विश्व बाल श्रम निषेध दिवस: क्या कोरोना संकट में हेमंत सोरेन बचा पाएंगे बाल श्रमिकों की मुस्कान?

by
Brajesh Kumar Mishra

12 जून को हर वर्ष विश्व बाल श्रम निषेध दिवस के रूप में मनाया जाता है, लेकिन कोविड संकट के बीच इसके खास मायने हैं, क्योंकि बाल श्रम एवं दुर्व्यापार के संकट से भी जूझने की चुनौती कम नहीं है. अभी झारखण्ड की बागडोर हेमंत सोरेन जी के हाथों में है. उनके पिछले कार्यकाल में बाल श्रम के विषय को गंभीरता से लिया गया था और उन्होंने कड़ा रूख दिखाते हुए झारखण्ड राज्य बाल श्रम आयोग का गठन तक करा दिया था. ऐसे में जब वे फिर से मुख्यमंत्री बने हैं तो बाल शोषण की घटनाओं पर लगाम लगाने की उनसे उम्मीदें भी बढ़ी हैं.

झारखण्ड में अब भी हैं चुनौतियाँ

बाल श्रम एवं दुर्व्यापार की कई सारी चुनौतियाँ राज्य में अब भी कायम हैं.बाल श्रम संबधी कुछ तथ्यों पर गौर किया जाए, तो वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार राज्य में बाल श्रमिकों की संख्या 400276 है. उनमें से वर्ष 2016 से 2018 के बीच सिर्फ 33 बाल श्रमिकों को मुक्त कराया जा सका है और एफआईआर दर्ज हुए हैं (एनसीआरबी 2018 के मुताबिक़). दर्ज एफआईआर के अनुसार मात्र 0.01% को ही मुक्त कराया गया है.यू- डायस (शैक्षणिक वर्ष 2018-19) के अनुसार, 6- 14 वर्ष आयु वर्ग के नामांकित कुल छात्रों की संख्या 12044854 है, जबकि नामांकित छात्रों का ठहराव की दर प्राथमिक शिक्षा स्तर पर 81.39 प्रतिशत एवं प्रारंभिक शिक्षा स्तर पर 56.63 प्रतिशत है. माध्यमिक स्तर एवं उच्च माध्यमिक स्तर तक जाते ये आँकडे क्रमशः 33.1 प्रतिशत एवं 19.81 हो जाते हैं.

कई प्रयासों पर देना होगा जोर

कई सारे सरकारी विभागों की बाल अधिकार संरक्षण हेतु जवाबदेही है, मुख्य से – महिला, बाल विकास एवं सामाजिक सुरक्षा विभाग, श्रम नियोजन एवं प्रशिक्षण विभाग, अपराध अनुसन्धान विभाग, शिक्षा विभाग. जिला प्रशासन एवं जिला पुलिस तो फ्रंट लाइन में हैं ही. न्यायपालिका भी विधिक सेवा प्राधिकार के जरिये बाल हित में विभिन्न कदम उठा रही है.

नोबल शांति पुरस्कार से सम्मानित कैलाश सत्यार्थी की संस्था बचपन बचाओ आन्दोलन एवं अन्य स्वयंसेवी संस्थाओं के प्रयास से भी बाल संरक्षण विषय पर विभिन्न गतिविधियाँ आयोजित की जाती हैं, जैसे – जागरूकता शिविर, प्रशिक्षण कार्यक्रम, कार्यशालाएं इत्यादि. साथ ही बाल श्रम मुक्ति हेतु छापेमारी के कई सारे अभियान भी चलाए जाते हैं.

लेकिन, इस संकट के बीच बाल संरक्षण सम्बन्धी चुनौती की गंभीरता को देखते हुए, कई मोर्चों से कार्य करने हेतु विभिन्न स्तरों पर सार्थक विमर्श की आवश्यकता है.

संवेदनशीलता एवं करुणा का संचार हो

बाल श्रम मुक्ति टीम किसी ढाबे से एक बाल श्रमिक को मुक्त करा रही थी। वहीँ पर खा रहे एक भद्र पुरुष ने कहा- भाई, आप लोग बहुत नेक काम कर रहे हैं. लेकिन, रेस्क्यू टीम का जवाब था- यदि आप जैसे पढ़े-लिखे लोग बच्चे से सर्विस लेने से इनकार कर देते, तो रेस्क्यू करने की नौबत ही नहीं आती।

एक मिठाई दुकान में 10 वर्ष का एक बच्चा पानी देने के लिए आया.दुकानदार से बात करने पर पता चला कि बच्चे के परिवार को 10000 रु एडवांस दिया है उसने. हर तीन महीने बाद फिर 10 हजार एडवांस दे देता है. महीने का 3000 रु देने की बात है। दुकानदार तो अपने अनुसार किसी गरीब पर उपकार कर रहा है. लेकिन उस बच्चे की क्या गलती? वह स्कूल क्यों नहीं जा पा रहा?

पुलिस के एक अधिकारी को बाल दुर्व्यापार की सूचना दी जाती है. पीड़िता के पिता ने एक आवेदन दिया कि उसकी बेटी को एक व्यक्ति अन्य राज्य में ले जाकर घरेलू काम करा रहा है और वापस आने से रोकता है.पुलिस अधिकारी का कहना है- बच्ची बहुत ही गरीब परिवार से आती है. घर में रहेगी तो खाए बिना मर जायेगी. एफआईआर क्या करना? लॉक डाउन खुलने के बाद वापस पहुँचाने के लिए बोला है. यह उनका दोष नहीं, बल्कि बाल दुर्व्यापार विषय पर प्रभावी जागरूकता की कमी है.

