Ranchi | सुप्रीम कोर्ट में झारखंड के डीजीपी नियुक्ति मामले पर तीखी बहस के बाद राज्य का सियासी पारा अचानक चढ़ गया है। शीर्ष अदालत की सख्त टिप्पणियों के तुरंत बाद नेता प्रतिपक्ष बाबूलाल मरांडी ने राज्य की कार्यवाहक डीजीपी तदाशा मिश्रा से तत्काल पद छोड़ने की मांग कर दी है।
मरांडी ने सोशल मीडिया पर सीधा हमला बोलते हुए कहा कि अदालत के फैसले का इंतजार करने के बजाय डीजीपी को खुद इस्तीफा देकर अपनी वर्दी और राज्य की साख बचानी चाहिए। इस बयान के बाद पुलिस मुख्यालय से लेकर सत्ता के गलियारों तक हड़कंप मच गया है।
सुप्रीम कोर्ट में राज्य सरकार की दलीलों पर उठे सवालों का हवाला देते हुए मरांडी ने चेतावनी दी कि कुर्सी चंद दिनों की होती है, लेकिन बदनामी स्थायी रह जाती है।
सुप्रीम कोर्ट में फंसी सरकार, मरांडी बोले- भद्द पिटने से पहले छोड़ें पद
नेता प्रतिपक्ष ने नई दिल्ली में हुई सुनवाई का सीधा हवाला देते हुए कहा कि शीर्ष अदालत ने साफ कर दिया है कि डीजीपी की नियुक्ति सुप्रीम कोर्ट के तय दिशा-निर्देशों (प्रकाश सिंह बनाम भारत संघ) के तहत ही होगी। पीठ ने राज्य सरकार से पूछा है कि पुलिस अधिनियम के तहत नियम बनाने का उसका वैधानिक आधार क्या है।
मरांडी ने तंज कसते हुए कहा कि सरकार ने महंगे वकीलों की फौज खड़ी कर दी, लेकिन अदालत के तीखे सवालों का कोई ठोस जवाब नहीं दे सकी। उन्होंने कहा कि वकीलों की भारी-भरकम फीस भरने से कोई गैर-कानूनी फैसला वैध नहीं हो जाता।
“डीजीपी जी, अदालत अपना फैसला करेगी, लेकिन अपनी वर्दी, पद और सेवा-जीवन की गरिमा बचाने का फैसला आप आज भी ले सकती हैं। अनुराग गुप्ता का हश्र सबके सामने है। इतिहास में अपना नाम काले अक्षरों में दर्ज होने से बचाइए और स्वतः इस्तीफा दीजिए।”
— बाबूलाल मरांडी, नेता प्रतिपक्ष, झारखंड
कठपुतली बनने का आरोप: ‘फैसले ले रहा सीएम आवास का सिपाही’
इस राजनीतिक हमले में बाबूलाल मरांडी ने सिर्फ अदालती प्रक्रिया तक बात सीमित नहीं रखी, बल्कि पुलिस महकमे के भीतर चल रहे कथित पावर गेम पर भी सीधा प्रहार किया। उन्होंने आरोप लगाया कि डीजीपी की कुर्सी पर नाम भले ही तदाशा मिश्रा का हो, लेकिन पुलिस की असली कमान सत्ता के संरक्षण में बैठे एक जूनियर कर्मी के हाथ में है।
मरांडी ने दावा किया कि मुख्यमंत्री आवास में पदस्थापित एक पूर्व बाल आरक्षी (वर्तमान एएसआई) अजय सिंह ही राज्य के नीतिगत और प्रशासनिक फैसले तय कर रहा है। उन्होंने सवाल दागा कि एक वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी होने के बावजूद तदाशा मिश्रा इस तरह सत्ता की कठपुतली क्यों बनी हुई हैं?
झारखंड पुलिस महकमे में क्या होगा अगला कदम?
सुप्रीम कोर्ट में चल रही सुनवाई और विपक्ष के तीखे हमलों के बीच अब गेंद हेमंत सोरेन सरकार और खुद डीजीपी के पाले में है। कानूनी जानकारों के मुताबिक, यदि शीर्ष अदालत ने राज्य सरकार की बनाई नियमावली को दरकिनार किया, तो सरकार को यूपीएससी के पैनल से ही पूर्णकालिक डीजीपी की नियुक्ति करनी होगी।
प्रशासनिक गलियारों में चर्चा तेज है कि क्या डीजीपी तदाशा मिश्रा इस राजनीतिक दबाव के बीच कोई कड़ा कदम उठाएंगी, या फिर सरकार सुप्रीम कोर्ट में अगले हलफनामे के जरिए अपनी स्थिति स्पष्ट करने तक इंतजार करेगी।












