झारखंड की राजनीति में इस समय ‘2026’ की तारीख किसी बड़े भूकंप की आहट जैसी महसूस हो रही है। मुद्दा है— परिसिमन (Delimitation)। यह केवल नक्शे पर खिंची जाने वाली कुछ रेखाएं नहीं हैं, बल्कि यह तय करेगा कि झारखंड की सत्ता की चाबी किसके पास रहेगी।
जब हमने ज़मीनी स्तर पर राजनीतिक विश्लेषकों और संवैधानिक विशेषज्ञों से चर्चा की, तो एक गहरी चिंता उभर कर आई: क्या जनसंख्या आधारित लोकतंत्र में झारखंड की ‘आदिवासी पहचान’ सुरक्षित रह पाएगी?
Quick Summary: परिसीमन का पूरा खेल (एक नज़र में)
| मुख्य बिंदु | विवरण |
| वर्तमान सीटें | 81 विधानसभा सीटें |
| प्रस्तावित विस्तार | 160 विधानसभा सीटें |
| मुख्य चिंता | ST आरक्षित सीटों का अनुपात कम होना |
| प्रभावित क्षेत्र | कोल्हान और संथाल परगना |
| निर्धारक वर्ष | 2026 (अगली जनगणना के बाद) |
1. क्या है असली विवाद? क्यों डरे हैं आदिवासी संगठन?
परिसिमन का सिद्धांत सरल है— “एक व्यक्ति, एक वोट, एक मूल्य।” लेकिन झारखंड जैसे राज्य के लिए यह इतना सरल नहीं है।
- जनसंख्या वृद्धि में अंतर: कोल्हान और संथाल परगना, जो आदिवासी राजनीति के केंद्र हैं, वहां जनसंख्या वृद्धि दर शहरी क्षेत्रों (जैसे रांची, जमशेदपुर) की तुलना में कम रही है।
- सीटों का नुकसान: यदि आज के फॉर्मूले से परिसीमन हुआ, तो दक्षिण झारखंड की सीटें कम हो सकती हैं और उत्तर/शहरी झारखंड की सीटें बढ़ सकती हैं। इसका मतलब है कि विधानसभा में आदिवासियों का प्रतिनिधित्व करने वाले चेहरों की संख्या ‘अनुपात’ में कम हो सकती है।
2. 81 से 160 सीटों की मांग: मास्टरस्ट्रोक या मजबूरी?
झारखंड के लगभग सभी दल (JMM, BJP, कांग्रेस) अब एक सुर में सीटों की संख्या बढ़ाकर 160 करने की वकालत कर रहे हैं। हमारे विश्लेषण में इसके दो मुख्य कारण सामने आए हैं:
- प्रतिनिधित्व का संकट टालना: अगर कुल सीटें 160 हो जाती हैं, तो भले ही प्रतिशत कम हो, ST आरक्षित सीटों की संख्या वर्तमान (28) से बढ़कर 45-50 तक पहुंच सकती है। इससे राजनीतिक प्रभाव बना रहेगा।
- दुर्गम क्षेत्रों तक पहुंच: झारखंड का भूगोल चुनौतीपूर्ण है। एक विधायक के लिए 4-5 लाख की आबादी को संभालना मुश्किल है। सीटें बढ़ने से निर्वाचन क्षेत्र छोटे होंगे और विकास की गति तेज़ होगी।
“परिसीमन केवल सिरों की गिनती नहीं है, यह उन समुदायों के संरक्षण का मामला है जिन्होंने सदियों से जल-जंगल-जमीन की रक्षा की है।”
3. संथाल परगना: डेमोग्राफी और राजनीतिक समीकरण
संथाल परगना में जनसांख्यिकीय बदलाव (Demographic Change) सबसे बड़ा मुद्दा है। विपक्षी दलों का आरोप है कि अवैध घुसपैठ के कारण कुछ क्षेत्रों की आबादी कृत्रिम रूप से बढ़ी है। यदि इन क्षेत्रों में सीटें बढ़ती हैं, तो यह राज्य के ‘मूल निवासियों’ की राजनीतिक हिस्सेदारी को सीधे प्रभावित करेगा। यह मुद्दा आने वाले समय में कानूनी और संवैधानिक लड़ाई का रूप ले सकता है।
4. एक्सपर्ट ओपिनियन: क्या हो सकता है समाधान?
विशेषज्ञों का मानना है कि झारखंड जैसे पांचवीं अनुसूची (5th Schedule) वाले राज्यों के लिए परिसीमन के नियम अलग होने चाहिए।
- सिर्फ जनसंख्या ही नहीं, बल्कि क्षेत्रफल और भौगोलिक विषमता को भी मानक बनाया जाए।
- ST सीटों के लिए एक ‘फ्रीज’ या विशेष कोटा सुनिश्चित किया जाए ताकि उनकी ताकत न घटे।
परिसीमन कब होगा?
वर्तमान कानून के अनुसार, 2026 के बाद होने वाली पहली जनगणना के आंकड़े आने के बाद परिसीमन प्रक्रिया शुरू होगी।
क्या परिसीमन से मुख्यमंत्री की सीट पर असर पड़ेगा?
निश्चित रूप से। कई मौजूदा ‘Safe’ सीटें अनारक्षित हो सकती हैं या उनका भूगोल पूरी तरह बदल सकता है।
160 सीटों का प्रस्ताव अभी किस स्तर पर है?
यह एक राजनीतिक मांग है। इसके लिए संसद में संविधान संशोधन की आवश्यकता होगी।
Local Khabar का सवाल: क्या आपको लगता है कि झारखंड में सीटों का बंटवारा सिर्फ जनसंख्या के आधार पर होना चाहिए, या इसमें ‘जल-जंगल-जमीन’ और आदिवासी संस्कृति को भी आधार बनाना चाहिए? अपनी राय कमेंट में जरूर दें।








