रांची। विश्व आदिवासी दिवस के मौके पर रांची स्थित RKDF University का परिसर एक अलग ही रंग में रंगा नजर आया। यूनिवर्सिटी के सभी विभागों के छात्र-छात्राओं ने पारंपरिक वेशभूषा में ढोल और मांदर की थाप पर ऐसा समां बांधा कि पूरा कैंपस ‘जय जोहार’ के नारों से गूंज उठा।
इस भव्य आयोजन का मुख्य उद्देश्य युवाओं को अपनी जड़ों, जल-जंगल-जमीन के प्रति आस्था और समृद्ध जनजातीय विरासत से जोड़ना रहा। इस दौरान शिक्षाविदों और छात्रों के बीच आधुनिकता के दौर में अपनी संस्कृति को बचाने और संवारने को लेकर एक नई बहस भी देखने को मिली।
कार्यक्रम के दौरान न केवल सांस्कृतिक प्रस्तुतियां दी गईं, बल्कि राज्य के पारंपरिक व्यंजनों और हस्तकला के जरिए झारखंड की अनूठी पहचान को नई पीढ़ी के सामने जीवंत रूप में प्रस्तुत किया गया।
कैंपस बना मिनी झारखंड: नृत्य, संगीत और पारंपरिक व्यंजनों का लगा मेला
यूनिवर्सिटी परिसर में सुबह से ही उत्सव जैसा माहौल था। छात्र-छात्राएं राज्य की विविध जनजातियों के पारंपरिक परिधानों में पहुंचे थे। कार्यक्रम की शुरुआत आदिवासी परंपरा के अनुसार प्रकृति की वंदना से हुई।
इसके बाद यूनिवर्सिटी के ऑडिटोरियम और प्रांगण में विभिन्न प्रतियोगिताओं का दौर शुरू हुआ। ट्राइबल डांस और फोक म्यूजिक प्रतियोगिता में छात्रों ने ‘करम’ और ‘सरहुल’ के पारंपरिक गीतों पर ऐसी प्रस्तुति दी कि दर्शक भी थिरकने पर मजबूर हो गए।
स्वदेशी स्वाद और कलात्मक सोच ने जीता दिल
- फूड स्टॉल्स (Indigenous Cuisine): छात्रों द्वारा लगाए गए स्टॉल्स पर पारंपरिक जनजातीय व्यंजनों का लुत्फ उठाने के लिए भारी भीड़ उमड़ी।
- पोस्टर व ड्राइंग कॉम्पिटिशन: युवाओं ने अपनी चित्रकारी के माध्यम से पर्यावरण संरक्षण, प्रकृति-मानव संबंध और जल-जंगल-जमीन की रक्षा के संदेश को बारीकी से उकेरा।
- आर्ट एंड क्राफ्ट प्रदर्शनी: हस्तशिल्प और पारंपरिक कला कृतियों के जरिए आदिवासी जीवन शैली की सादगी को दिखाया गया।
”आदिवासी संस्कृति केवल परंपरा नहीं, प्रकृति रक्षा की जीवन शैली है”
कार्यक्रम में विश्वविद्यालय के वरिष्ठ प्रवक्ताओं और अतिथियों ने युवाओं को संबोधित करते हुए कहा कि आज पूरा विश्व क्लाइमेट चेंज और ग्लोबल वार्मिंग से जूझ रहा है। ऐसे दौर में आदिवासी समाज का जीवन दर्शन पूरी दुनिया के लिए एक सीख है।
“सदियों से आदिवासी समाज ने प्रकृति के साथ संतुलन बनाकर जीना सिखाया है। जल, जंगल और जमीन की सुरक्षा केवल एक नारा नहीं, बल्कि उनकी जीवन शैली का हिस्सा है। आधुनिकता की दौड़ में आगे बढ़ते हुए हमें अपनी सांस्कृतिक जड़ों को भूलना नहीं चाहिए।”
— कार्यक्रम के दौरान यूनिवर्सिटी के वरिष्ठ वक्ता
वक्ताओं ने इस बात पर विशेष जोर दिया कि युवा पीढ़ी यदि अपनी भाषा, कला और सामुदायिक मूल्यों को बचाकर रखेगी, तभी हमारी पहचान सुरक्षित रह पाएगी।
शिक्षा के साथ सांस्कृतिक जड़ों से जोड़ने की अनूठी पहल
RKDF University, Ranchi के इस प्रयास को स्थानीय शिक्षाविदों और अभिभावकों ने भी सराहा है। अमूमन उच्च शिक्षण संस्थानों में आधुनिक कार्यक्रमों का बोलबाला रहता है, लेकिन सभी विभागों की एकजुट भागीदारी के साथ विश्व आदिवासी दिवस को इस स्तर पर मनाना यह दर्शाता है कि संस्थान शिक्षा के साथ-साथ नैतिक और सामाजिक मूल्यों के प्रति कितना गंभीर है।
कार्यक्रम के अंत में RKDF University परिवार की ओर से पूरे आदिवासी समाज को ‘विश्व आदिवासी दिवस’ की शुभकामनाएं दी गईं और अपनी सांस्कृतिक विरासत को अक्षुण्ण रखने का संकल्प लिया गया।
युवाओं के लिए आगे की राह
इस तरह के आयोजनों से यह साफ संदेश जाता है कि आधुनिक तकनीक और शिक्षा हासिल करने के बावजूद अपनी परंपराओं से जुड़े रहना संभव है। आने वाले समय में जरूरत इस बात की है कि विश्वविद्यालय स्तर पर शुरू हुई इस पहल को रिसर्च, डॉक्यूमेंटेशन और डिजिटल आर्काइविंग तक ले जाया जाए, ताकि झारखंड की यह समृद्ध जनजातीय धरोहर और मौखिक इतिहास आने वाली पीढ़ियों के लिए डिजिटल रूप में सुरक्षित रह सके।











