Ranchi | झारखंड पुलिस महकमे से एक ऐसी खबर सामने आई है जिसने सबको हैरान कर दिया है। इसे सिस्टम की सुस्ती कहें या ‘रिटायरमेंट गिफ्ट’, लेकिन सच यही है कि राज्य के चार पुलिस अफसरों को डीएसपी (DSP) की कुर्सी तो मिली, पर वह भी उनके रिटायरमेंट से महज 24 घंटे पहले। पिछले 7 महीनों से अपनी पोस्टिंग का इंतजार कर रहे इन अफसरों को शुक्रवार को तैनाती दी गई, जबकि शनिवार (31 जनवरी) को उनकी विदाई का दिन है।
पहले प्रमोशन का इंतज़ार, अब एक दिन की ‘साहबी’
झारखंड में 7 महीने पहले 60 से अधिक पुलिस इंस्पेक्टरों को प्रमोट कर डीएसपी बनाया गया था। इनमें से कई अफसर बिना किसी चार्ज या पोस्टिंग के महीनों तक मुख्यालय में अपनी बारी का इंतजार करते रहे। अब जब रिटायरमेंट की घड़ी आई, तो गृह कार्य एवं आपदा प्रबंधन विभाग की नींद टूटी। शुक्रवार को आनन-फानन में अधिसूचना जारी की गई और इन चार अफसरों को ‘स्पेशल ब्रांच’ (विशेष शाखा) में पोस्टिंग थमा दी गई।
स्पेशल ब्रांच में हुई इन 4 अफसरों की तैनाती
गृह विभाग द्वारा जारी आदेश के अनुसार, जिन चार अधिकारियों को पोस्टिंग मिली है उनमें शामिल हैं:
- अखिलेश प्रसाद मंडल (पुलिस उपाधीक्षक, विशेष शाखा, रांची)
- सरोज कुमार सिंह (पुलिस उपाधीक्षक, विशेष शाखा, रांची)
- शैलेश प्रसाद (पुलिस उपाधीक्षक, विशेष शाखा, रांची)
- विनोद उरांव (पुलिस उपाधीक्षक, विशेष शाखा, रांची)
ये चारों अफसर 31 जनवरी को अपनी वर्दी उतार देंगे। यानी शुक्रवार को जॉइनिंग और शनिवार को फेयरवेल।
सिस्टम की फाइल में दबी रही अफसरों की ‘गरिमा’
यह मामला केवल इन चार अफसरों का नहीं है। जानकारों का कहना है कि 60 से अधिक प्रमोट हुए अफसरों में से कई इसी तरह ‘वेटिंग फॉर पोस्टिंग’ में रिटायर होने की कगार पर हैं। पुलिस गलियारों में चर्चा है कि यह पोस्टिंग केवल इसलिए दी गई है ताकि इन अधिकारियों को रिटायरमेंट के बाद मिलने वाले वित्तीय लाभ (Pensionary Benefits) डीएसपी रैंक के मिल सकें।
ग्राउंड रिपोर्ट: क्या कहते हैं नियम? आमतौर पर प्रमोशन के तुरंत बाद जिलों या इकाइयों में तैनाती होनी चाहिए। लेकिन झारखंड में फाइलें इस कदर कछुआ चाल चलीं कि अधिकारियों को अपना ‘हक’ पाने के लिए अंतिम दिन तक का इंतजार करना पड़ा। इससे पहले भी दो-तीन अफसरों के साथ ऐसा ही हुआ था, जिन्हें रिटायरमेंट से 2-4 दिन पहले पोस्टिंग मिली थी।
बड़ा सवाल: क्या फील्ड को अफसरों की जरूरत नहीं थी?
एक तरफ झारखंड के कई जिलों में डीएसपी स्तर के अधिकारियों के पद खाली हैं, वहीं दूसरी तरफ अनुभवी अफसरों को 7 महीने तक बिना काम के बैठाकर रखा गया।
- नुकसान किसका? राज्य की कानून व्यवस्था का, क्योंकि अनुभवी अधिकारी फील्ड के बजाय फाइलों में उलझे रहे।
- फायदा किसका? शायद किसी का नहीं, क्योंकि एक दिन की पोस्टिंग में कोई भी अधिकारी न तो फाइलों को समझ पाएगा और न ही किसी मिशन पर काम कर पाएगा।
इन चारों अफसरों की सेवानिवृत्ति के बाद अब विभाग के पास बाकी बचे प्रमोटेड अफसरों की लंबी लिस्ट है। सवाल यह है कि क्या बाकी अफसरों को भी इसी तरह ‘रिटायरमेंट की पूर्व संध्या’ पर तैनाती मिलेगी, या सरकार इस प्रक्रिया में तेजी लाकर उन्हें काम करने का वास्तविक मौका देगी? फिलहाल, यह घटना झारखंड पुलिस के प्रशासनिक इतिहास में एक ‘अजीबोगरीब’ उदाहरण के तौर पर याद की जाएगी।










