रांची। झारखंड में JPSC और अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं में गड़बड़ियों को लेकर सड़कों पर उतरे युवाओं के गुस्से की आंच अब सिर्फ कोचिंग सेंटरों या परीक्षा हॉलों तक सीमित नहीं रही है। परीक्षा में कथित धांधली के विरोध में जारी छात्र आंदोलन को अब देश के बिजनेस इकोसिस्टम का भी खुला समर्थन मिल गया है। इंडियन स्टार्टअप एसोसिएशन (ISA) ने इस आंदोलन का समर्थन करते हुए राज्य सरकार की प्रशासनिक नीयत और ‘झारखंड स्टार्टअप नीति 2023’ के क्रियान्वयन पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
एसोसिएशन के राष्ट्रीय अध्यक्ष रथिन भद्रा ने साफ शब्दों में कहा है कि यह समस्या केवल एक सरकारी परीक्षा तक सीमित नहीं है, बल्कि यह राज्य के युवाओं के भविष्य और उनकी प्रतिभा के पलायन (Brain Drain) से जुड़ा एक बड़ा संकट बन चुका है।
“ये कोई बाहरी नहीं, झारखंड की नींव हैं” : ग्राउंड रिपोर्ट
रांची के मोरहाबादी मैदान और आसपास के इलाकों में छात्रों का गुस्सा साफ देखा जा सकता है। एक तरफ जहां अभ्यर्थी सड़कों पर परीक्षा व्यवस्था में पारदर्शिता की मांग कर रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ युवा उद्यमी भी सिस्टम की अनदेखी से आहत हैं।
मौके से मिली रिपोर्ट के मुताबिक, इंडियन स्टार्टअप एसोसिएशन ने सरकार की उस सोच पर कड़ा प्रहार किया है जिसमें छात्रों और नौकरी देने वाले उद्यमियों को अलग-अलग देखा जाता है। रथिन भद्रा ने कहा, “आंदोलन कर रहे ये युवा कोई बाहरी व्यक्ति नहीं हैं। ये झारखंड के ही घरों के बच्चे हैं, जो कल के प्रशासनिक अधिकारी, इंजीनियर, डॉक्टर और उद्यमी हैं। इनकी आवाज को दबाने के बजाय सुनने की सख्त जरूरत है।”
उन्होंने कहा कि एक छात्र परीक्षा देकर नौकरी पाने के लिए रात-दिन पसीना बहा रहा है, तो दूसरा स्टार्टअप खड़ा करके 10 लोगों को नौकरी देने का जरिया बन रहा है। सरकार को इन दोनों के प्रति समान संवेदनशीलता दिखानी होगी।
‘झारखंड स्टार्टअप नीति 2023’ का सच क्या है?
एसोसिएशन ने राज्य सरकार के दावों की पोल खोलते हुए ‘झारखंड स्टार्टअप नीति 2023’ की जमीनी हकीकत पर तीखे सवाल दागे हैं। कागजों पर बनी इस महत्वाकांक्षी नीति का वास्तविक लाभ राज्य के जमीनी नवाचारों (Innovation) तक कितना पहुंचा, इसे लेकर अब श्वेत पत्र (White Paper) जारी करने की मांग उठ रही है।
5 बड़े सवाल जिनका जवाब सरकार को देना होगा:
- फंड आवंटन: पिछले वर्षों में राज्य योजना एवं नवाचार निधि से असल में कितने स्टार्टअप्स को आर्थिक सहायता मिली?
- सरकारी खरीद: कितने स्थानीय स्टार्टअप्स को सरकारी प्रायोगिक प्रोजेक्ट्स या सरकारी खरीद में मौका मिला?
- डिजिटल पहचान का दुरुपयोग: नीति के तहत तय आधिकारिक पहचान ‘स्टार्टअप झारखंड’ नाम का इस्तेमाल किसी निजी संस्था द्वारा किस अधिकार से किया जा रहा है?
- बजट बनाम रोजगार: स्टार्टअप नीति के लिए आवंटित बजट में से कितनी राशि खर्च हुई और उससे असल में कितने स्थायी रोजगार पैदा हुए?
- पारदर्शिता: जिलावार कितने युवाओं को परामर्श, प्रशिक्षण और मार्गदर्शन उपलब्ध कराया गया?
एसोसिएशन ने राज्य सरकार से ‘राज्य योजना एवं नवाचार निधि’ के खर्च का स्वतंत्र ऑडिट कराने की मांग की है। साथ ही चेतावनी दी है कि आवश्यकता पड़ने पर इससे संबंधित दस्तावेज और पत्राचार नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (CAG) जैसी संवैधानिक संस्थाओं के समक्ष भी प्रस्तुत किए जाएंगे।
मानवीय पूंजी का पलायन: झारखंड का सबसे बड़ा नुकसान
जब राज्य का एक होनहार युवा अपनी पढ़ाई, परीक्षा, रोजगार या नवाचार के लिए पड़ोसी राज्यों (जैसे बेंगलुरु, दिल्ली या हैदराबाद) का रुख करता है, तो यह केवल आबादी का स्थानांतरण नहीं होता।
रथिन भद्रा के अनुसार, “यह झारखंड की ‘मानवीय पूंजी’ (Human Capital) का पलायन है। जब एक विचारशील युवा अवसर न मिलने पर राज्य छोड़ता है, तो झारखंड सिर्फ एक नागरिक नहीं खोता, बल्कि एक भावी रोजगारदाता और समस्या-समाधानकर्ता (Problem Solver) हमेशा के लिए खो देता है।”
इंडियन स्टार्टअप एसोसिएशन की 5 प्रमुख मांगें
झारखंड के छात्र आंदोलन को गति देते हुए एसोसिएशन ने राज्य सरकार के समक्ष पांच सूत्रीय मांग पत्र रखा है:
- तत्काल उच्चस्तरीय संवाद: JPSC और अन्य प्रतियोगी परीक्षाओं के पीड़ित छात्रों के साथ सरकार तुरंत सीधी वार्ता करे।
- परीक्षा धांधली की निष्पक्ष जांच: सभी अनियमितताओं के आरोपों की स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच कराई जाए।
- नीतिगत ऑडिट: झारखंड स्टार्टअप नीति 2023 के हर प्रावधान का जमीनी क्रियान्वयन ऑडिट हो।
- श्वेत पत्र और स्वतंत्र जांच: नवाचार फंड के नाम पर खर्च किए गए प्रत्येक रुपये का स्वतंत्र ऑडिट और ब्योरा सार्वजनिक किया जाए।
- समग्र CBI जांच: परीक्षा व्यवस्था, स्टार्टअप निधि और प्रशासनिक अनियमितताओं की व्यापक स्तर पर सीबीआई (CBI) जांच हो।
सरकार का अगला कदम क्या होगा?
इंडियन स्टार्टअप एसोसिएशन ने यह स्पष्ट कर दिया है कि उनका यह रुख किसी राजनीतिक दल या व्यक्ति के खिलाफ नहीं, बल्कि प्रशासनिक जवाबदेही (Administrative Accountability) तय करने के लिए है।
अब देखना यह होगा कि क्या राज्य सरकार आंदोलनकारी छात्रों और स्टार्टअप इकोसिस्टम की इन जायज मांगों पर संज्ञान लेते हुए तत्काल संवाद का रास्ता चुनती है, या फिर युवाओं का यह असंतोष और गहराता है। यदि समय रहते पारदर्शिता सुनिश्चित नहीं की गई, तो यह प्रशासनिक संकट राज्य के आर्थिक और सामाजिक ताने-बाने को और गंभीर नुकसान पहुंचा सकता है।











