रांची। जेपीएससी मेधा घोटाला मामले में सीआईडी की जांच अब मिजोरम की राजधानी आइजोल तक जुड़े कथित लेनदेन की कड़ियां सामने ला रही है। जांच एजेंसी का दावा है कि 25 दिसंबर 2025 को तीन आरोपित तत्कालीन अध्यक्ष एल. खियांग्ते के आवास पहुंचे और उनकी पत्नी को ढाई लाख रुपये नकद दिए।
जांच में पहले से ब्लैकलिस्ट बताई गई एजेंसी बिंसिस टेक्नोलोजी को परीक्षा संचालन का काम दिलाने का आरोप भी सामने आया है। इसमें आयोग की तत्कालीन सदस्य डॉ. अजिता भट्टाचार्य के निजी सहायक ब्रज कुमार राम की भूमिका की जांच हो रही है।
यात्रा टिकट, मोबाइल की फोरेंसिक जांच, कॉल डिटेल रिकॉर्ड और व्हाट्सऐप चैट इस मामले की अहम कड़ियां हैं। सीआईडी ने ब्रज की जमानत याचिका का विरोध करते हुए अदालत को जांच में मिले तथ्यों से अवगत कराया है। ये जांच एजेंसी के आरोप हैं; दोष का अंतिम निर्धारण अदालत करेगी।
जेपीएससी मेधा घोटाला: आइजोल यात्रा में क्या मिला?
उपलब्ध जांच विवरण के अनुसार, ब्रज कुमार राम 25 दिसंबर 2025 को बिंसिस टेक्नोलोजी के निदेशक अरुण कुमार उर्फ अरुण शर्मा और सानंद प्रकाश के साथ आइजोल गया था।
सीआईडी का दावा है कि तीनों को एल. खियांग्ते से मिलना था। उनके आवास पर मौजूद नहीं होने के कारण आरोपितों की मुलाकात उनकी पत्नी से हुई। जांच एजेंसी ने इसी दौरान ढाई लाख रुपये नकद देने का आरोप लगाया है।
यात्रा टिकट और चैट क्यों अहम हैं?
सीआईडी को आरोपितों की यात्रा से जुड़े टिकट और डिजिटल साक्ष्य मिलने की जानकारी सामने आई है। मोबाइल से मिली व्हाट्सऐप बातचीत को भी जांच एजेंसी कथित लेनदेन से जोड़ रही है।
जांच के लिहाज से इन रिकॉर्ड की अहमियत अलग-अलग घटनाओं का क्रम समझने में है—कौन यात्रा पर गया, किन लोगों के संपर्क में रहा और बातचीत का कथित भुगतान से क्या संबंध था। हालांकि, यात्रा या संपर्क का रिकॉर्ड अपने आप में नकद भुगतान की पुष्टि नहीं करता; इन कड़ियों को अन्य साक्ष्यों के साथ परखना जरूरी है।
ब्लैकलिस्ट एजेंसी को परीक्षा का काम कैसे मिला?
जेपीएससी मेधा घोटाला की जांच में दूसरा बड़ा सवाल परीक्षा संचालन का जिम्मा देने की प्रक्रिया पर है। सीआईडी के अनुसार, ब्रज कुमार राम ने तत्कालीन अध्यक्ष के कंप्यूटर ऑपरेटर धर्मेंद्र कुमार के साथ मिलकर अरुण शर्मा को आयोग तक पहुंच बनाने में मदद की।
आरोप है कि इसके बाद अरुण की एजेंसी बिंसिस टेक्नोलोजी को परीक्षा संचालन का काम मिला, जबकि एजेंसी पहले से ब्लैकलिस्ट थी।
यह दावा एजेंसी चयन और उसकी पात्रता की जांच पर गंभीर सवाल उठाता है। यदि कोई एजेंसी पहले से प्रतिबंधित थी, तो उसे काम देने से पहले किन दस्तावेजों की जांच हुई और मंजूरी किस स्तर पर मिली? इन सवालों के जवाब संबंधित रिकॉर्ड से ही स्पष्ट होंगे।
कोचिंग के जरिए बना संपर्क
जांच विवरण के मुताबिक, ब्रज कुमार राम रांची में सिविल सेवा की तैयारी कराने वाली पतंजलि कोचिंग के माध्यम से अरुण शर्मा के संपर्क में आया था।
सीआईडी के अनुसार, पूछताछ में ब्रज ने बताया कि कोचिंग से जुड़े रवि कुमार ने अरुण से उसकी मुलाकात कराई थी। रवि और अरुण के बीच पहले से परिचय था।
यह जांच किसी कोचिंग के सभी विद्यार्थियों या कर्मचारियों पर आरोप नहीं लगाती। फिलहाल सामने आए विवरण में कुछ व्यक्तियों के संपर्क और उनकी कथित भूमिका का उल्लेख है।
मोबाइल जांच से किन संपर्कों की जानकारी मिली?
