रांची यूनिवर्सिटी का ‘टाइम मशीन’ घोटाला: 2 साल की डिग्री, 10 साल का इंतज़ार और मंत्री जी का दुलार!

रांची यूनिवर्सिटी का ‘टाइम मशीन’ घोटाला: 2 साल की डिग्री, 10 साल का इंतज़ार और मंत्री जी का दुलार!

Ranchi | रांची यूनिवर्सिटी (RU) ने हाल ही में साबित कर दिया कि अगर आप ‘खास’ हैं, तो वक्त भी आपके लिए रुक सकता है और नियम भी। मामला है ‘PK एंड कंपनी’ का, जिन्हें मैनेजमेंट की डिग्री दिलाने के लिए यूनिवर्सिटी ने ऐसे-ऐसे दांव-पेच चले कि बड़े-बड़े जादूगर भी शरमा जाएं।

वक्त को पीछे मोड़ दिया!

नियम कहता है कि 2 साल का कोर्स मैक्सिमम 4 साल में निपटा लो, वरना आपका रजिस्ट्रेशन ‘राम नाम सत्य’ हो जाएगा। लेकिन वित्त मंत्री जी के सुपुत्र और उनके दोस्तों के लिए यूनिवर्सिटी ने साल 2021 में ‘फ्लैशबैक’ मोड ऑन कर दिया। जो रजिस्ट्रेशन 2015 में ही दम तोड़ चुका था, उसे 2021 में वेंटिलेटर लगाकर ज़िंदा किया गया और परीक्षा दिलवाई गई।

‘होम डिलीवरी’ परीक्षा!

सिर्फ टाइम ही नहीं, यूनिवर्सिटी ने भूगोल भी बदल दिया। पढ़ाई की ‘इंस्टीट्यूट ऑफ मैनेजमेंट स्टडीज’ (IMS) में, लेकिन जब 10 साल बाद परीक्षा की बारी आई, तो सेंटर चुना गया डोरंडा कॉलेज। इत्तेफाक देखिए, उस वक्त प्रशांत की मम्मी वहीं की प्रिंसिपल थीं! इसे कहते हैं— “घर की खेती, घर की परीक्षा और घर का ही रिजल्ट।”

‘गजनी’ भी फेल, याददाश्त बेमिसाल!

आमतौर पर लोग 10 दिन पढ़ाई छोड़ दें तो सब भूल जाते हैं, लेकिन यहाँ तो टैलेंट कूट-कूट कर भरा था। 10 साल तक पढ़ाई से दूर रहने के बाद इन छात्रों ने परीक्षा दी और ‘फर्स्ट क्लास डिस्टिंक्शन’ ले आए! अब लोग पूछ रहे हैं कि ये कौन सी च्यवनप्राश खाते हैं या फिर कॉपियों पर ‘जादुई कलम’ चली थी?

जब ‘कानून’ ने ली अंगड़ाई…

सारा खेल हो जाने के बाद, जब प्रशांत बाबू अपना ‘डिपार्टमेंट लिविंग सर्टिफिकेट’ (DLC) लेने पहुँचे, तो विभाग के डायरेक्टर ने अड़ंगा लगा दिया। अब यूनिवर्सिटी की नींद टूटी है और आनन-फानन में DLC पर रोक लगा दी गई है।

तमाशा-ए-यूनिवर्सिटी: कुछ तीखे सवाल

  • एग्जाम बोर्ड या सुपरमैन?: क्या एग्जाम बोर्ड के पास इतनी ताकत है कि वो मृत रजिस्ट्रेशन को ज़िंदा कर दे?
  • मैनेजमेंट का नया नियम: क्या अब ‘मम्मी के कॉलेज’ में परीक्षा देना ही असली मैनेजमेंट है?
  • डिग्री का अचार: जो कोर्स 8 साल पहले बंद हो चुका, उसकी डिग्री दूसरे कॉलेज से कैसे बंट रही है?

रांची यूनिवर्सिटी ने दिखा दिया कि अगर इरादे ‘नेक’ (यानी राजनीतिक) हों, तो नामुमकिन कुछ भी नहीं। बस अब देखना ये है कि ये डिग्री ‘मैनेजमेंट’ की कहलाएगी या ‘जुगाड़’ की!

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Subhash Shekhar

सुभाष शेखर पिछले दो दशकों से अधिक समय से पत्रकारिता जगत में सक्रिय हैं। साल 2003 में बुंडू (झारखंड) की जमीनी समस्याओं को आवाज देने से शुरू हुआ उनका सफर आज 'Local Khabar' के माध्यम से डिजिटल पत्रकारिता के नए आयाम स्थापित कर रहा है। प्रभात खबर, ताजा टीवी, नक्षत्र न्यूज और राष्ट्रीय खबर जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों में संपादकीय और ग्राउंड रिपोर्टिंग का अनुभव रखने वाले सुभाष, आज के दौर के उन गिने-चुने पत्रकारों में से हैं जो खबर की बारीकियों के साथ-साथ वेब डिजाइनिंग और SEO जैसी तकनीकी विधाओं में भी महारत रखते हैं। वे वर्तमान में Local Khabar के संस्थापक और संपादक के रूप में झारखंड की जनपक्षीय खबरों का नेतृत्व कर रहे हैं।

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