साधारण सी लगने वाली ऐसी घटनाएं कई बार वीभत्स रूप ले लेती हैं और सभ्य समाज के बीच सिर्फ चर्चा का विषय बन कर रह जाती हैं.

प्रशासनिक एवं नीतिगत कदम की जरुरत

जरुरत है सरकारी प्रयासों की समीक्षा कर उन्हें और प्रभावी बनाने की

महिला, बाल विकास विभाग द्वारा संचालित बाल संरक्षण सेवाएं घटक के तहत राज्य में तकरीबन 40 हजार से ज्यादा ग्राम स्तरीय बाल संरक्षण समितियों का गठन किया गया है. जिला एवं प्रखंड स्तरीय बाल संरक्षण समिति की नियमित बैठकें आयोजित कर इनके गठन, पुनर्गठन एवं सशक्तिकरण हेतु कदम उठाए जाएँ. बाल संरक्षण सेवायें घटक से सम्बंधित चेकलिस्ट तैयार कर सभी स्तरों पर गहन विमर्श होना चाहिए, ताकि मौजूदा स्थिति का आकलन कर एक प्रभावी कार्य योजना तैयार हो सके. जेजे एक्ट के तहत् प्रत्येक जिले में गठित बाल कल्याण समिति की कार्य प्रगति एवं उनके पास उपलब्ध अवसंरचना का मूल्यांकन कर आवश्यक कदम उठाये जाएँ, ताकि पुनर्वास कार्य में तेजी आए.

बाल श्रम निषेध हेतु जिला स्तर वैधानिक टास्क फोर्स की हर माह बैठक नियमित रूप से होनी चाहिए

राज्य के 263 प्रखंड के लिए राज्य में कुल 30 के करीब ही श्रम प्रवर्तन पदाधिकारी होंगे. यह मौजूदा सरकार के सामने एक चुनौती है.अगले कुछ वर्षों तक, बाल श्रम एवं दुर्व्यापार में वृद्धि की संभावना है.इसलिए,एहतियाती कदम पर ज्यादा फोकस होना चाहिए.इसके लिए फैक्ट्रियों सहित अन्य असंगठित इकाइयों का भी नियमित निरीक्षण सुनिश्चित हो.बंधुआ श्रम से मुक्ति हेतु, राज्य सरकार द्वारा जिला एवं अनुमंडल स्तर पर निगरानी समितियां क्रियाशील हों.बाल श्रम के अधिकांश मामलों में बंधुआ श्रम के भी संकेतक मिल सकते हैं। इस कदम से, केन्द्र सरकार द्वारा शत-प्रतिशत वित्त पोषित सेन्ट्रल सेक्टर स्कीम फॉर रिहैबिलिटेशन ऑफ़ बांडेड लेबर 2016 के तहत भी पुनर्वास की संभावना बन सकती है। उक्त स्कीम के अनुसार बच्चों के मामले में आर्थिक लाभ की न्यूनतम राशि 2 लाख रुपये है। मौजूदा संकट के कारण गरीब एवं लाचारों की स्थिति बदतर होने की संभावना है. इसलिए, झारखण्ड निजी नियोजन अभिकरण एवं घरेलू कामगार (विनियमन) विधेयक यथाशीघ्र पारित हो. अंतरराज्यीय प्रवासी श्रमिक का प्रभावी क्रियान्वयन के बारे में विचार हो ही रहा होगा.

कुल आठ जिलों में एंटी ह्यूमन ट्रैफिकिंग ( मानव दुर्व्यापार निरोधी) इकाइयां हैं

गृह मंत्रालय के एंटी ह्यूमन ट्रैफिकिंग यूनिट स्कीम के अनुसार राज्य के कुल 12 जिलों में ऐसी इकाइयां स्थापित की जा सकती थीं.उम्मीद है मौजूदा सरकार आवश्यकता आकलन कर बाल दुर्व्यापार संभावित अन्य जिलों में भी इनका विस्तार करेगी एवं मौजूदा इकाइयों के अवसंरचना का आकलन करते हुए उन्हें भी आवश्यक संसाधन से युक्त करेगी. पुलिस एवं अभियोजकों का प्रशिक्षण आवश्यकता आकलन कर ही ट्रेनिंग मैन्युअल बनाए जाएँ और उन्हें रिफरेन्स मेटेरियल दिए जाएँ.थाना स्तर से सुनिश्चित कराना आवश्यक है कि गुमशुदा बच्चे की शिकायत होने पर तत्काल एफआईआर दर्ज हो. बाल मित्र थाना का मूल्यांकन हो.

अति महत्वपूर्ण वैधानिक निकाय- झारखण्ड राज्य बाल अधिकार संरक्षण आयोग का तत्काल गठन हो

बाल श्रम एवं दुर्व्यापार संगठित अपराध का रूप ले लिया है.जागरूकता सम्बन्धी अभियान गहनता,नवाचार एवं रणनीतिक तैयारी से ही चलाये जाएँ.लोक कल्याणकारी एवं सामाजिक सुरक्षा सम्बन्धी योजनाओं का व्यापक प्रचार- प्रसार और माइक्रो प्लानिंग पर बल हो.सभी स्तरों पर शिक्षा, श्रम एवं अन्य सम्बंधित विभागों के साथ बेहतर सामंजस्य के लिए एक फ्रेमवर्क बनाया जाना चाहिए, ताकि स्कूलों से ड्रॉप आउट छात्रों की ट्रैकिंग हो, कहीं वे सुरक्षा चक्र से बाहर न चलें जाएँ

(लेखक कैलाश सत्यार्थी द्वारा स्थापित संस्था बचपन बचाओ आन्दोलन का झारखण्ड में कार्यकर्ता हैं)

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