र निगरानी समिति

एक स्वतंत्र ट्रांसफर-पोस्टिंग निगरानी समिति बनाई जानी चाहिए, जिसमें न्यायपालिका, सामाजिक कार्यकर्ता और रिटायर्ड प्रशासनिक अधिकारी शामिल हों

3. व्हिसलब्लोअर प्रोटेक्शन कानून का सख्ती से पालन

अगर कोई अधिकारी इस तरह की अनियमितताओं की शिकायत करता है, तो उसकी सुरक्षा और गोपनीयता सुनिश्चित की जानी चाहिए।

झारखंड में सामने आया ट्रांसफर-पोस्टिंग घोटाला इस बात का सबूत है कि कानून लागू करने वाली संस्थाएं खुद भ्रष्टाचार की शिकार हो रही हैं। इस घोटाले के पीछे की सच्चाई पूरी तरह से सामने आनी चाहिए और दोषियों को कड़ी से कड़ी सजा दी जानी चाहिए।

यदि इस प्रकार के मामलों पर सख्त कार्रवाई नहीं की जाती है, तो यह भ्रष्टाचार और भी बढ़ सकता है। इसके लिए जरूरी है कि सरकार, पुलिस और न्यायपालिका मिलकर पारदर्शिता लाने के लिए कठोर कदम उठाएं

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Subhash Shekhar

सुभाष शेखर पिछले दो दशकों से अधिक समय से पत्रकारिता जगत में सक्रिय हैं। साल 2003 में बुंडू (झारखंड) की जमीनी समस्याओं को आवाज देने से शुरू हुआ उनका सफर आज 'Local Khabar' के माध्यम से डिजिटल पत्रकारिता के नए आयाम स्थापित कर रहा है। प्रभात खबर, ताजा टीवी, नक्षत्र न्यूज और राष्ट्रीय खबर जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों में संपादकीय और ग्राउंड रिपोर्टिंग का अनुभव रखने वाले सुभाष, आज के दौर के उन गिने-चुने पत्रकारों में से हैं जो खबर की बारीकियों के साथ-साथ वेब डिजाइनिंग और SEO जैसी तकनीकी विधाओं में भी महारत रखते हैं। वे वर्तमान में Local Khabar के संस्थापक और संपादक के रूप में झारखंड की जनपक्षीय खबरों का नेतृत्व कर रहे हैं।

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