Ranchi। झारखंड की राजधानी रांची के हृदय स्थल में जब ‘पचड़ी’ का स्वाद घुला और मंत्रों की गूंज सुनाई दी, तो लगा ही नहीं कि यह उत्तर भारत का कोई शहर है। मौका था तेलुगु नव वर्ष ‘उगादी’ का, जिसे रांची में रहने वाले आंध्र प्रदेश के परिवारों ने कुछ इस अंदाज में मनाया कि पुरानी विधानसभा की गलियां दक्षिण भारतीय रंग में सराबोर हो गईं। ‘तेलुगु कम्युनिटी वेलफेयर एसोसिएशन’ (TCWA) द्वारा आयोजित इस मिलन समारोह ने साबित कर दिया कि भाषाएं और दूरियां दिल के रिश्तों के आगे छोटी पड़ जाती हैं।
छह स्वादों का संगम और नई शुरुआत
रांची के सेक्टर 2 स्थित ‘वेदिका बैंक्वेट हॉल’ में सुबह से ही उत्सव का माहौल था। आंध्र प्रदेश के विभिन्न कोनों से आकर रांची में बसे लगभग 32 परिवारों के 125 से अधिक सदस्य जब पारंपरिक परिधानों में जुटे, तो नजारा अद्भुत था। कार्यक्रम की शुरुआत मुख्य अतिथि श्री के.के. राव (रजिस्ट्रार, केंद्रीय विश्वविद्यालय) ने दीप प्रज्वलित कर की। उनके साथ मंच पर शिक्षा और तकनीक जगत की दिग्गज हस्तियां डॉ. एन. हरि बाबू और डॉ. वी.एस.एन. पिनाकापानी भी मौजूद रहीं, जिन्होंने समाज को एकजुट रहने का संदेश दिया।
क्यों खास है रांची का यह ‘उगादी’ उत्सव?
1. अपनी जड़ों से जुड़ाव की तीसरी वर्षगांठ
TCWA रांची के लिए यह साल सिर्फ त्योहार का नहीं, बल्कि उनकी मेहनत की जीत का भी है। एसोसिएशन अपनी तीसरी वर्षगांठ मना रहा है। पिछले दो वर्षों से लगातार यह संगठन रांची में बिखरे हुए तेलुगु भाषियों को एक छत के नीचे लाने का काम कर रहा है।
2. ‘उगादी पचड़ी’: जीवन के उतार-चढ़ाव का संदेश
कार्यक्रम में सबसे खास रहा पारंपरिक ‘उगादी पचड़ी’ का वितरण। गुड़, इमली, नीम के फूल, कच्चा आम, नमक और मिर्च से बनी यह डिश जीवन के छह अनुभवों—खुशी, गम, गुस्सा, डर, घृणा और आश्चर्य—का प्रतीक है। रांची की ठंडी हवाओं के बीच इस चटपटे स्वाद ने लोगों को अपनी जन्मभूमि की याद दिला दी।
3. सांस्कृतिक कार्यक्रमों ने बांधा समां
सुबह से शाम तक चले इस कार्यक्रम में बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक ने अपनी प्रतिभा दिखाई। जहां नन्हे बच्चों ने फिल्मी और लोक गीतों पर नृत्य किया, वहीं महिलाओं ने पारंपरिक गीतों के जरिए अपनी संस्कृति को जीवंत रखा। पारिवारिक खेल और सामाजिक मेलजोल ने माहौल को और भी खुशनुमा बना दिया।

राजधानी में बढ़ता दक्षिण भारतीय प्रभाव
रांची अब केवल एक प्रशासनिक केंद्र नहीं, बल्कि सांस्कृतिक विविधता का ‘मेल्टिंग पॉट’ बनता जा रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि केंद्रीय संस्थानों (जैसे CUJ, MECON, RTC) में दक्षिण भारतीय विशेषज्ञों की मौजूदगी ने रांची की कार्यसंस्कृति और सामाजिक ताने-बाने को और समृद्ध किया है।
“हम भले ही आंध्र से सैकड़ों मील दूर हैं, लेकिन रांची ने हमें जो अपनापन दिया है और TCWA ने जो मंच प्रदान किया है, उससे कभी घर की कमी महसूस नहीं होती।” — कार्यक्रम में शामिल एक प्रतिभागी।
आगे क्या? प्रशासन और समाज की भूमिका
इस तरह के आयोजन केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि ‘एक भारत श्रेष्ठ भारत’ की जीवंत मिसाल हैं। TCWA की कोर कमेटी अब आने वाले समय में भाषा शिक्षण और सामाजिक कल्याण के और भी बड़े प्रोजेक्ट्स पर काम करने की योजना बना रही है। प्रशासन के लिए भी यह एक संकेत है कि शहर में बढ़ती इस विविधता के लिए सांस्कृतिक केंद्रों की आवश्यकता और बढ़ गई है।









