Ranchi | झारखंड में प्रकृति पर्व करम पूजा से ठीक पहले आदिवासी परंपरा और उपासना पद्धति को लेकर बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। केंद्रीय सरना समिति ने चर्चों और प्रार्थना भवनों में कथित रूप से करम डाली गाड़कर पर्व मनाए जाने पर कड़ा ऐतराज जताया है।
मामले को लेकर केंद्रीय सरना समिति के अध्यक्ष बबलू मुंडा के नेतृत्व में एक प्रतिनिधिमंडल ने रांची के उपायुक्त (डीसी) को मांग पत्र सौंपा है। समिति का आरोप है कि मूल रूढ़िवादी परंपरा, पाहन व्यवस्था और अखड़ा संस्कृति को दरकिनार कर अवैध तरीके से पर्व का स्वरूप बदला जा रहा है।
प्रशासन को दिए अल्टीमेटम के बाद अब यह मांग मुख्यमंत्री तक पहुंचाने की तैयारी है, जिससे 22 तारीख को होने वाले करम महोत्सव से पहले राज्य का सियासी और सामाजिक पारा चढ़ गया है।
‘अखड़ा की जगह चर्च में करम डाली क्यों?’: डीसी दफ्तर पहुंचे सरना अगुवा
रांची उपायुक्त को सौंपे गए ज्ञापन में केंद्रीय सरना समिति ने स्पष्ट कहा कि आदिवासी जनजातियों के आराध्य देव करम और सरहुल जैसे महापर्वों को ईसाई उपासना पद्धति के अनुसार गुप्त व मनमाने तरीके से मनाया जा रहा है।
सरना समिति के अध्यक्ष बबलू मुंडा ने ग्राउंड इंटरव्यू में दो टूक कहा:
“करम पूजा का आयोजन मौजा के अखड़ा में पाहन की अगुवाई में होता है। लेकिन टीन के डिब्बों में बालू भरकर, क्रूस के साथ करम डाली गाड़ना और फिर उसे कहीं भी फेंक देना हमारी आस्था का सीधा अपमान है। यह परंपरा के साथ खिलवाड़ है, जिसे आदिवासी समाज बर्दाश्त नहीं करेगा।”
उन्होंने उदाहरण देते हुए सवाल उठाया कि पारंपरिक व्यवस्था अखड़ा की है, चर्च की नहीं। अगर कोई अन्य धर्मस्थल पर जाकर अपनी प्रार्थना पद्धति थोपेगा तो विवाद स्वाभाविक है।
पाहन प्रथा बनाम मिशनरी व्यवस्था: सामाजिक टकराव की जड़ क्या है?
बबलू मुंडा ने साफ किया कि विरोध किसी समुदाय के पर्व मनाने से नहीं, बल्कि रूढ़ि प्रथा (Customary Law) को तोड़े जाने से है।
उन्होंने दलील दी:
- व्यवस्था का अंतर: आदिवासी समाज की पारंपरिक व्यवस्था जन्म से मृत्यु तक पाहन, पनभोरा, कोटवार और महतो से संचालित होती है, जबकि धर्मांतरित वर्ग की व्यवस्था फादर, सिस्टर और बिशप के दिशा-निर्देशों पर निर्भर है।
- सदान और गैर-आदिवासी भी मनाते हैं करम: उन्होंने स्पष्ट किया कि झारखंड में सदान भाई भी करम पूजा करते हैं, लेकिन वे भी पाहन की रीति और अखड़ा परंपरा का सम्मान करते हुए नियम-विधान का पालन करते हैं।
- अखड़ा में सबका स्वागत: समिति का कहना है कि जिन्हें भी करम मनाना है, वे सीधे गांव के पारंपरिक अखड़ा में आएं, समाज उनका स्वागत करेगा और साथ मिलकर झूमेगा। लेकिन बंद दरवाजों में विकृत स्वरूप स्वीकार्य नहीं होगा।

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इंटरव्यू के दौरान जब उनसे पूछा गया कि क्या उनका रुख राजनीतिक है और भाषा विपक्ष से मेल खाती है, तो उन्होंने साफ कहा:
“जब भी हम डीलिस्टिंग, धर्मांतरण और अपनी रूढ़िवादी परंपरा की रक्षा की बात करते हैं, तो फौरन हमें भाजपा या आरएसएस का आदमी बता दिया जाता है। कोई चाहे जो आरोप लगाए, अगर हमारे समाज की संस्कृति को गर्त में धकेलने की कोशिश होगी, तो हम पुरजोर आवाज उठाएंगे।”
उन्होंने वर्तमान सरकार पर तुष्टिकरण का आरोप लगाते हुए कहा कि पिछले कुछ वर्षों में ऐसी गतिविधियों को शह मिली है। उन्होंने मांग की कि मुख्यमंत्री खुद एक आंदोलनकारी परिवार और आदिवासी पृष्ठभूमि से आते हैं, इसलिए उन्हें तुरंत अपनी विशेष शाखा (Special Branch) की रिपोर्ट पर संज्ञान लेकर कार्रवाई करनी चाहिए।
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करम पर्व 22 तारीख को है और प्रशासन के पास कदम उठाने के लिए महज कुछ दिनों की मोहलत बची है। सरना समिति ने अपनी रणनीति स्पष्ट कर दी है:
- मुख्यमंत्री को ज्ञापन: रांची डीसी के बाद प्रतिनिधिमंडल सीधे मुख्यमंत्री को मांग पत्र सौंपकर प्रशासनिक दखल की मांग करेगा।
- पाहनों और बुद्धिजीवियों का महाजुटान: यदि प्रशासन ने अवैध और गैर-पारंपरिक आयोजनों पर रोक नहीं लगाई, तो करम के बाद राज्यभर के पाहन, पड़हा राजा और सामाजिक बुद्धिजीवियों की वृहद बैठक बुलाकर बड़ा आंदोलन छेड़ा जाएगा।
अब गेंद पूरी तरह जिला प्रशासन और राज्य सरकार के पाले में है कि वे आस्था और कानून-व्यवस्था के इस संवेदनशील मसले को पर्व से पहले कैसे सुलझाते हैं।











