देवघर: विजयादशमी पर रावण दहन की परंपरा के बीच बाबा बैद्यनाथ की नगरी देवघर की धार्मिक मान्यता अलग है। धर्माचार्य केशव बाबा के अनुसार, यहां रावण को भगवान शिव के परम भक्त के रूप में भी याद किया जाता है। बाबा बैद्यनाथ धाम की स्थापना से जुड़ी पौराणिक कथा में उसकी भूमिका के कारण देवघर में रावण दहन की परंपरा प्रचलित नहीं मानी जाती।
इस मान्यता के केंद्र में रावण की शिवभक्ति है। केशव बाबा के मुताबिक, देवघर की धार्मिक परंपरा में रावण की तपस्या और विद्वता को विशेष स्थान दिया जाता है।
बाबा बैद्यनाथ से कैसे जुड़ी है रावण की कथा?
पौराणिक मान्यता के अनुसार, लंका का राजा रावण भगवान शिव को प्रसन्न कर उनका ज्योतिर्लिंग लंका ले जाना चाहता था। उसने इसके लिए कठोर तपस्या की। उसकी भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उसे ज्योतिर्लिंग दिया।
कथा के अनुसार, भगवान शिव ने शर्त रखी थी कि यात्रा के दौरान शिवलिंग को कहीं जमीन पर नहीं रखना होगा। जमीन पर रखे जाने पर वह उसी स्थान पर स्थापित हो जाएगा।
मान्यता है कि लंका जाते समय देवघर के निकट रावण को लघुशंका के लिए रुकना पड़ा। उसने कुछ समय के लिए शिवलिंग एक चरवाहे को सौंप दिया। काफी देर तक प्रतीक्षा करने के बाद चरवाहे ने शिवलिंग जमीन पर रख दिया।
पौराणिक कथा के मुताबिक, इसके बाद शिवलिंग उसी स्थान पर स्थापित हो गया। बाबा बैद्यनाथ धाम की स्थापना की मान्यता इसी प्रसंग से जुड़ी है।
रावण की शिवभक्ति को दिया जाता है सम्मान
धर्माचार्य केशव बाबा के अनुसार, बाबा बैद्यनाथ धाम से जुड़ी कथा के कारण स्थानीय धार्मिक मान्यताओं में रावण के प्रति आदर का भाव है। उसे केवल बुराई के प्रतीक के रूप में देखने के बजाय भगवान शिव के भक्त और विद्वान के रूप में भी याद किया जाता है।
पौराणिक मान्यताओं में बाबा बैद्यनाथ को रावणेश्वर बैद्यनाथ भी कहा जाता है। केशव बाबा देवघर में रावण दहन की परंपरा प्रचलित नहीं होने को इसी धार्मिक आस्था से जोड़ते हैं।
रावण के चरित्र के अलग पक्ष पर केंद्रित है मान्यता
रावण के अहंकार और उसके कृत्यों के प्रसंगों के साथ उसकी शिवभक्ति का उल्लेख भी पौराणिक कथाओं में मिलता है। देवघर से जुड़ी यह मान्यता उसकी भक्ति के पक्ष को महत्व देती है।
इस परंपरा को समझने का आधार बाबा बैद्यनाथ धाम की स्थापना से जुड़ी धार्मिक कथा है। यह आस्था और पौराणिक मान्यता का विषय है।












