किसी सामाजिक कार्यकर्ता या आंदोलनकारी की जीवन-संगिनी होना आसान नहीं होता। शुरुआती दिनों से ही घर की दीवारें खतरों से घिर जाती हैं। पति भूमिगत हों तो रातें बेचैन और दिन पुलिस की पूछताछ से भरे होते हैं। मुकदमे, जेल, पुलिस की दस्तक, प्रशासन का दबाव और दूसरी ओर जमीन हड़पने वाले महाजन, सूदखोर व माफिया—परिवार हर तरफ से निशाने पर रहता है। ऐसी विषम परिस्थितियों में परिवार की जिम्मेदारी, बच्चों का लालन-पालन और घर की सुरक्षा पूरी तरह महिला के कंधों पर आ टिकती है। ‘दिशोम गुरु’ शिबू सोरेन की धर्मपत्नी रुपी सोरेन ने यह सब झेला। उन्होंने न केवल इसे सहा, बल्कि पूरे संघर्ष को बिना किसी शोर-शराबे के बेहद मजबूती से संभाला।
शिवचरण मांझी से ‘गुरुजी’ बनने की मूक सहयात्री
वर्ष 1962 में, जब शिबू सोरेन महज 18 वर्ष के थे, उनका विवाह रुपी किस्कू से हुआ। कोल्हान-चांडिल क्षेत्र की यह युवती एक साधारण आदिवासी परिवार से ताल्लुक रखती थीं। विवाह के कुछ ही दिनों बाद गुरुजी गिरफ्तार होकर हजारीबाग जेल भेज दिए गए। नई-नवेली दुल्हन, तंगहाली और चारों ओर अनिश्चितता का माहौल। पति को छुड़ाने के पर्याप्त साधन भी नहीं थे, फिर भी उन्होंने हिम्मत नहीं हारी। वे अपने पति से मिलने जेल गईं, घर-परिवार को संभाला और इस कठिन शुरुआत को सहर्ष स्वीकार किया। यही वह दौर था जब शिवचरण मांझी से ‘गुरुजी’ शिबू सोरेन बनने की ऐतिहासिक यात्रा शुरू हो रही थी और रुपी सोरेन उस यात्रा की अविचल सहयात्री बनीं।
“यह शिबू सोरेन का नहीं, रुपी सोरेन का घर है”
आंदोलन के दिनों में गुरुजी जंगलों और पहाड़ों में रहकर संघर्ष का संचालन करते थे। टुंडी के जंगलों से लेकर नेमरा की माटी तक, हर कदम पर खतरा था। पुलिस लगातार घर पर दबिश देती और पूछताछ करती। ऐसे ही एक मौके पर रुपी सोरेन ने दो-टूक कहा था—“यह शिबू सोरेन का घर नहीं, रुपी सोरेन का घर है।” यह वाक्य केवल विरोध नहीं, बल्कि उनके आत्मसम्मान और अप्रतिम साहस का परिचायक था।
जब शिबू सोरेन जेल में थे, तब महाजनों ने खेत पर कब्जा करने की कोशिश की। उस समय रुपी सोरेन ने हाथ में हसुआ उठाकर उन्हें खदेड़ दिया था। जल, जंगल और जमीन की रक्षा के लिए एक महिला का यह तेवर आज भी झारखंड के संघर्ष इतिहास का गौरवशाली हिस्सा है।
तीन महिलाएं, एक मासूम और बीहड़ रास्ते
उनके जीवन का एक और प्रसंग अत्यंत भावुक करने वाला है। जब गुरुजी लंबे समय तक अज्ञातवास में रहे और कोई खबर नहीं मिली, तब रुपी सोरेन व्याकुल हो उठीं। वे गोद में छोटे दुर्गा को लेकर अपनी सास और ननद के साथ बीहड़ जंगलों और पहाड़ों की ओर निकल पड़ीं। तीन महिलाएं, एक नन्हा बच्चा और अनजान डगर—पति की खोज और परिवार की रक्षा का यह दृश्य उन सभी माताओं-बहनों के त्याग की याद दिलाता है जो आंदोलनकारियों के परिवारों की रीढ़ बनती हैं।
इस कठिन दौर में उन्होंने अपनी संतानों—अंजली, दुर्गा, हेमंत और बसंत—का न केवल स्नेह से पालन किया, बल्कि उनमें हक और अधिकार के लिए लड़ने का हौसला भी भरा। अपनी सास सोनामनी मुर्मू से मिले संस्कारों और आत्मबल ने उन्हें भीतर से और दृढ़ बनाया।
आंदोलन की अदृश्य शक्ति
झारखंडी और आदिवासी समाज में ऐसी संघर्षशील महिलाओं का स्थान सर्वोपरि है। वे केवल जीवनसंगिनी नहीं, बल्कि पूरे आंदोलन की अदृश्य रीढ़ होती हैं। महाजनी प्रथा और शोषण के खिलाफ लड़ाई में घर-परिवार की ढाल यही महिलाएं बनती हैं। आम जनमानस इन्हें श्रद्धा से ‘माई’ कहकर पुकारता है। रुपी सोरेन भी ऐसी ही थीं। उन्होंने कभी राजनीतिक मंचों पर स्थान नहीं तलाशा, बल्कि घर की चौखट पर रहकर आजीवन साधना की।
वर्ष 1999 में उन्होंने दुमका लोकसभा सीट से चुनाव लड़ा, लेकिन चुनावी हार के बाद बिना किसी मलाल के पुनः परिवार और समाज की सेवा में समर्पित हो गईं। गुरुजी के हर उतार-चढ़ाव में वे साए की तरह उनके साथ रहीं।
एक साधना का अवसान और अमर विरासत
रुपी सोरेन का जाना झारखंड के एक पूरे संघर्ष युग के शांत हो जाने जैसा है। यह कटु सत्य है कि झारखंड आंदोलन की सफलता के पीछे वह अदृश्य शक्ति भी शामिल थी, जिसे रुपी सोरेन ने अपने त्याग से सींचा था।
आज रुपी सोरेन सशरीर हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनका जीवन हर उस महिला के लिए प्रेरणास्रोत और प्रकाशस्तंभ है, जो विपरीत परिस्थितियों में परिवार और सिद्धांतों की रक्षा के लिए अडिग खड़ी रहती हैं। अदम्य साहस और मूक तपस्या की इस प्रतिमूर्ति को सादर नमन। उनकी यह साधना झारखंड की माटी में सदैव जीवित रहेगी।
लेखक: लक्ष्मीनारायण मुंडा
स्थान: रांची, झारखंड












