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ऐतिहासिक गांव मुड़मा में कभी जतरा लगा करता था—पवित्र स्मृतियों का स्थल, भाईचारे का प्रतीक और पूर्वजों की पावन धरोहर। आज विडंबना यह है कि इसे महज एक ‘मेला’ बना दिया गया है। भीड़, स्टॉल, सेल्फी, राजनीतिक भाषणबाजी और तथाकथित धर्मगुरुओं व धर्म के ठेकेदारों के प्रचार का अखाड़ा! आदिवासी आस्था, परंपरा और संस्कृति के मूल स्वरूप को तोड़-मरोड़कर आज एक व्यावसायिक तमाशा बना दिया गया है। इस पूरे परिदृश्य में सबसे खतरनाक बात यह है कि आदिवासी समाज स्वयं मूकदर्शक बनकर इसका मूक समर्थन कर रहा है।
इतिहास की पावन जड़ें
मुड़मा जतरा की शुरुआत का कोई लिखित प्रामाणिक दस्तावेज तो नहीं मिलता, लेकिन लोककथाओं और मौखिक इतिहास के अनुसार इसकी जड़ें करीब 450 से 500 वर्ष पुरानी हैं। ऐतिहासिक संदर्भ बताते हैं कि जब मुगलों ने रोहतासगढ़ पर आक्रमण कर उस पर कब्जा कर लिया, तब वहां बसे उरांव समुदाय को अपना गढ़ छोड़ना पड़ा था। वे सोन नदी पार कर पलामू होते हुए छोटानागपुर की ओर बढ़े। रांची के मुड़मा क्षेत्र में उनका सामना स्थानीय मुंडा जनजाति के सरदारों (मुंडाओं) से हुआ।
उरांवों ने अपनी व्यथा साझा की। तत्कालीन समय में इस क्षेत्र के मूल निवासी और शासक रहे मुंडाओं ने दरियादिली दिखाते हुए उन्हें पश्चिमी वन क्षेत्र साफ कर बसने की अनुमति दी। इसी ऐतिहासिक संधि-स्थल की स्मृति में उरांव समुदाय के चालीस पड़हा के लोग प्रतिवर्ष मुड़मा में जतरा आयोजित करते आ रहे हैं। यह एक विजयोत्सव था, सौहार्द और भाईचारे का महापर्व था, जिसमें मुंडाओं को ‘बड़े भाई’ का दर्जा दिया गया था। जतरा खूंटा (शक्ति खूंटा) उसी पवित्रता और ऐतिहासिक अनुबंध का प्रतीक है।
यह कोई साधारण जमघट नहीं था। यह उस ऐतिहासिक क्षण की गवाही थी जब मुंडा समाज ने उरांव समुदाय को अपनी माटी पर शरण दी थी। यह दो बड़े जनजातीय समुदायों द्वारा संघर्ष की जगह सह-अस्तित्व को चुनने की मिसाल थी। यह आत्मा और आस्था का स्थल था, न कि व्यापारिक लेन-देन का बाजार।
आज यहां क्या शेष रह गया है?
आज मुड़मा जतरा को सामान्य बोलचाल में “मेला” कहकर पुकारा जाने लगा है और धीरे-धीरे इसे ही सच मान लिया गया, क्योंकि अब इसमें जतरा का भाव ही शेष नहीं रहा। शक्ति खूंटा की पूजा तो होती है, चालीस पड़हा के पाहन दीप भी जलाते हैं, लेकिन उसके इर्द-गिर्द का पूरा माहौल व्यावसायिक और राजनीतिक स्वार्थों में तब्दील हो चुका है। स्टॉल, दुकानें, सेल्फी की होड़, राजनीतिक दलों के भाषण और स्वयंभू धर्मगुरुओं का बढ़ता वर्चस्व अब इस आयोजन की पहचान बन चुके हैं।
इस पूरे परिदृश्य के केंद्र में स्वयंभू व स्वघोषित सरना धर्मगुरु बंधन तिग्गा और उनके जैसे तथाकथित धर्म के ठेकेदार बने हुए हैं। हर वर्ष इस पावन आयोजन को व्यक्तिगत प्रचार का मंच बना लिया जाता है। यह कहना अनुचित नहीं होगा कि जो लोग “आस्था” बचाने का दंभ भरते हैं, वही वास्तव में इसकी मूल भावना को सबसे गहरी चोट पहुंचा रहे हैं। जतरा को मेले और राजनीतिक-धार्मिक मंच का रूप देकर व्यापार चलाया जा रहा है। यह सब कुछ इतिहास, परंपरा और संस्कृति की बलि चढ़ाकर किया जा रहा है।
