झारखंड में शराब संकट: 7 महीने में बंद हो जाएंगी दुकानें? सरकार को सीधी चेतावनी, जानें क्यों मचा हड़कंप

झारखंड में शराब संकट: 7 महीने में बंद हो जाएंगी दुकानें? सरकार को सीधी चेतावनी, जानें क्यों मचा हड़कंप

Ranchi | झारखंड में शराब शौकीनों और सरकार के राजस्व विभाग के लिए बुरी खबर है। राज्य की नई शराब नीति (New Liquor Policy) के खिलाफ व्यापारियों का गुस्सा अब सातवें आसमान पर है। हालात ये हैं कि अगर जल्द सुनवाई नहीं हुई, तो आने वाले 7 महीनों के भीतर राज्य में बड़े पैमाने पर शराब की दुकानें बंद (Surrender) हो सकती हैं।

झारखंड शराब व्यवसायी संघ ने सरकार और उत्पाद विभाग की नीतियों को ‘व्यापारी विरोधी’ बताते हुए दो टूक चेतावनी दी है। संघ का कहना है कि विभाग सिर्फ अपने रेवेन्यू टारगेट में मस्त है, जबकि जमीनी हकीकत यह है कि व्यापारी भारी आर्थिक संकट और कर्ज के बोझ तले दबते जा रहे हैं।

क्यों ‘त्राहिमाम’ कर रहे हैं शराब व्यापारी?

झारखंड शराब व्यवसायी संघ के महासचिव सुबोध कुमार जायसवाल ने बताया कि वर्तमान शराब नीति के कारण व्यापारियों की कमर टूट गई है। उन्होंने सरकार की अनदेखी पर सवाल उठाते हुए कहा कि पूर्व की व्यवस्था में संतुलन था, लेकिन नई नीति ने सबकुछ बिगाड़ दिया है।

सबसे बड़ा विवाद: बीयर बार और डिपो का खेल संघ के मुताबिक, पहले बीयर बार (Beer Bar) संचालक अपनी शराब की खरीद स्थानीय शराब दुकानों से करते थे। इससे दुकानों की बिक्री बनी रहती थी और व्यापार संतुलित रहता था।

“लेकिन वर्तमान नीति में इस सिस्टम को खत्म कर दिया गया है। अब बीयर बार संचालक सीधे JSBCL (झारखंड स्टेट बेवरेजेस कॉरपोरेशन लिमिटेड) के डिपो से शराब उठा रहे हैं। इसका सीधा और गंभीर असर रिटेल काउंटर की बिक्री पर पड़ा है, जिससे दुकानदार घाटे में जा रहे हैं।”

महंगी शराब और ‘कोटा’ का अतिरिक्त बोझ

आम जनता भी इस नीति से परेशान है। रिपोर्ट के अनुसार, पहले सरकारी बिक्री व्यवस्था के दौरान शराब की कीमतें कम थीं, जिससे आम उपभोक्ता और व्यापारी दोनों खुश थे।

  • कीमतों में आग: वर्तमान में शराब के दामों में अत्यधिक वृद्धि कर दी गई है। महंगी शराब होने के कारण ग्राहक कम हो गए हैं और बिक्री लगातार घट रही है।
  • कोटा सिस्टम की मार: बिक्री घटने के बावजूद, सरकार ने व्यापारियों पर ‘अतिरिक्त कोटा’ (Additional Quota) का बोझ डाल दिया है। यानी माल बिक नहीं रहा, लेकिन सरकार जबरदस्ती माल खरीदने का दबाव बना रही है।

“न दुकान चला सकते हैं, न छोड़ सकते हैं”

व्यापारियों का कहना है कि वे एक ऐसे चक्रव्यूह में फंस गए हैं जहां से निकलना नामुमकिन है। संघ ने चिंता जताई है कि यह नीति पूरी तरह अव्यावहारिक (Impractical) है:

  1. सरेंडर करने पर भी नुकसान: अगर कोई मजबूरी में दुकान सरेंडर (बंद) करना चाहे, तो सरकार ईटीडी (ETD) काटकर पैसा वसूलती है।
  2. स्टॉक वापसी का संकट: दुकान बंद करने पर व्यापारी अपना बचा हुआ स्टॉक किसी दूसरे व्यापारी को नहीं बेच सकता। उसे वह स्टॉक सरकार को ही वापस करना पड़ता है, जिससे उसे लाखों रुपये का नुकसान झेलना पड़ता है।

आगे क्या? सरकार के पाले में गेंद

झारखंड शराब व्यवसायी संघ ने राज्य सरकार से मांग की है कि इन सभी बिंदुओं पर तत्काल विचार करते हुए शराब नीति की पुनः समीक्षा की जाए।

चेतावनी: संघ ने साफ कहा है कि “यदि शीघ्र कोई सकारात्मक निर्णय नहीं लिया गया, तो आने वाले 7 महीनों के भीतर बड़ी संख्या में शराब दुकानों का सरेंडर होना मजबूरी बन जाएगी। इसकी पूरी जिम्मेदारी सरकार और उत्पाद विभाग की होगी।”

Subhash Shekhar

सुभाष शेखर पिछले दो दशकों से अधिक समय से पत्रकारिता जगत में सक्रिय हैं। साल 2003 में बुंडू (झारखंड) की जमीनी समस्याओं को आवाज देने से शुरू हुआ उनका सफर आज 'Local Khabar' के माध्यम से डिजिटल पत्रकारिता के नए आयाम स्थापित कर रहा है। प्रभात खबर, ताजा टीवी, नक्षत्र न्यूज और राष्ट्रीय खबर जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों में संपादकीय और ग्राउंड रिपोर्टिंग का अनुभव रखने वाले सुभाष, आज के दौर के उन गिने-चुने पत्रकारों में से हैं जो खबर की बारीकियों के साथ-साथ वेब डिजाइनिंग और SEO जैसी तकनीकी विधाओं में भी महारत रखते हैं। वे वर्तमान में Local Khabar के संस्थापक और संपादक के रूप में झारखंड की जनपक्षीय खबरों का नेतृत्व कर रहे हैं।

Join WhatsApp

Join Now

Leave a Comment