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मदरसा फर्जीवाड़ा: रिटायर्ड जज समेत 22 पर FIR

जामताड़ा | उत्तर प्रदेश के मुबारकपुर स्थित मदरसा जामिया नूरुल उलूम की आलिया स्तर की स्थायी मान्यता से जुड़े भूमि और भवन के अभिलेखों पर सवाल उठे हैं। कथित कूटरचना के मामले में 22 लोगों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज होने की जानकारी सामने आई है।

इस मदरसा मान्यता विवाद में जामताड़ा की स्थायी लोक अदालत के अध्यक्ष रिजवान अहमद का नाम भी शामिल है। उनका कहना है कि मदरसे की प्रबंध समिति में उनका नाम और पहचान संबंधी विवरण उनकी जानकारी के बिना इस्तेमाल किए गए।

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मामले का केंद्र 1997 का एक दान पत्र है। जांच में उसके भीतर दर्ज भूमि के स्थान को लेकर विसंगति बताई गई है। अब पुलिस को दस्तावेजों के साथ-साथ यह भी जांचना होगा कि प्रबंध समिति के रिकॉर्ड में नाम किस आधार पर दर्ज किए गए।

दान पत्र में क्या विसंगति मिली?

दी गई जानकारी के अनुसार, मदरसा शिक्षा परिषद की जांच में वर्ष 1998 में स्थायी मान्यता के लिए प्रस्तुत अभिलेखों की पड़ताल हुई। आरोप है कि मान्यता पाने के लिए कूटरचित दस्तावेज इस्तेमाल किए गए।

जांच में 20 जून 1997 के दान पत्र पर सवाल उठा। उसमें मदरसे की भूमि मोहम्मदाबाद गोहना तहसील में दर्शाई गई थी, जबकि संबंधित भूमि आजमगढ़ में बताई गई है। परिषद ने मदरसा प्रबंधन से मूल दान पत्र और इस अंतर पर स्पष्टीकरण मांगा।

प्रबंधन को अपना पक्ष रखने का अवसर देने के बाद, जवाब संतोषजनक नहीं पाए जाने पर रजिस्ट्रार ने जिला अल्पसंख्यक कल्याण अधिकारी को संबंधित लोगों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज कराने का निर्देश दिया।

दो अलग अवधियों की प्रबंध समितियों के नाम

उपलब्ध विवरण के मुताबिक, प्राथमिकी में 1998 और 2024–25 की प्रबंध समितियों से जुड़े लोगों को नामजद किया गया है। इनमें तत्कालीन पदाधिकारियों के साथ अध्यक्ष, प्रबंधक-सचिव, खजांची और ऑडिटर के रूप में दर्ज नाम शामिल हैं।

रिजवान अहमद का नाम दोनों अवधियों के समिति रिकॉर्ड में ऑडिटर के रूप में बताया गया है। प्राथमिकी में नाम दर्ज होना किसी व्यक्ति की संलिप्तता सिद्ध नहीं करता; प्रत्येक व्यक्ति की भूमिका और अभिलेखों की प्रामाणिकता जांच का विषय है।

रिजवान अहमद ने क्या कहा?

रिजवान अहमद के अनुसार, वह वर्ष 2002 से झारखंड न्यायिक सेवा में रहे हैं। सिमडेगा में जिला जज के पद से सेवानिवृत्त होने के बाद वह जामताड़ा में स्थायी लोक अदालत के अध्यक्ष हैं।

उन्होंने बताया कि करीब सात–आठ साल पहले अखबार की एक कटिंग से उन्हें पता चला कि मुबारकपुर के मुंशीपुरा स्थित मदरसे की प्रबंध समिति में उनका नाम ऑडिटर के रूप में दर्ज है। अहमद का कहना है कि उन्होंने तभी आजमगढ़ के एसएसपी और मुबारकपुर थाने को आवेदन देकर इसकी जांच तथा जिम्मेदार लोगों पर कार्रवाई की मांग की थी।

अहमद ने समिति में अपनी भूमिका से अनभिज्ञता जताई है। उनका आरोप है कि उनके नाम और पहचान संबंधी विवरण का गलत इस्तेमाल हुआ और पुलिस ने प्राथमिकी दर्ज करते समय उनके पुराने आवेदन पर ध्यान नहीं दिया। उन्होंने पूरे मामले की जांच की मांग की है।

अब जांच के सामने कौन से सवाल हैं?

पुलिस जांच में मूल दान पत्र, भूमि का राजस्व रिकॉर्ड और मान्यता के लिए जमा किए गए दस्तावेज अहम होंगे। साथ ही यह स्पष्ट करना होगा कि 1998 तथा 2024–25 की समितियों के रिकॉर्ड किसने तैयार किए और उनमें दर्ज प्रत्येक व्यक्ति की सहमति या वास्तविक भूमिका क्या थी।

जामताड़ा के लिए इस मामले का स्थानीय पहलू रिजवान अहमद का नाम है। उनके पहले दिए गए आवेदन और समिति के रिकॉर्ड की जांच से ही उनके दावे की पुष्टि या खंडन हो सकेगा। फिलहाल दस्तावेजों में कूटरचना और किसी नामजद व्यक्ति की जिम्मेदारी, दोनों जांच के अधीन हैं।

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Subhash Shekhar

सुभाष शेखर पिछले दो दशकों से अधिक समय से पत्रकारिता जगत में सक्रिय हैं। साल 2003 में बुंडू (झारखंड) की जमीनी समस्याओं को आवाज देने से शुरू हुआ उनका सफर आज 'Local Khabar' के माध्यम से डिजिटल पत्रकारिता के नए आयाम स्थापित कर रहा है। प्रभात खबर, ताजा टीवी, नक्षत्र न्यूज और राष्ट्रीय खबर जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों में संपादकीय और ग्राउंड रिपोर्टिंग का अनुभव रखने वाले सुभाष, आज के दौर के उन गिने-चुने पत्रकारों में से हैं जो खबर की बारीकियों के साथ-साथ वेब डिजाइनिंग और SEO जैसी तकनीकी विधाओं में भी महारत रखते हैं। वे वर्तमान में Local Khabar के संस्थापक और संपादक के रूप में झारखंड की जनपक्षीय खबरों का नेतृत्व कर रहे हैं।

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