झारखंड में JPSC और CGL समेत चार बड़ी परीक्षाओं को रद करने के मामले में राज्य सरकार ने हाई कोर्ट में शपथ पत्र दाखिल कर दिया है। सरकार ने 18 अगस्त के कैबिनेट फैसले को पूरी तरह जनहित और संविधान सम्मत करार दिया है।
प्रशासन का दो टूक कहना है कि जब परीक्षा की कस्टडी संभालने वाली एजेंसी ही बिक चुकी हो, तो उसमें से दागी और बेदाग अभ्यर्थियों को अलग करना असंभव है।
इस खुलासे के बाद राज्य के प्रशासनिक और राजनीतिक हलकों में खलबली मच गई है। लाखों ईमानदार छात्रों की नजरें अब अदालत के अंतिम रुख पर टिकी हैं।
नेपाल से आसनसोल तक ‘रटंत कैंप’: 50 लाख से 1 करोड़ में बिका डिप्टी कलेक्टर का पद
सीआईडी जांच रिपोर्ट के हवाले से सरकार ने अदालत के सामने जो ब्योरा रखा है, वह किसी संगठित क्राइम सिंडिकेट जैसा है। जांच में सामने आया कि परीक्षा से ठीक पहले अभ्यर्थियों को अलग-अलग राज्यों और सीमा पार ले जाकर संगठित रूप से उत्तर रटवाए गए।
नेपाल के बीरगंज में विशेष कैंप लगाया गया था, जहां 28 अभ्यर्थियों को ले जाकर रट्टा लगवाया गया। इनमें से 10 अभ्यर्थी अंतिम रूप से सफल भी घोषित हो गए। इसके अलावा बिहार, कोलकाता, आसनसोल, झरिया और बोकारो में भी ऐसे ही सीक्रेट ठिकाने तैयार किए गए थे।
हलफनामे में बड़ा खुलासा:
“डिप्टी कलेक्टर और अन्य संबद्ध प्रशासनिक सेवाओं के पदों की बोली 50 लाख से लेकर एक करोड़ रुपये तक लगाई गई थी। यह सामान्य अनियमितता नहीं, बल्कि पूरी परीक्षा प्रणाली पर सिंडिकेट का कब्जा था।”
बिना सील OMR शीट और क्लाउड सर्वर से छेड़छाड़
ग्राउंड रिपोर्ट और कानूनी दस्तावेजों के अनुसार, मुख्य परीक्षा के डेटा प्रोसेसिंग, मेरिट लिस्ट और इंटरव्यू का काम नियमों को ताक पर रखकर नॉमिनेशन बेसिस पर ‘मेसर्स टीएसआर डेटा प्रोसेसिंग प्रा. लि. (TDPL)’ को सौंपा गया था।
- खुली OMR शीट: परीक्षा की OMR शीट बिना सील किए रखी गई थीं।
- क्लाउड सर्वर में हेरफेर: सर्वर में सीधे बदलाव कर ऑन-स्क्रीन मार्किंग सिस्टम के जरिए लिखित परीक्षा के अंक बढ़ाए गए।
- इंटरव्यू में डिकोडिंग: मनचाहे नंबर दिलाने के लिए कोड तोड़े गए और वॉट्सऐप पर आंसर-की बांटी गई।
- साक्ष्य मिटाने की कोशिश: एफआईआर दर्ज होते ही तत्कालीन चेयरमैन द्वारा डिजिटल सबूत मिटाने के लिए सरकारी लैपटॉप तक नष्ट कर दिया गया।
28 गिरफ्तार, 265 रडार पर: सरकार ने दिया सुप्रीम कोर्ट की नजीरों का हवाला
सीआईडी अब तक आयोग के तत्कालीन चेयरमैन, परीक्षा नियंत्रक और टीडीपीएल निदेशकों समेत 28 लोगों को जेल भेज चुकी है। इसके अलावा 265 सफल अभ्यर्थी जांच के दायरे में हैं, जिन्हें नोटिस जारी किया गया है।
सुप्रीम कोर्ट के चर्चित वंशिका यादव और सचिन कुमार मामलों की नजीर पेश करते हुए सरकार ने स्पष्ट किया कि जब पूरी प्रक्रिया दूषित हो जाए, तो व्यक्तिगत कारण बताओ नोटिस देना जरूरी नहीं होता। 27 नवंबर 2025 को जारी नियुक्ति पत्र किसी भी अभ्यर्थी को अवैध प्रक्रिया के तहत पद पर बने रहने का असीमित अधिकार नहीं देता।
What Next: अब आगे क्या?
हाई कोर्ट में सरकार के इस कड़े रुख के बाद अब गेंद न्यायपालिका के पाले में है। जहां याचिकाकर्ता व्यक्तिगत सुनवाई की मांग कर रहे हैं, वहीं सरकार ने साफ कर दिया है कि नए सिरे से, पूरी पारदर्शिता के साथ परीक्षा आयोजित कराना ही लाखों ईमानदार युवाओं के भविष्य को सुरक्षित करने का एकमात्र रास्ता है।











