Ranchi | झारखंड कर्मचारी चयन आयोग (JSSC CGL) भर्ती को लेकर चल रहे विवाद के बीच अब चयनित अभ्यर्थियों ने मोर्चा खोल दिया है। पेपर लीक और घूसखोरी के आरोपों पर चुप्पी तोड़ते हुए ‘जेएसएससी सीजीएल न्याय मंच’ के बैनर तले सफल छात्रों ने रांची में प्रेस कॉन्फ्रेंस कर अपनी 10 साल की तपस्या और संघर्ष का कच्चा चिट्ठा सामने रखा।
JSSC cgl सफल अभ्यर्थियों ने साफ कहा कि 35-40 लाख रुपये देकर नौकरी खरीदने के आरोप पूरी तरह बेबुनियाद हैं। छात्रों का तर्क है कि अगर उनके पास इतने पैसे होते, तो वे सालों तक साइकिल चलाकर या रेलवे-आईटीबीपी की नौकरी के साथ 12-12 घंटे पढ़ाई का संघर्ष क्यों करते?
आक्रोशित अभ्यर्थियों ने सवाल उठाया कि जब 96 फीसदी स्थानीय और 600 से अधिक आदिवासी छात्र अपनी मेहनत से अफसर बने हैं, तो क्या ‘भीड़ तंत्र’ के दबाव में पूरी भर्ती रद्द करना सही है? उन्होंने मांग की कि सड़े हुए आलुओं को छांटकर निकाला जाए, न कि पूरी बोरी को ही फेंक दिया जाए।
’35 लाख होते तो मजदूरी क्यों करते?’: ग्राउंड से छलका अभ्यर्थियों का दर्द
प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान पश्चिमी सिंहभूम के रहने वाले और वर्तमान में सहकारिता विभाग में सहायक प्रशाखा पदाधिकारी (ASO) के पद पर चयनित चंद्र हेंब्रम भावुक हो गए। अपनी ओएमआर शीट मीडिया के सामने लहराते हुए उन्होंने कहा, “जब मैं 10 साल का था, तभी पिता का साया सिर से उठ गया था। चाईबासा 20 किलोमीटर साइकिल चलाकर पढ़ने जाता था। आईटीबीपी की पक्की नौकरी से इस्तीफा देकर यहां आया हूं। क्या मुझ जैसे गरीब आदिवासी के पास 35 लाख रुपये होंगे?”
चंद्र ने भर्ती आंकड़ों का हवाला देते हुए बताया कि एसटी वर्ग का कटऑफ महज 33 फीसदी (152 अंक) गया है। जब कटऑफ इतना नॉमिनल है, तो फिर पेपर लीक का झूठा नैरेटिव क्यों गढ़ा जा रहा है? उन्होंने कहा कि पेपर-3 में उनके 35 सवाल गलत हुए थे; अगर उनके पास पहले से उत्तर होते तो क्या वे इतनी गलतियां करते?
भीड़ तंत्र बनाम न्यायपालिका: जांच से परहेज नहीं, लेकिन सेग्रिगेशन हो
सफल अभ्यर्थियों का सीधा आरोप है कि सड़क पर उतरने वाले लाखों असफल छात्रों और कुछ राजनीतिक दलों के दबाव में सरकार से पूरी प्रक्रिया रद्द कराने की साजिश रची जा रही है। दिव्यांग कोटे से चयनित अनिल रजक ने कहा, “शरीर का कोई अंग खराब हो जाए तो उसे काटते हैं, पूरे इंसान को नहीं मारते। अगर पानी में जहर की बात है, तो जहर को अलग कीजिए, पूरा पानी मत फेंकिए।”
अभ्यर्थियों ने स्पष्ट किया कि वे सीआईडी या किसी भी स्वतंत्र एजेंसी की जांच का 24 घंटे सामना करने को तैयार हैं। हाईकोर्ट से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक लंबी कानूनी लड़ाई लड़कर उन्होंने नियुक्ति हासिल की है। अगर जांच में कोई दोषी पाया जाता है तो उसे कड़ी सजा दी जाए, लेकिन निर्दोष छात्रों का करियर दांव पर न लगाया जाए।
महिला अभ्यर्थियों की व्यथा: सोशल मीडिया पर चरित्र हनन
महिला एवं बाल विकास विभाग में चयनित निरोध खेस ने बताया कि रेलवे ग्रुप डी की नौकरी के साथ समय निकाल-निकाल कर उन्होंने तैयारी की। उन्होंने कहा, “सफल होने के बाद सोशल मीडिया पर हमें बुरी तरह ट्रोल किया जा रहा है और अभद्र टिप्पणियां की जा रही हैं। पुलिस प्रशासन को ऐसे तत्वों पर कड़ा एक्शन लेना चाहिए। हमारी मेहनत को क्यों नकारा जा रहा है?”
प्रशासन का अगला कदम: सेग्रिगेशन या पूरी भर्ती पर तलवार?
झारखंड सरकार और कार्मिक विभाग के सामने अब सबसे बड़ी चुनौती ‘दूध का दूध और पानी का पानी’ करने की है। कानूनी जानकारों का मानना है कि सुप्रीम कोर्ट के पूर्व फैसलों के मुताबिक अगर दागियों और बेदागों को अलग (सेग्रिगेशन) करना मुमकिन है, तो पूरी भर्ती रद्द करना न्यायसंगत नहीं होगा। अब नजरें जांच एजेंसी की अंतिम रिपोर्ट और सरकार के फैसले पर टिकी हैं कि क्या तंत्र भीड़ के दबाव में झुकेगा या 10 साल संघर्ष करने वाले इन युवाओं के साथ न्याय होगा।