सीआईडी ने ब्रज के मोबाइल का कॉल डिटेल रिकॉर्ड निकाला और फोन की फोरेंसिक जांच कराई। उपलब्ध जानकारी के अनुसार, जांच एजेंसी को डिजिटल लेनदेन तथा आने-जाने से जुड़े साक्ष्य भी मिले हैं।
अदालत के समक्ष सीआईडी ने ब्रज को एक कथित नेटवर्क का हिस्सा बताया है। इसमें जेपीएससी की उप परीक्षा नियंत्रक श्वेता कुमारी गुप्ता, कंप्यूटर ऑपरेटर धर्मेंद्र कुमार और बिंसिस के निदेशक अरुण शर्मा के साथ उसके संपर्क का उल्लेख है।
जेपीएससी मेधा घोटाला मामले में इन संपर्कों की प्रकृति महत्वपूर्ण है। किस बातचीत का संबंध सामान्य कामकाज से था और किसका कथित अनियमितता से—इस अंतर को स्थापित करना जांच की प्रमुख चुनौती है।
छह सफल अभ्यर्थियों से संपर्क, जांच का नया सिरा
सीआईडी को 14वीं जेपीएससी की प्रारंभिक परीक्षा में सफल ऐसे छह अभ्यर्थियों की जानकारी मिली है, जिनसे ब्रज कुमार राम सीधे संपर्क में था।
यह तथ्य जांच को अभ्यर्थियों और संबंधित व्यक्तियों के बीच संबंधों की पड़ताल का आधार देता है। हालांकि, किसी आरोपित के संपर्क में होना मात्र किसी अभ्यर्थी की संलिप्तता या अनुचित लाभ का प्रमाण नहीं है।
जांच को यह स्पष्ट करना होगा कि संपर्क का उद्देश्य क्या था और क्या उसका परीक्षा प्रक्रिया या परिणाम से कोई संबंध था।
झारखंड के अभ्यर्थियों के लिए मामला क्यों अहम है?
प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी करने वाले युवाओं के लिए निष्पक्ष मूल्यांकन सबसे बुनियादी भरोसा है। परीक्षा संचालन में निजी पहुंच या कथित लेनदेन के आरोप सामने आने पर एजेंसी चयन, निगरानी और जवाबदेही की व्यवस्था पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
जेपीएससी मेधा घोटाला मामले का महत्व इसी भरोसे से जुड़ा है। अभ्यर्थियों के हित में जरूरी है कि जांच प्रमाणित अनियमितताओं और केवल संदेह के बीच स्पष्ट अंतर करे, ताकि जिम्मेदारी तय हो और निर्दोष उम्मीदवारों पर अनावश्यक आरोप न लगें।
जमानत पर अदालत का क्या फैसला आया?
दैनिक जागरण की 30 सितंबर की रिपोर्ट के अनुसार, अपर न्यायायुक्त प्रथम योगेश कुमार की अदालत ने ब्रज कुमार राम, टीएसआर के निदेशक रामबीर सिंह और आयोग से जुड़े कर्मचारी सोनू कुमार की जमानत याचिकाएं खारिज कर दीं।
रिपोर्ट के मुताबिक, अदालत ने केस डायरी, बयानों, कॉल रिकॉर्ड और डिजिटल साक्ष्यों के आधार पर प्रथम दृष्टया गंभीर आरोपों का उल्लेख किया। जमानत पर यह निर्णय मुकदमे का अंतिम फैसला नहीं है।
अब आगे किन सवालों के जवाब जरूरी हैं?
जेपीएससी मेधा घोटाला की जांच में अब कथित नकद भुगतान, एजेंसी को काम देने की प्रक्रिया और अभ्यर्थियों से संपर्क के बीच संबंध स्थापित करना महत्वपूर्ण होगा। यात्रा तथा मोबाइल रिकॉर्ड के साथ वित्तीय और प्रशासनिक दस्तावेजों का मिलान इन सवालों को स्पष्ट कर सकता है।
उपलब्ध इनपुट में एल. खियांग्ते, उनकी पत्नी, संबंधित एजेंसी और अन्य नामित व्यक्तियों का पक्ष शामिल नहीं है। उनकी प्रतिक्रिया मिलने पर खबर में उसे जोड़ना जरूरी होगा।
झारखंड के युवाओं के लिए सबसे बड़ा सवाल यही है: क्या जांच जिम्मेदार व्यक्तियों की भूमिका स्पष्ट करने के साथ परीक्षा व्यवस्था में उस कमजोरी की पहचान भी करेगी, जिसने कथित अनियमितताओं की गुंजाइश बनाई?












