रांची: ‘रील्स’ के अंतहीन स्क्रोलिंग चक्रव्यूह में उलझती नई पीढ़ी को लेकर रांची जिला प्रशासन ने सख्त मगर व्यावहारिक नजरिया सामने रखा है। लॉरेटो कॉन्वेंट स्कूल, डोरंडा के सीनियर स्कूल कॉन्सर्ट-2026 में पहुंचे जिला दण्डाधिकारी-सह-उपायुक्त (डीसी) मंजूनाथ भजन्त्री ने छात्रों और अभिभावकों से सीधा संवाद करते हुए साफ किया कि सोशल मीडिया से पूरी तरह दूरी बनाना समाधान नहीं, बल्कि इसके उपयोग की दिशा बदलना ही असली चुनौती है।
उन्होंने दो टूक कहा कि जेन-जी और जेन-अल्फा पीढ़ी आज आभासी दुनिया और 15-सेकंड की ‘रील्स संस्कृति’ में अपना कीमती वक्त गंवा रही है। अगर समय रहते छात्रों ने इसका सीमित और सार्थक उपयोग नहीं सीखा, तो यह लत उनके भविष्य निर्माण पर भारी पड़ेगी।
मंच से दिया गया यह संदेश केवल एक स्कूल तक सीमित नहीं रहा, बल्कि राजधानी रांची सहित पूरे राज्य के अभिभावकों और युवा पीढ़ी के बीच डिजिटल डिटॉक्स और भविष्य की प्राथमिकताओं को लेकर एक नई बहस छेड़ चुका है।
‘रील्स’ का नशा बनाम भविष्य: तकनीक का सही इस्तेमाल जरूरी
कॉन्सर्ट के मुख्य मंच से बोलते हुए डीसी मंजूनाथ भजन्त्री ने सोशल मीडिया के मनोवैज्ञानिक असर को रेखांकित किया। उन्होंने स्पष्ट कहा कि तकनीक को जीवन से पूरी तरह काटना न तो संभव है और न ही समझदारी, लेकिन सोशल मीडिया का इस्तेमाल अकादमिक प्रगति और ज्ञान अर्जन के लिए होना चाहिए न कि व्यर्थ के मनोरंजन के लिए।
“जेन-जी और जेन-अल्फा इंटरनेट और रील्स के दौर में सांस ले रही है। तकनीक से भागना कोई हल नहीं है, बल्कि जरूरत इस बात की है कि छात्र अपनी ऊर्जा और समय को उच्च शिक्षा और लक्ष्य प्राप्ति में लगाएं।”
— मंजूनाथ भजन्त्री, उपायुक्त, रांची

संगति का गणित: ‘सही दोस्त चुनिए, वही तय करेंगे दिशा’
उपायुक्त ने किशोरावस्था के उस नाजुक मोड़ पर भी उंगली रखी जहां दोस्त जिंदगी की दिशा तय करते हैं। उन्होंने छात्रों को आगाह किया कि किशोरावस्था में संगति का असर पूरे व्यक्तित्व पर पड़ता है। ऐसे साथियों के साथ रहें जो आपको अपने लक्ष्यों के प्रति जवाबदेह बनाएं, न कि वे जो भटकाव की ओर धकेलें।
इसके साथ ही उन्होंने छात्रों को अपने पारिवारिक संस्कारों, माता-पिता के मार्गदर्शन और शिक्षकों की सीख को जीवन का स्थायी आधार बनाने की सलाह दी।
‘लिटिल वुमन’ का मंचन और सफलता की नई परिभाषा
कार्यक्रम के दौरान लॉरेटो कॉन्वेंट की छात्राओं ने लुइसा मे अलकॉट के क्लासिक उपन्यास ‘लिटिल वुमन’ पर आधारित एक संगीतमय नाट्य प्रस्तुति दी। छात्राओं के अनुशासन, समन्वय और मंच पर दिखे परफेक्शन की तारीफ करते हुए डीसी ने सफलता की पारंपरिक सोच पर सवाल उठाया।
| पारंपरिक सोच | डीसी का व्यावहारिक दृष्टिकोण |
| सफलता का पैमाना केवल सोशल मीडिया प्रसिद्धि या फॉलोअर्स | अपने सामर्थ्य को पहचानकर वास्तविक जीवन में सार्थक योगदान देना |
| हमेशा दूसरों से आगे निकलने की अंधी होड़ | अपनी आंतरिक क्षमता पहचानना और हर परिस्थिति का सामना करना |
| सिर्फ किताबी अंक और रैंक को ही सब कुछ मानना | शिक्षा के साथ चरित्र निर्माण, अनुशासन और संवेदनशीलता को जोड़ना |
उन्होंने अपने निजी अनुभवों का जिक्र करते हुए बताया कि उनके कई सहपाठी पढ़ाई में अव्वल होने के बावजूद आज विभिन्न साधारण क्षेत्रों में समाज की सेवा कर रहे हैं और बेहद संतुष्ट जीवन जी रहे हैं।
अनुशासन और चरित्र निर्माण पर जोर
कार्यक्रम में प्रशिक्षु आईएएस (IAS Probationer) आस्था शरण और प्राचार्या सिस्टर के. क्लारा सहित सैकड़ों अभिभावक मौजूद थे। डीसी ने छात्राओं को समझाया कि जीवन में परिस्थितियां कभी भी एक जैसी नहीं रहेंगी। चुनौतियों से भागने के बजाय अपनी आंतरिक शक्ति (Core Strength) को पहचानें।
उन्होंने स्पष्ट किया कि सिर्फ अकादमिक डिग्री किसी को सफल नहीं बनाती; चरित्र निर्माण, संवेदनशीलता और सामाजिक जिम्मेदारी ही एक विद्यार्थी को बेहतर इंसान बनाती है।
क्या बदलेगा अब जमीनी स्तर पर?
डिजिटल लत पर जिला प्रशासन का यह रुख आने वाले दिनों में रांची के अन्य शिक्षण संस्थानों के लिए भी एक गाइडलाइन का आधार बन सकता है। प्रशासनिक हलकों में चर्चा है कि स्कूलों में स्क्रीन टाइम मैनेजमेंट, साइबर अवेयरनेस और मेंटल वेलबीइंग को लेकर विशेष सत्र आयोजित करने की पहल की जा सकती है। अब दारोमदार अभिभावकों और स्कूल प्रबंधन पर है कि वे बच्चों को वर्चुअल वैलिडेशन की अंधी दौड़ से निकालकर वास्तविक जीवन के लक्ष्यों की ओर कैसे मोड़ते हैं।












