Ranchi | झारखंड के चर्चित रांची-रामगढ़ शराब प्रकरण में पुलिस चार्जशीट दाखिल होने के बावजूद उत्पाद विभाग की चुप्पी ने पूरे महकमे में हलचल मचा दी है। 170 पेटी अवैध शराब की जब्ती और अदालती प्रक्रिया के 7 माह बाद भी मुख्य लाइसेंस पर कोई ठोस एक्शन नहीं हुआ।
कार्रवाई के अभाव में आरोपी लाइसेंसधारी की शराब दुकान आज भी धड़ल्ले से चल रही है। इस ढुलमुल रवैये के खिलाफ झारखंड शराब व्यापारी संघ ने मोर्चा खोलते हुए निष्पक्ष एवं उच्चस्तरीय जांच की सीधी मांग रखी है।
यह मामला केवल नियमों के उल्लंघन का नहीं, बल्कि राज्य के आबकारी तंत्र और सिंडिकेट की सांठगांठ पर सीधे प्रहार करता दिख रहा है।
170 पेटी शराब का रूट डायवर्जन: रांची से चली, रामगढ़ में पकड़ी गई
मामले की जड़ें 23 मार्च 2026 की उस जब्ती से जुड़ी हैं, जिसने आबकारी महकमे के सिस्टम की पोल खोलकर रख दी। पुलिस रिकॉर्ड और वाद संख्या 484/2026 की जब्ती सूची के अनुसार, कॉम्पोजिट लाइसेंस संख्या 080-COM-RANCHI-25-26 के तहत 170 पेटी शराब उठाई गई थी।
यह खेप जेएसबीसीएल (JSBCL) के पिस्का, नगड़ी डिपो से रांची के हरमू रोड स्थित ‘मुक्तिधाम वाइन शॉप’ के लिए रवाना हुई थी। हैरान करने वाली बात यह रही कि शराब तय दुकान पर पहुंचने के बजाय सीमा पार रामगढ़ जिले में जाकर बरामद हुई।
सवाल सीधा है: सरकारी डिपो से निकली शराब बीच रास्ते से कैसे गायब होकर दूसरे जिले में पहुंच गई और अब तक इसकी जवाबदेही क्यों तय नहीं हुई?
चार्जशीट के बाद भी दुकान खुली, संघ ने खड़े किए तीखे सवाल
रामगढ़ पुलिस इस पूरे मामले में आवश्यक साक्ष्य और कागजात सक्षम न्यायालय में प्रस्तुत कर चुकी है। इसके बावजूद मुक्तिधाम शराब दुकान के लाइसेंसधारी गुलशन कुमार के विरुद्ध लाइसेंस निरस्तीकरण या विभागीय स्तर पर कोई दंडात्मक कदम नहीं उठाया गया।
झारखंड शराब व्यापारी संघ ने विभागीय संवेदनहीनता पर कई तीखे सवाल दागे हैं:
- यदि तय रूट से भटकी शराब रामगढ़ में पकड़ी गई, तो 7 महीने बाद भी लाइसेंस निरस्त क्यों नहीं हुआ?
- पुलिस द्वारा चार्जशीट जमा करने के बाद भी उत्पाद विभाग की जांच किस स्तर पर अटकी है?
- क्या इस अवैध परिवहन में संलिप्त आबकारी अधिकारियों या डिपो कर्मचारियों की भूमिका जांची गई?
- यदि कोई आंतरिक कार्रवाई हुई है, तो विभाग उसे सार्वजनिक करने से क्यों बच रहा है?
ग्राउंड रिपोर्ट: ‘दोष तय अदालत करे, पर विभाग स्थिति साफ करे’
व्यापारी संघ के महासचिव सुबोध कुमार जायसवाल ने मामले में प्रशासनिक मिलीभगत की आशंका जताते हुए कड़ा रुख अपनाया है। उन्होंने साफ किया कि संघ ने 10 जुलाई 2026 को ही उत्पाद मंत्री और उत्पाद आयुक्त को एफआईआर व जब्ती सूची सहित समस्त साक्ष्य सौंप दिए थे।
सुबोध कुमार जायसवाल के अनुसार:
“संघ किसी व्यक्ति को पहले से दोषी करार नहीं दे रहा; दोष का अंतिम फैसला सक्षम न्यायालय ही करेगा। लेकिन जब्ती सूची, परिवहन परमिट और पुलिस चार्जशीट के पुख्ता प्रमाण सामने होने के बाद भी विभाग का मौन रहना दाल में कुछ काला होने का संकेत देता है। यदि लाइसेंस रद्द नहीं हुआ, तो उसके वैध कारण जनता के सामने आने चाहिए।”
उन्होंने दो टूक चेतावनी दी कि अवैध परिवहन पर आंखें मूंदने से वैध व ईमानदार कारोबारियों का मनोबल टूटता है और राजस्व को सीधा चूना लगता है।
क्या सख्त एक्शन होगा या फाइलों में दबेगा मामला?
इस खुलासे के बाद गेंद अब सीधे उत्पाद विभाग और राज्य सरकार के पाले में है। यदि तय डिपो से निकली शराब दूसरे जिले में बिकने के लिए भेजी जा सकती है और कार्रवाई महीनों तक लटक सकती है, तो यह आबकारी निगरानी तंत्र के पूरी तरह फेल होने का सबूत है। अब देखना यह होगा कि क्या शासन इस मामले में विशेष जांच दल (SIT) गठित कर लाइसेंस रद्द करता है या फिर यह जांच भी पुरानी फाइलों की धूल फांकती रहेगी।












