Ranchi | झारखंड में सूचना के अधिकार को लेकर सियासी पारा अचानक चढ़ गया है। राज्य सूचना आयोग में मुख्य सूचना आयुक्त की नियुक्ति लटकने से हजारों अपीलों पर ताला लगा है।
नेता प्रतिपक्ष बाबूलाल मरांडी ने मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन को बेहद सख्त पत्र लिखा है। मरांडी ने सीधे पूछा कि क्या अब मुख्यमंत्री के वादे पर भी भरोसा न किया जाए?
इस चिट्ठी के सामने आते ही प्रशासनिक गलियारों से लेकर राजनीतिक हलकों में हलचल तेज हो गई है। आम जनता के अधिकारों से जुड़ा यह मामला अब सीधे सीएम बनाम नेता प्रतिपक्ष बन चुका है।
चयन समिति की बैठक के बाद भी क्यों अटका मामला?
पूरा विवाद राज्य सूचना आयोग को पूरी तरह कार्यशील बनाने से जुड़ा है। कुछ समय पहले मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन की अध्यक्षता में चयन समिति की अहम बैठक हुई थी। इस बैठक में नेता प्रतिपक्ष बाबूलाल मरांडी और मंत्री हफीजुल हसन भी शामिल थे।
मरांडी का कहना है कि उस बैठक में सूचना आयुक्तों के नामों पर सहमति बनी थी। उसी दौरान उन्होंने मुख्य सूचना आयुक्त के पद को लेकर स्थिति साफ करने को कहा था। सीएम ने भरोसा दिया था कि यह अहम पद भी बिना किसी देरी के जल्द भर दिया जाएगा।
’अगर पता होता तो हस्ताक्षर ही नहीं करता’
मरांडी ने पत्र में अपनी नाराजगी खुलकर जाहिर की है। उन्होंने लिखा कि मुख्यमंत्री के उसी भरोसे के आधार पर उन्होंने नियुक्ति अनुशंसा पर दस्तखत किए थे।
”यदि मुझे पहले यह पता होता कि मुख्य सूचना आयुक्त की नियुक्ति इस तरह लटका कर रखी जाएगी और आयोग का काम शुरू नहीं होगा, तो मैं उस समय हस्ताक्षर ही नहीं करता।”
— बाबूलाल मरांडी, नेता प्रतिपक्ष
मरांडी ने सवाल दागा कि जनता के बीच उनके जैसे जनप्रतिनिधि अब क्या मुंह दिखाएं, जब सीएम का दिया आश्वासन ही फाइलों में दबा रह गया।
हाईकोर्ट के निर्देश के बाद भी जनता बेबस क्यों?
झारखंड हाईकोर्ट में चली जनहित याचिका का हवाला देते हुए मरांडी ने सरकार को घेरा है। अदालत में राज्य सरकार ने भरोसा दिलाया था कि नियुक्ति प्रक्रिया जल्द पूरी कर ली जाएगी, जिसके बाद याचिका निष्पादित हुई थी।
[झारखंड राज्य सूचना आयोग कार्यालय और फाइलों के अंबार की ग्राउंड तस्वीर यहाँ देखें]
मरांडी ने तल्ख लहजे में पूछा:
- क्या किसी नागरिक को अपने हक के लिए फिर से अदालत का दरवाजा खटखटाना पड़ेगा?
- लंबी न्यायिक प्रक्रिया के कारण होने वाली देरी का जिम्मेदार कौन होगा?
- जिस काम को सरकार खुद समय पर निपटा सकती है, उसके लिए जनता को बार-बार अदालतों के चक्कर क्यों काटने पड़ें?
बिना मुखिया ठप पड़ा आयोग: आम आदमी पर सीधा असर
आरटीआई (RTI) आम नागरिक को सरकारी सिस्टम से जवाबदेही मांगने की ताकत देता है। राज्य सूचना आयोग में मुख्य सूचना आयुक्त न होने से हजारों नागरिकों की द्वितीय अपील और शिकायतें धूल फांक रही हैं।
समय पर जानकारी न मिलने से सूचना का मूल उद्देश्य ही खत्म हो जाता है। भ्रष्टाचार, विकास योजनाओं की लेटलतीफी और प्रशासनिक गड़बड़ियों से जुड़े मामलों पर सुनवाई न होना सीधे तौर पर जनता के साथ अन्याय है।
अब आगे क्या: सरकार के सामने तीन बड़ी मांगें
नेता प्रतिपक्ष ने मुख्यमंत्री से औपचारिकता से आगे बढ़कर ठोस समयसीमा (Timeline) की मांग की है:
- तत्काल बैठक: मुख्य सूचना आयुक्त के चयन के लिए चयन समिति की बैठक फौरन बुलाई जाए।
- कामकाज की बहाली: राज्य सूचना आयोग में लंबित अपीलों और शिकायतों की दैनिक सुनवाई तुरंत शुरू हो।
- स्पष्ट समयसीमा: पूरी प्रक्रिया कब तक पूरी होगी, इसकी आधिकारिक तारीख सार्वजनिक की जाए।
अब सबकी नजरें प्रोजेक्ट भवन पर टिकी हैं कि मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन इस तीखे पत्र का क्या जवाब देते हैं और आयोग का ताला कब खुलता है।











