Ranchi | डॉक्टरों को अक्सर भगवान का दर्जा दिया जाता है, लेकिन जब इलाज के दौरान किसी मरीज की मौत हो जाए और उस पर सवाल उठने लगें, तो सच्चाई और आरोपों के बीच की रेखा धुंधली हो जाती है। रांची के हरमू स्थित Berlin Hospital में 2 जनवरी 2026 को कुछ ऐसा ही देखने को मिला, जब एक मरीज की मौत के बाद अस्पताल परिसर में भारी हंगामा खड़ा हो गया।
इलाज के दौरान मरीज की मौत, परिजनों का फूटा गुस्सा
धनबाद की रहने वाली चंद्रमणि देवी को गंभीर हालत में बर्लिन हॉस्पिटल में भर्ती कराया गया था। इलाज के दौरान उनकी मौत हो गई। जैसे ही यह खबर परिजनों तक पहुंची, उन्होंने अस्पताल प्रबंधन पर गंभीर लापरवाही के आरोप लगाए। परिजनों का दावा है कि मरीज की मौत पहले ही हो चुकी थी, लेकिन इसके बावजूद डॉक्टर इलाज जारी रखने का दिखावा करते रहे।
अस्पताल परिसर में तनाव, पुलिस को बुलाना पड़ा
मौत के बाद अस्पताल परिसर में करीब एक घंटे तक तनावपूर्ण माहौल बना रहा। आक्रोशित परिजनों ने नारेबाजी की, जिसके बाद स्थिति को संभालने के लिए पुलिस को मौके पर बुलाया गया। हालात इतने बिगड़ गए कि अस्पताल की सुरक्षा व्यवस्था भी सवालों के घेरे में आ गई।
परिजनों के आरोप: मिलने नहीं दिया गया, सच छिपाया गया
परिजनों का यह भी कहना है कि उन्हें लगातार दो से तीन दिन तक मरीज से मिलने नहीं दिया गया। आरोप है कि अस्पताल स्टाफ ने सच्चाई छिपाई और मरीज की वास्तविक स्थिति की जानकारी नहीं दी। उनका दावा है कि जब मरीज जीवित नहीं था, तब भी उन्हें भरोसा दिलाया जाता रहा कि हालत स्थिर है।
अस्पताल प्रबंधन का पक्ष: सभी आरोप बेबुनियाद
अस्पताल प्रबंधन ने परिजनों के सभी आरोपों को सिरे से खारिज किया है। अस्पताल के डॉ सूरज ने बताया कि मरीज को सीवियर ब्रेन ब्लीड था, जो एक बेहद जानलेवा स्थिति होती है। मेडिकल विशेषज्ञों के अनुसार, ऐसे मामलों में बचने की संभावना बेहद कम रहती है।
डॉक्टरों ने बताया कि मरीज को भर्ती करते समय ही परिजनों को स्पष्ट कर दिया गया था कि स्थिति गंभीर है और तुरंत सर्जरी की जरूरत है। सर्जरी के बाद मरीज की हालत में कुछ समय के लिए सुधार भी हुआ था, लेकिन बाद में ब्लड प्रेशर और ऑक्सीजन लेवल गिरने लगा, जिससे स्थिति बिगड़ती चली गई।
सीसीटीवी फुटेज और मेडिकल रिकॉर्ड का दावा
अस्पताल प्रबंधन का कहना है कि आईसीयू गेट पर सीसीटीवी कैमरे लगे हैं, जिनमें परिजनों के आने-जाने का पूरा रिकॉर्ड मौजूद है। बर्लिन जनरल हॉस्पिटल के प्रबंधक का दावा है कि यह कहना गलत है कि मरीज से मिलने नहीं दिया गया। साथ ही, मरीज से जुड़ा हर अपडेट मेडिकल फाइल में दर्ज किया गया है।
पोस्टमार्टम की पेशकश, परिजनों ने नहीं दी सहमति
अस्पताल की ओर से यह भी कहा गया कि यदि परिजन चाहें तो पोस्टमार्टम कराया जा सकता है, ताकि मौत के कारणों पर कोई संदेह न रहे। हालांकि, परिजनों ने पोस्टमार्टम कराने से इनकार कर दिया और शव को एंबुलेंस के जरिए घर ले जाने की मांग की, जिसे अस्पताल ने पूरा किया।
इलाज का खर्च और पैकेज पर सफाई
डॉक्टरों ने यह भी स्पष्ट किया कि न्यूरो से जुड़े मामलों के लिए अस्पताल में एक तय पैकेज सिस्टम है। उनके अनुसार, इलाज के नाम पर अनावश्यक वसूली का आरोप पूरी तरह गलत है। मरीज के इलाज पर अपेक्षाकृत कम खर्च आया, जो रांची के अन्य बड़े अस्पतालों की तुलना में काफी कम बताया गया।
असली सवाल: चूक या मेडिकल साइंस की सीमा?
अब सबसे बड़ा सवाल यही है—क्या वाकई इलाज में कोई लापरवाही हुई, या फिर मरीज की बीमारी इतनी गंभीर थी कि मेडिकल साइंस भी बेबस हो गई? परिजनों का गुस्सा और अस्पताल का बचाव, दोनों अपनी-अपनी जगह मजबूत दलीलें पेश कर रहे हैं।
यह मामला न सिर्फ एक अस्पताल या एक परिवार तक सीमित है, बल्कि पूरे स्वास्थ्य तंत्र पर भरोसे और पारदर्शिता को लेकर बड़ा सवाल खड़ा करता है। सच क्या है, यह जांच का विषय हो सकता है, लेकिन ऐसी घटनाएं यह जरूर सोचने पर मजबूर करती हैं कि मरीज और परिजनों के साथ संवाद कितना अहम है।
आपकी राय क्या है?
क्या अस्पताल का पक्ष सही लगता है या परिजनों का आक्रोश जायज है? अपनी राय जरूर साझा करें।