जब कोई व्यक्ति स्वयं को समाज का “धर्मगुरु” घोषित कर दे और समाज बिना तर्क-वितर्क किए उसे स्वीकार कर ले, तो परंपरा की जड़ें स्वतः खोखली होने लगती हैं। मुड़मा जतरा का मूल उद्देश्य चालीस पड़हा का सामूहिक मिलन, पूर्वजों की स्मृति और मुंडा-उरांव एकता था। आज वह मूल उद्देश्य गौण हो चुका है और उसका स्थान आत्मप्रचार, वर्चस्व और निजी लाभ ने ले लिया है।
समाज का मौन: सबसे बड़ा अपराध
सबसे दुखद पहलू यह है कि आदिवासी समाज स्वयं इस विकृति को मूकदर्शक बनकर देख रहा है; कई बार तो जाने-अनजाने इसका सक्रिय भागीदार भी बन जाता है। जो लोग परंपरा की रक्षा की बात करते हैं, वे ही परंपरा का क्षरण करने वालों के पीछे खड़े नजर आते हैं।
मुंडा समाज ने कभी उरांव समुदाय को अपनी धरती पर आश्रय दिया था—वह ऐतिहासिक उदारता आज कहां खो गई? उरांव समाज ने उस ऋण और स्नेह को जीवित रखने के लिए जतरा की नींव रखी थी—वह कृतज्ञता आज कहां विलीन हो गई? दोनों समुदायों का यह ऐतिहासिक भाईचारा आज राजनीतिक और धार्मिक गुटबाजी की भेंट चढ़ चुका है।
जब जतरा स्थल के समीप भूमि विवाद होते हैं, निर्माण तोड़े जाते हैं और स्थिति तनावपूर्ण होती है, तब भी समाज चुप्पी साध लेता है, क्योंकि उसमें “धर्मगुरु” का रसूख आड़े आ जाता है। आस्था के आवरण में पनप रही हर विकृति को चुपचाप स्वीकार कर लेना किसी भी जीवंत समाज के बौद्धिक और सांस्कृतिक पतन का सबसे बड़ा कारण है।
जतरा के मूल स्वरूप का विनाश
‘जतरा’ का वास्तविक अर्थ है—एकत्र होना, पुरखों को याद करना, पूजन करना और आत्मीय मिलन। वहीं, ‘मेले’ का आशय होता है—क्रय-विक्रय, मनोरंजन और अनियंत्रित भीड़। मुड़मा को जतरा से मेला बनाकर उसकी आत्मा को तार-तार कर दिया गया है। अब मांदर और नगाड़ों की पारंपरिक गूंज व्यावसायिक लाउडस्पीकरों के शोर में दब जाती है। पारंपरिक गीत नारों में बदल जाते हैं और पड़हा राजा का पारंपरिक सम्मान राजनीतिक अगवानी में सिमट जाता है।
जो लोग यह दावा करते हैं कि “हम संस्कृति बचा रहे हैं”, वे अनजाने में उसे बाजार का उत्पाद बना रहे हैं। सरना किसी एक व्यक्ति या परिवार की जागीर कभी नहीं रहा; यह समूचे समुदाय, प्रकृति और पूर्वजों का साझा विश्वास है। आज इसे एक व्यक्ति-विशेष और उसके समर्थकों का निजी ब्रांड बना दिया गया है।
वक्त है जागने का…
आदिवासी समाज को अब सचेत होना होगा, अन्यथा आने वाली पीढ़ियों के पास अपनी जड़ों का कोई निशान नहीं बचेगा। मुड़मा जतरा को पुनः उसके मूल जतरा स्वरूप में लौटाना होगा। इसे बाजारवादी शक्तियों और स्वघोषित ठेकेदारों के चंगुल से मुक्त कराना होगा।
इतिहास को सहेजना होगा—मुंडाओं की उस उदारता और उरांवों के उस भाईचारे को याद रखना होगा। चालीस पड़हा की सामूहिक व्यवस्था को उसका पुराना गौरव लौटाना होगा।
जब तक समाज मौन रहेगा, तब तक आस्था और परंपरा के नाम पर यह व्यापार फलता-फूलता रहेगा। भविष्य की पीढ़ियां केवल बाजार और तमाशा देखेंगी, जतरा की पवित्रता और ऐतिहासिक मूल्य को कभी समझ नहीं पाएंगी।
मुड़मा “जतरा” है, कोई साधारण मेला नहीं। इसे मेला बनाने वाले और बनते हुए चुपचाप देखने वाले—दोनों ही इतिहास के कठघरे में खड़े हैं। अब समय आ गया है कि समाज अपनी चुप्पी तोड़े, वरना इतिहास यही दर्ज करेगा कि हमने अपनी आस्था और विरासत का सौदा खुद होने दिया।
— लक्ष्मीनारायण मुंडा
रांची, झारखंड
(डिस्क्लेमर: यह लेखक के स्वतंत्र और व्यक्तिगत विचार हैं।)












