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झारखंड में घटेगी आदिवासियों की सीटें? रांची में फूटा गुस्सा

Ranchi | झारखंड की राजधानी रांची में रविवार को हजारों आदिवासियों का हुजूम सड़कों पर उतर आया। नए परिसीमन (Delimitation) के बाद लोकसभा और विधानसभा में जनजातीय समुदाय के लिए आरक्षित सीटें घटने की आशंका को लेकर समाज में भारी आक्रोश देखा जा रहा है।

विभिन्न आदिवासी संगठनों द्वारा आयोजित ‘आदिवासी एकता महाजुटान रैली’ में केंद्र सरकार की नीतियों के खिलाफ सीधा मोर्चा खोल दिया गया। सरना धर्म कोड, परिसीमन और MMDR संशोधन बिल 2026 को लेकर नेताओं ने आर-पार की लड़ाई का ऐलान किया है।

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इस विशाल महाजुटान में राज्य के कई प्रमुख नेता, मंत्री और पड़ोसी राज्यों के जनप्रतिनिधि शामिल हुए। मंच से साफ संदेश दिया गया कि यदि झारखंड में आदिवासियों के राजनीतिक और संवैधानिक अधिकारों पर चोट की गई, तो यह आंदोलन सड़क से सदन तक फैलेगा।

'झारखंड को नागपुर नहीं बनने देंगे': बंधु तिर्की की केंद्र को दो टूक

‘झारखंड को नागपुर नहीं बनने देंगे’: बंधु तिर्की की केंद्र को दो टूक

रैली के संयोजक और पूर्व मंत्री बंधु तिर्की ने केंद्र की भाजपा सरकार और आरएसएस पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि कुछ ताकतें झारखंड की मूल पहचान को मिटाकर इसे नागपुर के इशारों पर चलाना चाहती हैं।

“यह भगवान बिरसा मुंडा की पावन धरती है। अगर यहां आदिवासियों का हक-अधिकार छीना गया, तो हम चुप नहीं बैठेंगे। आंख खोलकर देख लें, यह केवल ‘ईसाई आदिवासियों’ की नहीं, बल्कि समूचे आदिवासी समाज की एकजुट आवाज है। अगर परिसीमन में हमारी सीटें घटाई गईं, तो भाजपा की ईंट से ईंट बजा देंगे।” — बंधु तिर्की, पूर्व मंत्री एवं संयोजक

तिर्की ने जोर देकर कहा कि केंद्र सरकार को आगामी जनगणना में अलग सरना धर्म कोड देना ही होगा और विवादित MMDR संशोधन बिल 2026 को तत्काल वापस लेना होगा।

परिसीमन पर सियासी घमासान: “कम नहीं, 50% बढ़नी चाहिए सीटें”

रैली में मौजूद कांग्रेस विधायक दल के उपनेता राजेश कच्छप ने परिसीमन के तकनीकी और सियासी खतरों को रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि परिसीमन के नाम पर आदिवासियों का प्रतिनिधित्व घटाने की साजिश रची जा रही है।

  • 1951 के आधार पर मांग: कच्छप ने चुनौती दी कि सरकार 1951 की जनगणना के आधार पर परिसीमन करके दिखाए।
  • समानुपातिक बढ़ोतरी: “यदि अन्य वर्गों के लिए 50% सीटें बढ़ाने की तैयारी है, तो जनजातीय आरक्षित सीटों में भी उसी अनुपात में 50% का इजाफा होना चाहिए।”
  • मूल निवासी का दर्जा: उन्होंने राहुल गांधी के रुख को दोहराते हुए कहा कि देश का पहला नागरिक और मूल निवासी केवल आदिवासी है।

राष्ट्रीय नेताओं की हुंकार: “यह नए उलगुलान की शुरुआत”

मध्य प्रदेश के झाबुआ से विधायक और आदिवासी कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष विक्रांत भूरिया ने मंच से कहा कि यह लड़ाई केवल एक राज्य की नहीं बल्कि पूरे देश के आदिवासियों की अस्मिता की है।

“भाजपा हमें ‘आदिवासी’ की जगह ‘वनवासी’ कहकर हमारी ऐतिहासिक पहचान को सीमित करना चाहती है। केंद्र सरकार हमारी राजनीतिक ताकत को कमजोर करने पर तुली है, लेकिन जनजातीय समुदाय अब पीछे नहीं हटेगा। यह हमारे हक का उलगुलान है।” — विक्रांत भूरिया, राष्ट्रीय अध्यक्ष, आदिवासी कांग्रेस

राष्ट्रीय नेताओं की हुंकार: "यह नए उलगुलान की शुरुआत"

असम का उदाहरण और 2007 का इतिहास

मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के प्रतिनिधि के रूप में पहुंचे झामुमो विधायक विकास सिंह मुंडा ने इतिहास का हवाला देते हुए समाज को सतर्क किया।

  • 2007 का आंदोलन: मुंडा ने याद दिलाया कि 2007 में भी एकजुटता के बल पर झारखंड में परिसीमन को रोका गया था, जिससे आदिवासियों का आरक्षण सुरक्षित रहा।
  • असम से सीख: उन्होंने चेतावनी दी कि हाल ही में असम में हुए परिसीमन के कारण वहां के मूल जनजातीय समाज को भारी राजनीतिक नुकसान उठाना पड़ा है।
  • वर्तमान स्थिति: झारखंड में वर्तमान में 28 विधानसभा सीटें अनुसूचित जनजाति (ST) के लिए आरक्षित हैं, जिन्हें घटाने के बजाय बढ़ाने की मांग तेज हो गई है।

कृषि मंत्री नेहा शिल्पी तिर्की और कांग्रेस सांसद कालीचरण मुंडा ने भी साफ किया कि जल, जंगल और जमीन के अधिकार की रक्षा के लिए सभी संगठनों को एक मंच पर आना होगा।

आगे क्या: टकराव या समाधान?

रांची का यह महाजुटान केवल एक रैली भर नहीं, बल्कि आने वाले दिनों में केंद्र और राज्य के बीच बड़े सियासी व सामाजिक टकराव का संकेत है। आदिवासी समाज ने स्पष्ट कर दिया है कि जब तक सरना कोड और परिसीमन सुरक्षा पर ठोस आश्वासन नहीं मिलता, आंदोलन का दायरा पूरे पूर्वी भारत में बढ़ाया जाएगा। अब निगाहें केंद्र सरकार और चुनाव आयोग के अगले कदम पर टिकी हैं।

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Subhash Shekhar

सुभाष शेखर पिछले दो दशकों से अधिक समय से पत्रकारिता जगत में सक्रिय हैं। साल 2003 में बुंडू (झारखंड) की जमीनी समस्याओं को आवाज देने से शुरू हुआ उनका सफर आज 'Local Khabar' के माध्यम से डिजिटल पत्रकारिता के नए आयाम स्थापित कर रहा है। प्रभात खबर, ताजा टीवी, नक्षत्र न्यूज और राष्ट्रीय खबर जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों में संपादकीय और ग्राउंड रिपोर्टिंग का अनुभव रखने वाले सुभाष, आज के दौर के उन गिने-चुने पत्रकारों में से हैं जो खबर की बारीकियों के साथ-साथ वेब डिजाइनिंग और SEO जैसी तकनीकी विधाओं में भी महारत रखते हैं। वे वर्तमान में Local Khabar के संस्थापक और संपादक के रूप में झारखंड की जनपक्षीय खबरों का नेतृत्व कर रहे हैं।

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