Ranchi | झारखंड की सियासत में हलचल तेज हो गई है। रांची के नामकुम स्थित खिजरी विधायक सह कांग्रेस विधायक दल के उप नेता राजेश कच्छप के आवासीय कार्यालय (लुपुंग टोली) में आजसू और भाजपा के कई प्रमुख नेताओं ने कांग्रेस का दामन थाम लिया।
कांग्रेस पार्टी की जनहितकारी नीतियों और राहुल गांधी के नेतृत्व में भरोसा जताते हुए इन नेताओं ने पार्टी की सदस्यता ग्रहण की। इस बड़े सियासी फेरबदल से ग्रामीण इलाके में विपक्षी दलों के संगठन को बड़ा झटका लगा है।
इस राजनीतिक घटनाक्रम के बाद खिजरी विधानसभा क्षेत्र सहित आसपास के इलाकों में सियासी समीकरण तेजी से बदलते नजर आ रहे हैं।

नामकुम में शक्ति प्रदर्शन: आजसू और भाजपा के ये बड़े चेहरे हुए शामिल
नामकुम के लुपुंग टोली में आयोजित मिलन समारोह के दौरान विपक्षी दलों के कई कद्दावर चेहरे मंच पर नजर आए। कांग्रेस में शामिल होने वाले प्रमुख नेताओं में:
- संजीव सिंह उर्फ छोटू (केंद्रीय सदस्य, आजसू पार्टी)
- कौशल सिंह (भाजपा नेता)
- रवि सिंह (भाजपा युवा नेता)
- रविंद्र सिंह (प्रखंड उपाध्यक्ष, आजसू)
- दिलीप पांडेय (प्रखंड कोषाध्यक्ष, आजसू)
- एस. के. सिंह, शिव जी यादव, प्रदीप सिंह एवं अनिल सिंह
मंच पर सभी नए सदस्यों का पार्टी का पट्टा पहनाकर औपचारिक रूप से स्वागत किया गया।
‘राहुल गांधी के विचारों से मिली प्रेरणा’: नए सदस्यों का बयान
कांग्रेस में शामिल हुए नेताओं ने कहा कि वे राहुल गांधी के संविधान, लोकतंत्र और सामाजिक न्याय को बचाने के संकल्प से प्रभावित होकर संगठन में आए हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि जमीनी स्तर पर जनता के मुद्दों को मजबूती से उठाने के लिए कांग्रेस ही सबसे मजबूत विकल्प है।
कार्यक्रम में उपस्थित वरिष्ठ नेताओं ने जोर दिया कि नए साथियों के आने से संगठन को ग्रामीण स्तर पर नई ऊर्जा और मजबूती मिलेगी।
शीर्ष नेताओं की मौजूदगी और जमीनी समीकरण
इस मिलन समारोह में रांची ग्रामीण कांग्रेस के प्रभारी रियाजुल अंसारी और ग्रामीण कांग्रेस अध्यक्ष सोमनाथ मुंडा विशेष रूप से मौजूद रहे।
स्थानीय प्रभाव:
- आजसू के ग्रामीण कैडर पर असर: प्रखंड स्तर के पदाधिकारियों के पार्टी छोड़ने से स्थानीय संगठन कमजोर हुआ है।
- खिजरी क्षेत्र में कांग्रेस की बढ़त: जमीनी कार्यकर्ताओं के जुड़ने से आगामी राजनीतिक गतिविधियों में कांग्रेस का पलड़ा भारी दिखता है।
विपक्षी दलों से प्रमुख नेताओं के टूटने के बाद अब नजरें भाजपा और आजसू के स्थानीय नेतृत्व पर टिकी हैं कि वे अपने कैडर को एकजुट रखने के लिए क्या जवाबी रणनीति अपनाते हैं। वहीं, कांग्रेस इस बदलाव को भुनाकर ग्रामीण इलाकों में अपने जनसंपर्क अभियान को और तेज करने की तैयारी में है।











