झारखंड अपनी स्थापना के 25 वर्ष पूरे कर चुका है। एक ऐसा राज्य, जो अपार प्राकृतिक संसाधनों से भरा है — खनिज, वन संपदा और सांस्कृतिक विरासत — लेकिन विकास के रास्ते में आज भी कई सवाल अनुत्तरित हैं। राज्य में कई बार सत्ता बदली, कई मुख्यमंत्री आए और गए, परंतु मूल समस्याएं जस की तस हैं। हाल ही में एक बातचीत में वरिष्ठ नेता के.एन. त्रिपाठी ने झारखंड की अफसरशाही, बेरोजगारी, पलायन और सरकारी अक्षमता पर खुलकर बात की।
अफसरशाही का बोलबाला और सरकार की कमजोरी
त्रिपाठी का सबसे बड़ा आरोप यही था कि “झारखंड में अफसरशाही हावी है।” उनका कहना है कि रेड टेपिज्म (bureaucratic red-tapism) यानी सरकारी फाइलों में उलझी कार्यप्रणाली ने नेताओं की सोच और योजनाओं को लागू होने से रोक रखा है।
उन्होंने साफ कहा —
“अभी भी हम अफसरशाही पर नियंत्रण नहीं कर पाए हैं। अधिकारी मनमानी करते हैं और राजनीतिक नेतृत्व उन पर अंकुश नहीं लगा पा रहा।”
उनके अनुसार, मुख्यमंत्री भले ही मजबूत हों, लेकिन बाकी मंत्री शक्तिहीन हैं। कैबिनेट का लोकतांत्रिक संतुलन बिगड़ गया है और यही झारखंड सरकार की सबसे बड़ी कमजोरी है।
पलायन और बेरोजगारी – झारखंड का सबसे गहरा घाव
झारखंड के पास देश के सबसे समृद्ध खनिज संसाधन हैं, लेकिन त्रिपाठी का कहना है कि “राज्य का सबसे बड़ा निर्यात अब खनिज नहीं, मजदूर हैं।”
“आप देश के किसी भी कोने में चले जाइए, आपको वहां झारखंडी मजदूर मिलेंगे। लद्दाख के खारदुंगला पास पर भी मैंने गुमला और खूंटी के मजदूरों को काम करते देखा।”
लॉकडाउन के दौरान जब प्रवासी मजदूरों को राज्य लाया गया था, तब यह वादा किया गया था कि झारखंड में ही रोजगार दिया जाएगा। लेकिन त्रिपाठी मानते हैं कि वह वादा केवल कागजों तक सीमित रह गया।
मइया सम्मान योजना – वोट बैंक या कल्याणकारी योजना?
हेमंत सोरेन सरकार की ‘मइया सम्मान योजना’ पर भी त्रिपाठी ने सवाल उठाए। इस योजना के तहत महिलाओं को ₹1000 दिए जाते हैं। त्रिपाठी ने कहा कि यह योजना “कुछ वोट स्विंग कराने में तो सफल रही होगी, लेकिन इससे अन्य कल्याणकारी योजनाएं प्रभावित हुई हैं।”
उनका सुझाव था कि—
“इस योजना को रिव्यू करना चाहिए और इसे झारखंड स्टेट लाइवलीहुड प्रमोशन सोसाइटी जैसी योजनाओं से जोड़कर प्रोडक्टिव बनाया जाए। केवल पैसे बांटने से नहीं, काम दिलाने से महिलाओं को सशक्त किया जा सकता है।”
शिक्षा और स्वास्थ्य में सुधार की गुंजाइश
त्रिपाठी का मानना है कि झारखंड सरकार बीजेपी शासन की तुलना में बेहतर काम कर रही है, लेकिन “अभी भी बहुत सुधार की गुंजाइश है।”
“हमारी पार्टी के मंत्री हैं, लेकिन विभागों पर पूरा प्रशासनिक नियंत्रण नहीं है। अधिकारी मनमानी कर रहे हैं। स्वास्थ्य और शिक्षा विभाग में प्रशासनिक अनुशासन की जरूरत है।”
उन्होंने यह भी कहा कि किसी सरकार या व्यक्ति को तब तक संतुष्ट नहीं होना चाहिए जब तक जनता के काम पूरी तरह से न हों।
भ्रष्टाचार और अफसरों पर शिकंजा
त्रिपाठी ने बताया कि जब वे स्वयं मंत्री थे, उन्होंने नौ आईएएस अधिकारियों के खिलाफ कार्रवाई के लिए मुख्यमंत्री को लिखा था। उनका कहना था —
“हम पहले समझाते थे, फिर लिखित में पूछते थे। अगर अफसर फिर भी नहीं मानते, तो कार्रवाई की सिफारिश करते थे। लेकिन आज ऐसा सिस्टम नहीं दिखता।”
उन्होंने यह भी कहा कि राज्य में जितने आईएएस अधिकारी जेल में हैं, उतने किसी अन्य राज्य में नहीं — यह इस बात का संकेत है कि भ्रष्टाचार पर नियंत्रण की कमी है।
बीजेपी पर हमला, लेकिन आत्मस्वीकार भी
त्रिपाठी ने बीजेपी सरकार पर तानाशाही और भ्रष्टाचार का आरोप लगाते हुए कहा कि हेमंत सोरेन की सरकार, दरअसल “बीजेपी के गलत कार्यों का परिणाम है।”
उन्होंने कहा कि हेमंत सोरेन की गिरफ्तारी गैरकानूनी थी और जनता ने उसके जवाब में ही विधानसभा में उन्हें भारी बहुमत दिया।
लेकिन उन्होंने अपनी ही सरकार की कमियों को भी स्वीकार किया:
“हमारी सरकार रहते हुए भी सुधार की आवश्यकता है। हमें आत्ममंथन करना होगा।”
झारखंड का भविष्य – उत्सव से आगे बढ़ने की ज़रूरत
राज्य सरकार जहां झारखंड स्थापना दिवस को पांच दिवसीय उत्सव के रूप में मना रही है, वहीं त्रिपाठी का कहना है कि केवल उत्सव मनाने से राज्य नहीं बदलेगा।
“उत्सव मनाइए, लेकिन साथ ही सोचिए कि झारखंड के लिए और बेहतर क्या किया जा सकता है।”
झारखंड के 25 वर्ष पूरे हो गए हैं, लेकिन सवाल वही हैं — क्या अफसरशाही पर अंकुश लगेगा? क्या पलायन रुकेगा? क्या रोजगार और शिक्षा के अवसर बढ़ेंगे?
के.एन. त्रिपाठी के शब्दों में —
“हमारी सरकारें पहले से बेहतर काम कर रही हैं, लेकिन अब समय है कि केवल बातें नहीं, बल्कि धरातल पर ठोस बदलाव दिखे।”
क्या झारखंड 25 साल बाद अपने सपनों के मुकाम पर पहुंच पाया है या अब भी अफसरशाही की जंजीरों में जकड़ा है?
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