रांची/नई दिल्ली: झारखंड के वित्त मंत्री राधाकृष्ण किशोर ने जीएसटी काउंसिल की बैठक में कोयले को जीएसटी के दायरे से बाहर रखने और राज्यों को इस पर वैट लगाने का अधिकार देने की मांग रखी। उपलब्ध बैठक विवरण के अनुसार, गुरुवार को नई दिल्ली के भारत मंडपम में केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण की अध्यक्षता में आयोजित बैठक में उन्होंने कोयला उत्पादक राज्यों के राजस्व और खनन से जुड़े दीर्घकालिक पर्यावरणीय बोझ का मुद्दा उठाया।
किशोर ने जीएसटी डेटा में अधिक पारदर्शिता और झारखंड के बताए गए राजस्व नुकसान की भरपाई के लिए वैकल्पिक सहायता तंत्र की भी मांग की। उपलब्ध विवरण में इन प्रस्तावों पर काउंसिल के किसी निर्णय का उल्लेख नहीं है।
खनन का बोझ और राजस्व में हिस्सेदारी का सवाल
वित्त मंत्री ने कहा कि झारखंड देश की ऊर्जा सुरक्षा और औद्योगिक विकास में महत्वपूर्ण योगदान देता है, लेकिन खनन से जुड़े पर्यावरणीय और सामाजिक दायित्व राज्य में बने रहते हैं।
उन्होंने बताया कि झारखंड के पास देश के कोयला भंडार का लगभग 23.27 प्रतिशत हिस्सा है। उनके प्रस्तुत आंकड़ों के अनुसार, झारखंड, ओडिशा और पश्चिम बंगाल मिलकर देश के लगभग 57 प्रतिशत कोयला भंडार का हिस्सा रखते हैं।
किशोर ने तर्क दिया कि झारखंड से निकले कोयले का आर्थिक उपयोग देशभर में होता है, जबकि भूमि, जल, स्थानीय पारिस्थितिकी और लोगों के पुनर्वास से जुड़ा अधिकांश बोझ उत्पादक राज्य को उठाना पड़ता है।
उन्होंने कहा कि खदान बंद होने के बाद भी भूमि सुधार, पर्यावरण की बहाली और स्थानीय अर्थव्यवस्था में बदलाव से जुड़े काम दशकों तक चलते हैं। ऐसे खर्चों को दीर्घकालिक दायित्व मानते हुए राज्यों के लिए वित्तीय संतुलन का ढांचा बनाने की जरूरत है।
कोयले पर वैट लगाने का प्रस्ताव
राधाकृष्ण किशोर ने संभावित समाधान के रूप में कोयले को जीएसटी से बाहर रखने और राज्यों को उस पर वैट लगाने की अनुमति देने का सुझाव दिया। वैट वस्तुओं पर लगाया जाने वाला मूल्य वर्धित कर है।
उनका तर्क था कि इस बदलाव से कोयला उत्पादक राज्यों का राजस्व बढ़ सकता है। उन्होंने अंतरराज्यीय कोयला बिक्री से उत्पादक राज्यों को मिलने वाले कर राजस्व का मुद्दा भी उठाया।
यह मांग अभी प्रस्ताव के रूप में सामने आई है। उपलब्ध सामग्री में कोयले की कर व्यवस्था बदलने या नई दर लागू करने की घोषणा नहीं है।
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राज्यों को विस्तृत GST डेटा देने की मांग
वित्त मंत्री ने जीएसटी के तहत वस्तुओं की आपूर्ति कहां से हुई और कहां पहुंची, कर देयता कितनी बनी तथा सरकारों के बीच राजस्व का निपटान कैसे हुआ—इनसे जुड़े विवरण राज्यों को नियमित रूप से उपलब्ध कराने का अनुरोध किया।
उन्होंने इनपुट टैक्स क्रेडिट यानी खरीद पर चुकाए गए कर के समायोजन और अंतरराज्यीय लेनदेन से जुड़े आईजीएसटी के विवरण में भी पारदर्शिता की मांग रखी। उनका सुझाव था कि राज्यवार और वस्तुओं के वर्गीकरण कोड के अनुसार यह जानकारी संस्थागत व्यवस्था के तहत दी जाए।
राजस्व नुकसान के लिए वैकल्पिक सहायता मांगी
किशोर ने दावा किया कि जीएसटी दरों के युक्तिकरण से झारखंड को लगभग 4,000 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ है। उन्होंने एमएमडीआर अधिनियम में बदलावों से 14,000 करोड़ रुपये के नुकसान और लगभग 1.36 लाख करोड़ रुपये की पूर्व बकाया राशि प्राप्त नहीं होने का भी उल्लेख किया।
वित्त मंत्री के अनुसार, जीएसटी क्षतिपूर्ति उपकर समाप्त होने से अनुमानित वार्षिक राजस्व घाटा 22,500 करोड़ रुपये हो गया है। उन्होंने इन नुकसानों के लिए वैकल्पिक सहायता तंत्र की मांग की। उपलब्ध विवरण में इन आंकड़ों की गणना, संबंधित अवधि और विस्तृत आधार नहीं दिया गया है।
किशोर ने कहा कि राष्ट्रीय विकास में संसाधन उत्पादक राज्यों के योगदान के साथ उनकी वित्तीय जरूरतों को भी ध्यान में रखा जाना चाहिए। उन्होंने सहकारी संघवाद के तहत विकास की लागत और लाभों के उचित वितरण पर जोर दिया।











